ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।देश ने लगभग हर उस ग्राम पंचायत तक ऑप्टिकल फाइबर बिछा दिया, जहाँ तक पहुँचने का इरादा था। इस महीने संसद में रखी एक रिपोर्ट बताती है कि उसके बाद क्या हुआ — और दोनों आँकड़ों के बीच की दूरी ही इस साल गाँव के इंटरनेट पर लिखी गई सबसे काम की बात है।
दस्तावेज़ है भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की निष्पादन लेखापरीक्षा रिपोर्ट संख्या 19 (2026) — ‘भारतनेट पर निष्पादन लेखापरीक्षा’, जो संचार मंत्रालय के दूरसंचार विभाग से जुड़ी है। यह 12 अगस्त 2026 को संसद में रखी गई। रिपोर्ट 2017-18 से 2022-23 तक की अवधि देखती है, ज़ोर दूसरे चरण पर है; जाँच अक्टूबर 2023 से अगस्त 2024 के बीच हुई, और जहाँ ज़रूरी लगा वहाँ स्थिति नवंबर 2025 तक अद्यतन की गई है।
भारतनेट की सोच अक्टूबर 2011 में बनी और काम एक विशेष कंपनी भारत ब्रॉडबैंड नेटवर्क लिमिटेड के ज़रिए हुआ, जो 2012 में बनी। पैसा यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फ़ंड से आया, जिसे अब डिजिटल भारत निधि कहते हैं। इरादा सीधा और बड़ा था — क़रीब 2.5 लाख ग्राम पंचायतों तक ब्रॉडबैंड। कैग इसे बिना किसी शर्त के “दुनिया की सबसे बड़ी दूरसंचार पहलों में से एक” कहता है।
जो बना, वह कम नहीं है
निर्माण का रिकॉर्ड सचमुच बड़ा है और रिपोर्ट यह बात पहले कहती है। नवंबर 2025 तक 39,888 करोड़ रुपये ख़र्च हुए, मंज़ूर बजट 42,068 करोड़ के मुक़ाबले — पहले चरण में 11,148 करोड़ और दूसरे में 30,920 करोड़। ब्लिट्ज़ इंडिया ने जोड़कर देखा : यह मंज़ूर बजट का 94.82 प्रतिशत बैठता है। इसके बदले भारतनेट 2.19 लाख ग्राम पंचायतों में सेवा-तैयार हो चुका है — संशोधित दायरे 2.26 लाख का 96.70 प्रतिशत।
दुनिया में बहुत कम बड़ी योजनाएँ पंचानबे प्रतिशत पैसे में सत्तानबे प्रतिशत काम खड़ा कर पाती हैं। ईमानदार शुरुआत यही वाक्य है, और कैग का अपना निष्कर्ष भी यहीं से शुरू होता है : भारतनेट ने “बुनियादी ढाँचे में उल्लेखनीय सफलता पाई है”।
| मानदंड / विवरण | जानकारी |
|---|---|
| रिपोर्ट | कैग निष्पादन लेखापरीक्षा, सिविल, संख्या 19 (2026) |
| संसद में रखी गई | 12 अगस्त 2026 |
| अवधि | 2017-18 से 2022-23, दूसरा चरण |
| स्थिति अद्यतन | नवंबर 2025 तक |
| मंज़ूर बजट | 42,068 करोड़ रुपये |
| ख़र्च | 39,888 करोड़ रुपये — 94.82 प्रतिशत |
| सेवा-तैयार ग्राम पंचायतें | 2.19 लाख — 96.70 प्रतिशत |
| इनमें से चालू | 33.20 प्रतिशत |
| बैंडविड्थ का इस्तेमाल | 17.91 प्रतिशत |
| फाइबर टूटने पर मरम्मत में औसत समय | 17 दिन |
| 90 प्रतिशत से ऊपर चालू वाले राज्य | गुजरात और पंजाब |
स्रोत : कैग रिपोर्ट संख्या 19 (2026), पाठ में दिए गए पैरा। बजट का प्रतिशत ब्लिट्ज़ इंडिया ने ख़ुद निकाला। फ़ोटो पर टिप्पणी : लेखापरीक्षा रिपोर्ट एक दस्तावेज़ है, कोई घटना नहीं; इसकी कॉपीराइट-मुक्त तस्वीर होती ही नहीं, और फाइबर केबल का प्रतीकात्मक चित्र परिपत्र BIMG/CIR/2026/02 के तहत मना है। इसलिए डेस्क का अपना डेटा कार्ड।
