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गाय के पेट से निकला एक एंजाइम

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 28, 2026
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पशुधन प्रसार अधिकारी के 1251 पदों के लिए नोटिफिकेशन जारी

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।अस्पतालों में मिलने वाला एक जीवाणु दवाओं से इसलिए बच जाता है कि वह अपने ऊपर एक चादर बुन लेता है। बेंगलुरु की एक प्रयोगशाला ने उस चादर को काटने वाली चीज़ ढूँढ़ी, और वह मिली गाय के पेट में।

एसिनेटोबैक्टर बॉमानी अस्पतालों का जीवाणु है। यह घावों पर, नलियों पर, बिस्तर की जालियों पर जम जाता है और आसानी से नहीं हटता — क्योंकि यह अकेले-अकेले नहीं रहता। यह बायोफ़िल्म बना लेता है : शक्कर, प्रोटीन, चिकनाई और खुले डीएनए की एक परत, जिसके भीतर पूरी बस्ती छिपी रहती है। दवा उस परत तक तो पहुँचती है, भीतर मुश्किल से जाती है; शरीर की अपनी रक्षा-कोशिकाएँ भी वहीं अटक जाती हैं। इसी वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे अपनी सबसे गंभीर सूची में रखा है।

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25 अगस्त 2026 को भारतीय विज्ञान संस्थान ने जो काम सामने रखा, वह जीवाणु पर नहीं, उसकी चादर पर वार करता है। शोध एनपीजे बायोफ़िल्म्स ऐंड माइक्रोबायोम्स में छपा है, डीओआई 10.1038/s41522-026-01115-3। पहली लेखिका रेशमा रामकृष्णन हैं, जो संस्थान के अकार्बनिक एवं भौतिक रसायन विभाग में शोध छात्रा रही हैं। संवादी लेखक हैं उसी विभाग के सह-प्राध्यापक देबासिस दास और सूक्ष्मजीव विज्ञान एवं कोशिका जीवविज्ञान विभाग की प्राध्यापक दीप्शिखा चक्रवर्ती। टीम में कीर्ति परमार, वेलपांडी रामचंद्रन, देबमित्रा सेन और राजू एस राजमणि भी हैं।
गाय ही क्यों

तर्क सीधा है। बायोफ़िल्म की उस परत का 45 से 95 प्रतिशत हिस्सा पॉलीसैकेराइड होता है — यानी शक्कर की लंबी लड़ियाँ, जो आपस में गुँथकर परत को मज़बूती देती हैं। जो चीज़ इन लड़ियों को काट दे, वह पूरी परत कमज़ोर कर देगी।

और शक्कर की लड़ियाँ काटने का सबसे बड़ा कारख़ाना क़ुदरत ने गाय के पेट में लगा रखा है। रुमेन का काम ही सेल्युलोज़ पचाना है, और वहाँ रहने वाले सूक्ष्मजीवों के पास इसके लिए एंजाइमों का विशाल भंडार है। टीम ने उन्हीं सूक्ष्मजीवों के जीनोम आँकड़ों में सेल्युलोज़ पचाने वाले एंजाइम खोजे, इस सोच के साथ कि जो सेल्युलोज़ काट सकता है, वह बायोफ़िल्म की शक्कर भी काट सकेगा।

एक एंजाइम काम कर गया। टीम ने उसका नाम रखा CRhAB। इसने बायोफ़िल्म बनना बहुत घटा दिया और जीवाणु के उन जीनों को भी दबा दिया जो परत बनाने का काम करते हैं। फिर यही एंजाइम क्लेब्सिएला न्यूमोनिया पर भी चला। प्राध्यापक चक्रवर्ती के शब्दों में : “दोनों ही ESKAPE समूह के सबसे कुख्यात जीवाणुओं में हैं, और ख़ुशी की बात है कि यह एंजाइम दोनों पर असर करता है।”

मानदंड / विवरण जानकारी
संस्थान भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु
पत्रिका npj Biofilms and Microbiomes, 2026
डीओआई 10.1038/s41522-026-01115-3
घोषणा 25 अगस्त 2026
एंजाइम का स्रोत गाय के रुमेन के सूक्ष्मजीव
किन पर असर ए. बॉमानी और के. न्यूमोनिया की बायोफ़िल्म
परत में शक्कर का हिस्सा 45 से 95 प्रतिशत
कहाँ तक पहुँचा एंजाइम लगी पट्टी, चूहों पर जाँच
कहाँ तक नहीं पहुँचा किसी भी मनुष्य पर परीक्षण नहीं

