ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।देश के 166 बड़े जलाशयों में क्षमता का 44.39 फ़ीसदी पानी है, और मौसम विभाग ने अगस्त में सामान्य से कम बारिश का अनुमान दिया है। रबी की बुवाई का हिसाब यहीं से शुरू होता है।
देश के 166 प्रमुख जलाशयों में जीवंत भंडारण उनकी कुल क्षमता का 44.39 फ़ीसदी है। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने अगस्त महीने और मानसून के दूसरे हिस्से, दोनों के लिए सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है। यह दो आँकड़े अलग-अलग नहीं पढ़े जाने चाहिए — अगस्त अकेले पूरे मानसून की क़रीब 29 फ़ीसदी बारिश लाता है और ख़रीफ़ की लगभग पाँचवाँ हिस्सा बुवाई इसी महीने होती है।
इसका आप पर क्या असर पड़ेगा? दो रास्तों से। पहला, जलाशय का पानी सिर्फ़ खड़ी ख़रीफ़ फ़सल के लिए नहीं होता — वह अक्टूबर-नवंबर में शुरू होने वाली रबी की बुवाई के लिए बचाकर रखा जाता है। भंडारण कम रहा तो गेहूँ और सरसों की सिंचाई पर सीधा असर पड़ता है। दूसरा, यही चीज़ आगे चलकर आपकी थाली के भाव तय करती है। जुलाई में खाने-पीने की महंगाई पहले ही 5.52 फ़ीसदी पर है; कम बारिश वाला अगस्त इसे और ऊपर ले जा सकता है।
एक महीना, तीन काम: अगस्त मानसून की क़रीब 29 फ़ीसदी बारिश लाता है, ख़रीफ़ की बुवाई पूरी कराता है और रबी के लिए जलाशय भरता है।
जलाशय का पानी इस फ़सल के लिए नहीं होता। वह अगली फ़सल का बीमा होता है।
एक नज़र में
• निगरानी वाले जलाशय: 166
• जीवंत भंडारण: क्षमता का 44.39 फ़ीसदी
• मौसम विभाग का अनुमान: अगस्त और सीज़न के दूसरे हिस्से में सामान्य से कम बारिश
• अगस्त का हिस्सा: पूरे मानसून की क़रीब 29 फ़ीसदी बारिश
• बुवाई: ख़रीफ़ की लगभग पाँचवाँ हिस्सा बुवाई अगस्त में
• आगे का असर: अक्टूबर-नवंबर की रबी सिंचाई
• अभी की खाद्य महंगाई: 5.52 फ़ीसदी
• किसान के लिए सहारा: पीएम-किसान की तय तारीख़ वाली किस्त
अब यह भी साफ़ रहे कि 44 फ़ीसदी का मतलब सूखा नहीं है। मानसून के इस पड़ाव पर भंडारण का चढ़ना-उतरना सामान्य है और सितंबर की बारिश बहुत कुछ भरपाई कर देती है। असली सवाल यह है कि पानी किन इलाक़ों में कम है। एक ही औसत के भीतर कोई राज्य क्षमता से ऊपर हो सकता है और कोई ज़िला आधे से नीचे — और खेत का फ़ैसला ज़िले के आँकड़े से होता है, देश के औसत से नहीं। इसीलिए किसान के लिए काम की चीज़ राष्ट्रीय आँकड़ा नहीं, अपने बांध का हफ़्तेवार आँकड़ा है।
आगे का रास्ता कुछ ठोस क़दमों से निकलता है। पहला, ज़िला स्तर पर पानी की उपलब्धता का आँकड़ा किसान तक आसान भाषा में पहुँचे, ताकि वह रबी में कम पानी वाली फ़सल चुन सके। दूसरा, टपक और फव्वारा सिंचाई पर मिलने वाली मदद उन्हीं ब्लॉकों में सबसे पहले पहुँचे जहाँ भंडारण सबसे कम है। तीसरा, पीएम-किसान जैसी तय तारीख़ वाली किस्त मुश्किल सीज़न में कर्ज़ की जगह लेती है — बशर्ते ई-केवाईसी और ज़मीन का रिकॉर्ड अपडेट हो। सीधी बात यह है कि कम बारिश का अनुमान चेतावनी है, नतीजा नहीं — और अगस्त अभी आधा बाक़ी है।














