ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की लगभग 29 प्रतिशत बारिश और ख़रीफ़ की क़रीब 20 प्रतिशत बुवाई अकेले अगस्त में होती है। यही दो आँकड़े बताते हैं कि जिस महीने की सबसे कम चर्चा होती है, वही पूरे खेती-साल का फ़ैसला करता है।
इस बार गणित तंग है। मौसम विभाग के दूसरे दीर्घावधि पूर्वानुमान में मौसम को दीर्घावधि औसत का 90 प्रतिशत (चार प्रतिशत ऊपर-नीचे) रखा गया था। रेटिंग एजेंसी इक्रा का अनुमान है कि कुल ख़रीफ़ बुवाई पिछले साल से 1–2 प्रतिशत कम रहेगी, और वित्त वर्ष 2027 में कृषि, वानिकी व मत्स्य क्षेत्र की वृद्धि लगभग 1.2 प्रतिशत रहेगी।
मानसून के दौरान ख़रीफ़ की बुवाई। फ़ोटो: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय या ICAR की कॉपीराइट-मुक्त तस्वीर से लिया जाए (GODL-India)।
कम बारिश मौसम की बात है। उसका जवाब कैसा है, यह नीति की बात है — और इस बार जवाब का ढाँचा पहले से ज़्यादा साफ़ है।
At a Glance
• अगस्त में बारिश पूरे मानसून की लगभग 29%
• अगस्त में बुवाई पूरे ख़रीफ़ की लगभग 20%
• मौसम विभाग का अनुमान दीर्घावधि औसत का 90%, ±4 प्रतिशत अंक
• इक्रा का अनुमान बुवाई 1–2% कम
• कृषि वृद्धि, वित्त वर्ष 27 लगभग 1.2%
इस बार फ़र्क़ यह है कि जवाब देने का ढाँचा तैयार है। ज़िला स्तर पर कृषि विज्ञान केंद्र मौसम आधारित सलाह जारी कर रहे हैं; बारानी इलाक़ों के लिए सलाह है कि धान जैसी ज़्यादा पानी माँगने वाली फ़सल की जगह कम अवधि की दालें, मोटा अनाज और तिलहन लिए जाएँ; और ICAR के पास सूखा-प्रवण ज़िलों के लिए ज़िलेवार आकस्मिक फ़सल योजनाएँ मौजूद हैं।
इसलिए इसे सीधे-सीधे संकट कहना जल्दबाज़ी होगी। कम बारिश वाला अगस्त एक चुनौती है, आख़िरी फ़ैसला नहीं — देश ने पहले भी कमज़ोर शुरुआत वाले मानसून को बेहतर अंत तक पहुँचते देखा है। महीने भर देखने वाला आँकड़ा सिर्फ़ बारिश की कमी नहीं, बल्कि कृषि मंत्रालय हर हफ़्ते जो बुवाई का आँकड़ा जारी करता है, वह है। सुधार सबसे पहले वहीं दिखेगा।














