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धान पर 72 रुपये, और खेत में पानी का सवाल

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 14, 2026
in the blitz, कृषि
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।सरकार ने खरीफ़ की 14 फ़सलों का समर्थन मूल्य बढ़ा दिया है। लेकिन इस साल किसान के सामने असली सवाल दाम का नहीं है। सवाल यह है कि बुवाई हुई कितनी।

पहले दाम की बात। खरीफ़ विपणन सत्र 2026-27 के लिए 14 फ़सलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 0.1 से 8.8 प्रतिशत तक बढ़ाया गया है। सामान्य धान 72 रुपये बढ़कर 2,441 रुपये प्रति क्विंटल हो गया, और ग्रेड-ए धान 72 रुपये बढ़कर 2,461 रुपये। सबसे ज़्यादा बढ़ोतरी सूरजमुखी के बीज पर है — 622 रुपये। इसके बाद कपास पर 557 रुपये और तिल पर 500 रुपये। किसानों को इस सत्र में कुल मिलाकर क़रीब 2 लाख 60 हज़ार करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है।

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अब दूसरी बात, जो आँकड़ों की सुर्ख़ी में नहीं आती। जुलाई के आख़िर तक देश में बुवाई का रकबा पिछले साल के मुक़ाबले 38.8 लाख हेक्टेयर पीछे था। दालों और मोटे अनाज की बुवाई 6 से 8 प्रतिशत घटी। धान 2.2 प्रतिशत और कपास 2.4 प्रतिशत पीछे रहा। यानी जिन फ़सलों पर सरकार ने सबसे ज़्यादा दाम बढ़ाया — दलहन और तिलहन — वही सबसे ज़्यादा पिछड़ी हैं। सीधी बात यह है कि दाम बढ़ाना एक हिस्सा है, और खेत तक पानी पहुँचाना दूसरा। इस साल दूसरा हिस्सा कमज़ोर पड़ा है।

अगस्त सबसे भारी महीना: पूरे मानसून की क़रीब 29 प्रतिशत बारिश और खरीफ़ की क़रीब 20 प्रतिशत बुवाई इसी एक महीने में होती है।

दाम तय करना सरकार के हाथ में है। बुवाई का समय आसमान के हाथ में है। योजना दोनों को जोड़कर बनती है।

एक नज़र में

• कितनी फ़सलें: खरीफ़ की 14 फ़सलें, सत्र 2026-27
• बढ़ोतरी: 0.1 से 8.8 प्रतिशत तक
• सामान्य धान: 72 रुपये बढ़कर 2,441 रुपये क्विंटल
• ग्रेड-ए धान: 72 रुपये बढ़कर 2,461 रुपये क्विंटल
• सूरजमुखी बीज: 622 रुपये की बढ़ोतरी — सबसे ज़्यादा
• कपास: 557 रुपये · तिल: 500 रुपये
• कुल भुगतान का अनुमान: क़रीब 2.6 लाख करोड़ रुपये
• बुवाई: जुलाई के अंत तक 38.8 लाख हेक्टेयर पीछे
• बारिश: 1 अगस्त तक औसत से 11.5 प्रतिशत कम
• जलाशय: 166 बड़े जलाशयों में 44.39 प्रतिशत पानी
अगस्त का महीना क्यों इतना अहम है, यह समझ लीजिए। पूरे मानसून की क़रीब 29 प्रतिशत बारिश इसी महीने होती है, और खरीफ़ की क़रीब 20 प्रतिशत बुवाई भी इसी महीने। जून की कमी अगस्त में पूरी हो सकती है। अगस्त की कमी पूरी नहीं होती, क्योंकि तब तक कई फ़सलों की बुवाई का समय निकल चुका होता है। मौसम विभाग ने अगस्त और अगस्त-सितंबर, दोनों के लिए सामान्य से कम बारिश का अनुमान दिया है — औसत का 94 प्रतिशत से भी कम।

तो किसान करे क्या। तीन चीज़ें काम की हैं और तीनों ब्लॉक स्तर पर उपलब्ध हैं। पहली — कम अवधि की क़िस्में। देर से बुवाई के लिए बनाई गई इन क़िस्मों से 15-20 दिन की देरी की भरपाई हो जाती है, बशर्ते बीज समय पर मिल जाए। दूसरी — दलहन और मोटे अनाज की तरफ़ जाना, जहाँ इस बार दाम भी बेहतर है और पानी भी कम लगता है। तीसरी — टपक और फ़व्वारा सिंचाई पर मिलने वाली सब्सिडी, जो कई राज्यों में 80 प्रतिशत तक है। बड़ी बात यह है कि जलाशयों में जो 44.39 प्रतिशत पानी है, वह इस खरीफ़ के लिए भी है और आगे रबी के लिए भी। आज पूरा निकाल लेना, गेहूँ-सरसों से उधार लेना है। यही वह फ़ैसला है जो हर अगस्त में लिया जाता है, और अक्सर बिना कहे लिया जाता है।

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