ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।जुलाई में पहली बार एक महीने में दो लाख से ज़्यादा इलेक्ट्रिक दोपहिया बिके। दिलचस्प बात यह है कि सबसे ज़्यादा बेचने वाली कंपनियाँ नई स्टार्टअप नहीं, वही पुरानी पेट्रोल कंपनियाँ हैं।
जुलाई में कुल 2,04,362 इलेक्ट्रिक दोपहिया बिके — पिछले साल जुलाई के 1,08,516 से 88.32 फ़ीसदी ज़्यादा। दोपहिया बाज़ार में इनका हिस्सा 11.24 फ़ीसदी हो गया, जो जून में 10.59 और पिछले साल जुलाई में 7.65 फ़ीसदी था। यानी शोरूम से निकलने वाला लगभग हर नौवाँ दोपहिया अब बैटरी पर चलता है। कुल गाड़ियों की बिक्री भी रिकॉर्ड रही — 25,91,138 गाड़ियाँ, 25.89 फ़ीसदी की बढ़त, और छहों श्रेणियों में अब तक का सबसे बड़ा जुलाई।
असली सवाल सर्विस का: क़स्बे का ख़रीदार टॉर्क नहीं पूछता — वह पूछता है कि ख़राब होने पर बनेगा कहाँ।
बेहतर स्कूटर नई कंपनियों ने बनाया। पर सर्विस सेंटर पुरानी कंपनियों के पास पहले से थे। नक़ल करना मुश्किल इन्हीं का है।
एक नज़र में
• जुलाई में इलेक्ट्रिक दोपहिया: 2,04,362, पहली बार दो लाख पार
• बढ़ोतरी: 88.32 फ़ीसदी, पिछले साल के 1,08,516 से
• दोपहिया बाज़ार में हिस्सा: 11.24% (जून में 10.59%, पिछले साल जुलाई में 7.65%)
• सभी तरह के ईवी: 3,27,901 — अब तक का रिकॉर्ड
• कुल गाड़ियाँ: 25,91,138, 25.89 फ़ीसदी ज़्यादा
• सबसे आगे: टीवीएस 55,499 · बजाज 45,613 · एथर 30,357 · हीरो 22,900 · ओला 14,106
अब देखिए कि किसने बेचा। टीवीएस और बजाज ने मिलकर 1,01,112 इलेक्ट्रिक दोपहिया बेचे — यानी पूरे बाज़ार का लगभग आधा। एथर 30,357 के साथ नई कंपनियों में सबसे आगे रही, हीरो 22,900 और ओला 14,106 पर। पाँच साल पहले माना जा रहा था कि पुरानी पेट्रोल कंपनियाँ पिछड़ जाएँगी। हुआ उलटा। दरअसल बैटरी और मोटर ख़रीदी जा सकती है, पर ज़िले-ज़िले में फैला सर्विस नेटवर्क और डीलर के साथ बना भरोसा सालों में बनता है। छोटे शहर का ख़रीदार सबसे पहले यही पूछता है — गाड़ी बंद हो गई तो कौन ठीक करेगा, कितनी दूर, और कंपनी तीन साल बाद रहेगी या नहीं।
ख़रीदने से पहले जो हिसाब लगाना चाहिए, वह ईंधन के ख़र्च का है, स्टिकर क़ीमत का नहीं। इलेक्ट्रिक स्कूटर पेट्रोल वाले से महँगा आता है, पर बिजली से चलने का महीने का ख़र्च पेट्रोल के मुक़ाबले काफ़ी कम बैठता है — इसलिए जो रोज़ 30-40 किलोमीटर चलाता है, उसका फ़ायदा तेज़ी से बनता है, और जो हफ़्ते में दो बार निकलता है, उसका नहीं। तीन बातें अब भी अटकी हैं और यही आगे का रास्ता तय करेंगी: उन मोहल्लों में चार्जिंग जहाँ अपनी पार्किंग नहीं है, बिना पक्की आमदनी वाले ख़रीदार के लिए आसान क़र्ज़, और पुरानी इलेक्ट्रिक गाड़ी का बाज़ार, जो अभी बना ही नहीं है। ये तीनों हल हुए तो 11 फ़ीसदी का आँकड़ा तेज़ी से आगे बढ़ेगा।














