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गाँव में महंगाई शहर से ज़्यादा क्यों है

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 14, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।जुलाई में खुदरा महंगाई 4.45 प्रतिशत रही। यह आँकड़ा ठीक है। पर इसके भीतर छिपा एक दूसरा आँकड़ा है, जो बताता है कि महंगाई गाँव और शहर में अलग-अलग चल रही है।

जुलाई में खुदरा महंगाई दर 4.45 प्रतिशत रही, जो जून में 4.38 प्रतिशत थी। यह आँकड़ा नए आधार वर्ष 2024=100 पर है। अब भीतर देखिए। गाँवों में महंगाई 4.84 प्रतिशत रही और शहरों में 3.96 प्रतिशत। जून में यह क्रमशः 4.74 और 3.93 प्रतिशत थी। यानी गाँव और शहर के बीच का फ़र्क़ 88 आधार अंक का है — और यह फ़र्क़ बढ़ रहा है, घट नहीं रहा।

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वजह खाने में है। खाद्य महंगाई जुलाई में 5.52 प्रतिशत रही, जो जून में 5.32 प्रतिशत थी। गाँव में खाद्य महंगाई 5.79 प्रतिशत और शहर में 5.05 प्रतिशत। दरअसल बात सिर्फ़ दाम की नहीं, हिस्से की है। एक गाँव के घर के कुल ख़र्च में खाने का हिस्सा शहर के घर से कहीं ज़्यादा होता है। तो जब आटा-दाल-सब्ज़ी महँगी होती है, वह गाँव के बजट को ज़्यादा ज़ोर से दबाती है — भले ही दाम दोनों जगह एक जैसे बढ़े हों।

88 आधार अंक का फ़र्क़: जुलाई में गाँव की महंगाई 4.84 प्रतिशत और शहर की 3.96 प्रतिशत रही — और खाद्य महंगाई 5.52 प्रतिशत।

दाम एक जैसे बढ़ते हैं। चोट एक जैसी नहीं लगती। फ़र्क़ इस बात से पड़ता है कि थाली बजट का कितना हिस्सा है।

एक नज़र में · जुलाई 2026

• खुदरा महंगाई: 4.45 प्रतिशत (जून में 4.38)
• गाँव: 4.84 प्रतिशत (जून में 4.74)
• शहर: 3.96 प्रतिशत (जून में 3.93)
• अंतर: 88 आधार अंक
• खाद्य महंगाई: 5.52 प्रतिशत (जून में 5.32)
• गाँव में खाद्य: 5.79 प्रतिशत · शहर में: 5.05 प्रतिशत
• मकान: 2.22 प्रतिशत — गाँव 2.80, शहर 2.01
• आधार वर्ष: नया आधार, 2024=100
• थोक महंगाई: जुलाई का आँकड़ा आज आना है; जून में 9.87 प्रतिशत था

एक तीसरा आँकड़ा भी देखिए, जो उल्टा चलता है। मकान की महंगाई 2.22 प्रतिशत रही — गाँव में 2.80 और शहर में 2.01 प्रतिशत। यानी घर के ख़र्च के इस हिस्से में दबाव कम है, और यही वजह है कि शहर का कुल आँकड़ा नीचे रह गया। शहर के बजट में किराया और मकान का हिस्सा बड़ा होता है। जब वह हिस्सा शांत रहता है, शहर की महंगाई शांत दिखती है — भले ही सब्ज़ी उतनी ही महँगी हो।

राहत की बात भी है और उसे साफ़ कहना चाहिए। 4.45 प्रतिशत की दर रिज़र्व बैंक के 4 प्रतिशत के लक्ष्य के आसपास है, और वह लक्ष्य 2 से 6 प्रतिशत के दायरे में तय है। यानी क़ाबू से बाहर कुछ नहीं है। पर नीति के लिहाज़ से जो बात काम की है, वह यह है कि औसत आँकड़े पर बनी नीति गाँव के घर को पूरा नहीं छूती। इसका हल भी नया नहीं है — समय पर राशन की उपलब्धता, दालों और खाद्य तेल का बफ़र स्टॉक जो दाम चढ़ने से पहले खुले, और मंडी से घर तक की वह दूरी जिसमें सब्ज़ी का आधा दाम बन जाता है। जुलाई का आँकड़ा घबराने का नहीं है। यह ध्यान से देखने का है, और देखने की जगह औसत नहीं, वह 88 अंक का फ़र्क़ है।

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