काम कहाँ तक पहुँचा है
टीम ने एंजाइम को एक जालीदार पट्टी में बिठाया और चूहों के संक्रमित घावों पर आज़माया। काम यहीं तक पहुँचा है, और इससे आगे कुछ नहीं समझा जाना चाहिए। अब तक किसी मनुष्य पर परीक्षण नहीं हुआ है। चूहे के घाव से इंसान के घाव तक की दूरी सालों और पैसे में नापी जाती है।
रेशमा रामकृष्णन ने दिक़्क़तें भी सीधे बताईं : “पट्टी को घाव पर टिकाए रखना सबसे मुश्किल था, क्योंकि चूहे उसे हटाने की कोशिश करते थे।” टीम अब मधुमेह के पैरों के घावों के लिए पैच जैसी पट्टी पर काम कर रही है, साँस की नली के संक्रमण तक दवा पहुँचाने के तरीक़ों पर, और कई एंजाइम मिलाकर ज़्यादा जीवाणुओं तक पहुँचने पर। दूर की मंज़िल एक ऐसा रूप बताया गया है जिसे साँस के ज़रिए सीधे फेफड़ों तक भेजा जा सके।

भारत के लिए इसका मतलब
असली बात तरीक़े में है। CRhAB जीवाणु को मारता नहीं, उसकी ढाल छीन लेता है — और यह बिलकुल अलग बात है। हर एंटीबायोटिक अपने साथ अपनी मौत लाता है : हर कोर्स कमज़ोर जीवाणुओं को मारता है और मज़बूत को छोड़ देता है, जो फिर बढ़ जाते हैं। जो चीज़ मारती ही नहीं, वह यह दबाव बनाती ही नहीं। शोध-पत्र इसे “रेज़िस्टेंस-एग्नॉस्टिक” कहता है।

भारत में मधुमेह के पैरों के घाव, वेंटिलेटर से जुड़ा निमोनिया और न भरने वाले पुराने घाव — तीनों बड़ी और बढ़ती समस्याएँ हैं, और तीनों में इलाज इसीलिए नाकाम होता है कि बायोफ़िल्म बीच में आ जाती है। ऐसे में जो चीज़ पहले से मौजूद सस्ती दवाओं को दोबारा असरदार बना दे, वह किसी नई महँगी दवा से ज़्यादा काम की है।

दो बातें विज्ञप्ति में हैं ही नहीं, और उन्हें अंदाज़े से नहीं भरा जाना चाहिए : किसी वित्त-पोषक संस्था का नाम नहीं है, और पेटेंट या लाइसेंस की स्थिति नहीं बताई गई है। शोध के इस पड़ाव पर दोनों का न होना असामान्य नहीं, पर दोनों सवाल संस्थान के बौद्धिक संपदा प्रकोष्ठ के हैं — और दूसरे सवाल का जवाब तय करेगा कि पट्टी आख़िर बनाएगा कौन।

आगे क्या किया जाए
आगे का रास्ता जाना-पहचाना है और उसमें कोई चमक नहीं : भारतीय गर्मी में एंजाइम कितने दिन टिकता है, बड़े पैमाने पर बनाने का ख़र्च कितना बैठेगा, विषाक्तता की जाँच, और यह तय करना कि जो चीज़ क़ानूनी तौर पर दवा नहीं बल्कि दवा और उपकरण का मेल है, उसे मंज़ूरी किस रास्ते मिलेगी। इसमें शोध कुछ नहीं है; सब कुछ पैसा है। और भारतीय प्रयोगशालाओं का अच्छा काम अक्सर ठीक इसी पड़ाव पर रुक जाता है।
सुझाव छोटा है। स्थिरता, विषाक्तता और शुरुआती उत्पादन का एक पैकेज — भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद, जैव प्रौद्योगिकी विभाग या बाइरैक से पैसा, और किसी नामित बड़े अस्पताल के साथ पहला मानव अध्ययन — इस काम को उसी खाई के पार पहुँचा देगा जहाँ ऐसे काम गिरते रहे हैं। विज्ञान बेंगलुरु में हो चुका है। यह पट्टी किसी भारतीय नर्स के हाथ में पहुँचेगी या नहीं, यह अब एक दफ़्तरी फ़ैसला है, और वह आज लिया जा सकता है।

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