दूरी कहाँ बनी
रिपोर्ट की मुख्य बात निर्माण की नहीं है। वह यह है कि यह ढाँचा “कारगर संचालन, इस्तेमाल और आमदनी में नहीं बदल सका”। नवंबर 2025 तक सेवा-तैयार ग्राम पंचायतों में से सिर्फ़ 33.20 प्रतिशत चालू थीं।
वजह भी लेखापरीक्षक ने साफ़ लिखी है, और वह बहुत सादा है। बंद पड़े रहने की सबसे बड़ी वजह फाइबर का टूटना या कटना रही, जो क़रीब 48 प्रतिशत मामलों में ज़िम्मेदार थी। और टूटे फाइबर को दुरुस्त करने में औसतन सत्रह दिन लगे। ऊपर से फ़ॉल्ट ढूँढ़ने वाली प्रणाली जुड़ नहीं पाई — यानी केबल टूटने पर यह जल्दी पता ही नहीं चलता था कि टूटा कहाँ है।
सत्रह दिन वाला आँकड़ा याद रखने लायक़ है। जिस गाँव के स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र या कॉमन सर्विस सेंटर का इंटरनेट पंद्रह-पंद्रह दिन बंद रहता हो, वहाँ का नागरिक उसे “जुड़ा हुआ” नहीं मानेगा, चाहे काग़ज़ पर कुछ भी लिखा हो। रिपोर्ट यह भी कहती है कि उपलब्ध बैंडविड्थ का सिर्फ़ 17.91 प्रतिशत इस्तेमाल हुआ; बड़ी टेलीकॉम कंपनियाँ सेवा की गुणवत्ता से परेशान होकर हट गईं; और माँग होने के बावजूद डार्क फाइबर कई जगह किराये पर नहीं दिया गया, क्योंकि राज्य की क्रियान्वयन एजेंसी के स्तर पर या तो नीति नहीं थी या फ़ैसला नहीं हुआ।
योजना बनाने में भी कमी रही। दूसरा चरण बीस राज्यों (21 सर्किल) के लिए बना था, तीन तरीक़ों से — सार्वजनिक उपक्रम आधारित, राज्य आधारित और निजी क्षेत्र आधारित — पर लागू सिर्फ़ तेरह राज्यों (14 सर्किल) में हो सका। जहाँ मौक़े पर जाकर सर्वे ज़रूरी था, वहाँ विस्तृत परियोजना रिपोर्ट डेस्क पर बैठकर बनी; पंजाब और बिहार में तो निजी मॉडल के तहत रिपोर्ट बनी ही नहीं। दूर-दराज़ के लिए बने उपग्रह वाले हिस्से में सेवा-तैयार पंचायतों तक में वाई-फ़ाई एक्सेस पॉइंट लगे ही नहीं, इसलिए लोग उस सेवा तक पहुँच ही नहीं सके जो काग़ज़ पर उपलब्ध थी। छह राज्य (सात सर्किल) पूरे सेवा-तैयार हुए, और हर मॉडल में देरी दो से छह साल तक रही।
सार्वजनिक उपक्रमों का हिस्सा
काम चूँकि एक विशेष कंपनी और दो केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों के ज़रिए हुआ, इसलिए रिपोर्ट में वे बातें भी हैं जो सीधे सार्वजनिक उपक्रमों के रिकॉर्ड की हैं।
लेखापरीक्षा में मील-पत्थर पर भुगतान वाला तरीक़ा सार्वजनिक उपक्रम आधारित मॉडल में सबसे कमज़ोर पाया गया, और उसी मॉडल में सेवा भी कम पहुँची; जबकि निजी क्षेत्र आधारित मॉडल में वित्तीय अनुशासन बेहतर रहा और सेवा भी बेहतर पहुँची। रिपोर्ट यह भी दर्ज करती है कि भारत संचार निगम लिमिटेड ने इसी मॉडल के तहत परियोजना के 2,001.43 करोड़ रुपये दूसरे कामों में लगाए — और उसी वाक्य में यह भी कि वह रक़म अब वापस जमा हो चुकी है, तथा संशोधित भारतनेट कार्यक्रम के तहत अब उपयोगिता प्रमाण-पत्र देना ज़रूरी कर दिया गया है।
