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पहली बार लाल क़िले से गूँजेगा वंदे मातरम्

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 14, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।कल देश 80वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाएगा। और इस बार पहली बार लाल क़िले की प्राचीर से राष्ट्रगीत वंदे मातरम् गाया जाएगा। यह गीत इस साल 150 बरस का हो रहा है।

साल 2026 वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने का साल है। इसी को ध्यान में रखते हुए 15 अगस्त के समारोह की शुरुआत में लाल क़िले की प्राचीर से राष्ट्रगीत गाया जाएगा — ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। सात दशकों से वह जगह राष्ट्रगान की रही है। इस बार राष्ट्रगीत को भी वही ज़मीन दी जा रही है। समारोह की थीम है — युवा शक्ति, विकसित भारत 2047 की ओर।

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थीम सिर्फ़ भाषण में नहीं, मेहमानों की सूची में भी दिखती है। लाल क़िले के समारोह में उन 19 भारतीय छात्रों को बुलाया गया है जिन्होंने 2026 के अंतरराष्ट्रीय भौतिकी, रसायन, जीव विज्ञान और गणित ओलंपियाड में पदक जीते हैं। सरकारी समारोहों में खिलाड़ियों और जवानों को बुलाया जाना आम है। ओलंपियाड के पदक विजेता छात्रों को अगली क़तार में बिठाना नया है — और यह इस बात का छोटा-सा, पर सोचा-समझा संकेत है कि गणतंत्र किन उपलब्धियों को राष्ट्रीय मानना चाहता है।

80 साल, वही प्राचीर: 15 अगस्त 2026 को वंदे मातरम् के 150वें साल में पहली बार लाल क़िले से राष्ट्रगीत गाया जाएगा।

समारोह बताता है कि देश किसे सम्मान देता है। इस बार ओलंपियाड का पदक विजेता आगे की क़तार में है।

एक नज़र में

• अवसर: 80वाँ स्वतंत्रता दिवस, 15 अगस्त 2026
• वर्षगाँठ: वंदे मातरम् के 150 साल
• पहली बार: लाल क़िले की प्राचीर से राष्ट्रगीत, समारोह की शुरुआत में
• थीम: युवा शक्ति — विकसित भारत 2047 की ओर
• ख़ास मेहमान: 2026 के अंतरराष्ट्रीय ओलंपियाड के 19 भारतीय पदक विजेता छात्र
• ज्ञानपथ पर: क़रीब 2,500 एनसीसी कैडेट और माय भारत स्वयंसेवक ‘वंदे मातरम्’ लिखेंगे
• आसमान से: वायुसेना का एमआई-17 हेलिकॉप्टर बैनर लेकर पुष्पवर्षा करेगा
• देशभर में: 343 जगहों पर बैंड की प्रस्तुति
• घोषणा: रक्षा मंत्रालय की प्रेस वार्ता, 10 अगस्त 2026

तैयारी भीड़ के लिए भी है और कैमरे के लिए भी। लाल क़िले के ठीक सामने ज्ञानपथ पर क़रीब 2,500 एनसीसी कैडेट और माय भारत के स्वयंसेवक मिलकर ‘वंदे मातरम्’ शब्द बनाएँगे — ताकि गीत सुनाई भी दे और दिखाई भी। वायुसेना का एमआई-17 हेलिकॉप्टर 150 साल का बैनर लेकर उड़ेगा और फूलों की वर्षा करेगा। दिल्ली से बाहर, ज़्यादातर भारतीय जो चीज़ असल में देखेंगे, वह 343 जगहों पर बजते बैंड हैं — ज़िला मुख्यालय का मंच, न कि टीवी पर दिखता फ़्लाईपास्ट।

एक गीत को इतने बड़े मौक़े पर वापस लाने की वजह भी समझने लायक़ है। वंदे मातरम् 1876 में साहित्य के तौर पर आया था और आंदोलन का औज़ार बनकर निकला — जुलूसों में गाया गया, सभाओं में गाया गया, जेलों में गाया गया, उन लोगों के मुँह से जिन्हें यह पक्का नहीं था कि आगे क्या होगा। उसके 150वें साल में उसे लाल क़िले की प्राचीर देना, और वह भी उस समारोह में जो 2047 तक देश को ले जाने वाली पीढ़ी के नाम है, एक सीधी बात कहता है: जिस मेहनत से आज़ादी मिली और जो मेहनत अब युवाओं से माँगी जा रही है, वह एक ही सिलसिला है। समारोह एक सुबह का है। बात उससे लंबी चलनी चाहिए।

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