योजना अपने ख़र्च से ख़ुद चलने के लिए बनी थी। रखरखाव का ख़र्च ज़्यादा और आमदनी बहुत कम होने से वह उम्मीद पूरी नहीं हुई, और रिपोर्ट यह भी साफ़ कहती है।
ज़मीन में पड़ा केबल संपत्ति है। जिस केबल पर ट्रैफ़िक चलता है, वह सेवा है। यह रिपोर्ट उन्हीं दोनों के बीच के सत्रह दिनों की है।
समाधान, लेखापरीक्षक के अपने शब्दों में
• बीबीएनएल का बीएसएनएल में विलय हो चुका है; अब भारतनेट एक ही एजेंसी के मॉडल पर चलेगा
• यह संशोधित भारतनेट कार्यक्रम के ज़रिए होगा, जिसे मंत्रिमंडल ने अगस्त 2023 में मंज़ूरी दी
• कैग लिखता है कि विलय का फ़ैसला बताई गई कमियों की स्वीकृति दर्शाता है
• नया कार्यक्रम दायरा 2.5 लाख पंचायतों से बढ़ाकर 6.4 लाख गाँव/पंचायत करेगा
• 2,001.43 करोड़ रुपये वापस जमा हो चुके; उपयोगिता प्रमाण-पत्र अब अनिवार्य
फ़ाइल इस समय कहाँ है
स्थिति के बारे में दो बातें साफ़ कहनी ज़रूरी हैं, क्योंकि बिना स्थिति के लेखापरीक्षा का निष्कर्ष आधा तथ्य होता है। ऊपर लिखी सुधार की बातें लेखापरीक्षक के अपने पाठ में हैं — बीबीएनएल का बीएसएनएल में विलय, एक एजेंसी का मॉडल और संशोधित कार्यक्रम, तीनों को कैग पहले से चल रही प्रतिक्रिया के रूप में दर्ज करता है, और 2,001.43 करोड़ की वापसी को वादे के रूप में नहीं, हो चुके काम के रूप में।
जो बात यह डेस्क मूल दस्तावेज़ से तय नहीं कर सका, वह संसदीय पड़ाव है। रिपोर्ट के साथ जारी प्रेस विज्ञप्ति में दूरसंचार विभाग का अलग उत्तर दर्ज नहीं है, और यह डेस्क यह भी तय नहीं कर पाया कि कृत-कार्रवाई नोट दाख़िल हुआ या नहीं, या लोक लेखा समिति ने रिपोर्ट उठाई या नहीं। यह कमी छिपाई नहीं जा रही, लिख दी जा रही है, और विभाग का उत्तर तथा समिति की कार्यवाही सामने आते ही यह पूरी की जाएगी।
दूरी कैसे पटेगी
लेखापरीक्षक ने काम ठीक बाँधा है : उसके सुझाव नए कार्यक्रम को “लागू करते समय विचार में लिए जा सकते हैं”। यानी वह नेटवर्क, जिसका एक तिहाई हिस्सा चल रहा है, अब ढाई गुना बड़ा होने जा रहा है। ऐसे में काम का क्रम इरादे से ज़्यादा मायने रखता है।
तीन क़दम गाँव के आदमी को जल्दी दिखेंगे। पहला, सत्रह दिन वाली मरम्मत — यह चलाने की समस्या है और इसका हल भी चलाने में ही है : फ़ॉल्ट ढूँढ़ने वाली प्रणाली नेटवर्क में जोड़ दी जाए ताकि टूट घंटों में पकड़ी जाए, और रखरखाव के ठेके औसत अपटाइम पर नहीं, मरम्मत के समय पर लिखे जाएँ। दूसरा, डार्क फाइबर का फ़ैसला — माँग होते हुए भी क्षमता ख़ाली पड़ी है क्योंकि राज्य एजेंसी के स्तर पर नीति नहीं है; केंद्र से एक नमूना नीति जारी हो जाए तो बिना एक रुपया लगाए यह खुल जाएगा। तीसरा, आँकड़ा छापना — गुजरात और पंजाब ने चालू पंचायतों का आँकड़ा नब्बे प्रतिशत के पार पहुँचा दिया है जबकि देश का औसत एक तिहाई पर है। वे दोनों जो अलग कर रहे हैं, उसे जानने का हक़ बाक़ी ग्यारह राज्यों को है। विभाग अपने डैशबोर्ड पर हर महीने राज्यवार आँकड़ा डाल दे, तो वह जानकारी वहाँ पहुँच जाएगी।













