ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।केंद्रीय सहकारिता मंत्री ने मुंबई में एनयूसीएफ़डीसी के नए दफ़्तर का उद्घाटन किया और ‘सहकार नव-क्रांति’ कार्यक्रम में पैक्स के आधुनिकीकरण और डिजिटलीकरण पर ज़ोर दिया। समझने वाली बात यह है कि इससे गाँव में क्या बदलेगा।
पैक्स यानी प्राथमिक कृषि ऋण समिति — गाँव की वह संस्था जहाँ से किसान फ़सली कर्ज़ लेता है, खाद-बीज ख़रीदता है और कई जगह अपनी उपज बेचता भी है। यह देश की सबसे नज़दीकी वित्तीय संस्था है, पर इसका ज़्यादातर हिसाब आज भी रजिस्टर पर चलता है। कंप्यूटरीकरण का मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि बही की जगह स्क्रीन आ जाए। इसका असली मतलब यह है कि किसान का कर्ज़ का रिकॉर्ड बैंक की व्यवस्था में दर्ज हो जाए — और जिस किसान का रिकॉर्ड दर्ज होता है, उसे अगली बार कर्ज़ लेते समय अपनी साख साबित करने के लिए काग़ज़ नहीं ढूँढने पड़ते। पारदर्शिता का यही व्यावहारिक फ़ायदा है।
सबसे नज़दीक की संस्था: किसान और पशुपालक के लिए बैंक शाखा दूर होती है, समिति पास — इसीलिए समिति का हिसाब सुधरने का असर सीधे घर तक पहुँचता है।
जिस किसान का लेन-देन कहीं दर्ज ही नहीं होता, उसकी साख भी कहीं दर्ज नहीं होती। रजिस्टर से स्क्रीन तक का सफ़र असल में यही बदलता है।
एक नज़र में
• क्या हुआ: मुंबई में एनयूसीएफ़डीसी के नए परिसर का उद्घाटन, ‘सहकार नव-क्रांति’ कार्यक्रम में संबोधन
• एनयूसीएफ़डीसी क्या है: शहरी सहकारी बैंकों के लिए बनी छाता संस्था, जो उन्हें वित्तीय और तकनीकी सहारा देती है
• ज़ोर किस पर: पैक्स का आधुनिकीकरण, डिजिटलीकरण और पारदर्शी व्यवस्था
• पैक्स क्या है: गाँव स्तर की प्राथमिक कृषि ऋण समिति — फ़सली कर्ज़, खाद-बीज और कई जगह ख़रीद का भी ज़रिया
• किसे फ़ायदा: छोटे किसान और पशुपालक, जिनके लिए बैंक शाखा दूर है
• नारा: ‘सहकार से समृद्धि’ — और ‘गाँव से ग्लोबल’ तक पहचान बनाने की बात
शहरी सहकारी बैंकों की कहानी थोड़ी अलग है, पर जुड़ी हुई है। इन बैंकों के पास अब तक अपनी कोई राष्ट्रीय छाता संस्था नहीं थी — यानी मुश्किल वक़्त में सहारा देने वाला, तकनीक साझा करने वाला और नियमों के पालन में मदद करने वाला कोई साझा ढाँचा नहीं था। एनयूसीएफ़डीसी इसी कमी को भरने के लिए बना है। छोटे सहकारी बैंक के लिए अपने दम पर आधुनिक कोर बैंकिंग सिस्टम, साइबर सुरक्षा और ऑडिट का इंतज़ाम करना महँगा पड़ता है; साझा मंच से यही चीज़ें सस्ती पड़ती हैं। ग्राहक के लिए इसका मतलब है — वही सुविधाएँ जो बड़े बैंक में मिलती हैं, अपने मोहल्ले के बैंक में।
आगे की चुनौती भी साफ़ है और उसका हल भी। सबसे बड़ा काम प्रशिक्षण का है — समिति के सचिव और कर्मचारी नई व्यवस्था चला सकें, इसके लिए एक बार का सॉफ़्टवेयर नहीं, लगातार की ट्रेनिंग चाहिए। दूसरा, इंटरनेट की पहुँच, जो कई ब्लॉक में अब भी भरोसेमंद नहीं है; इसलिए ऑफ़लाइन काम करके बाद में डेटा भेजने वाली व्यवस्था ज़रूरी है। और तीसरा, पुराने रिकॉर्ड का सही तरीक़े से डिजिटल में जाना, क्योंकि ग़लत आँकड़ा डिजिटल होकर और तेज़ी से फैलता है। ये तीनों काम मुश्किल नहीं हैं, बस धीरज माँगते हैं। जिस दिन गाँव की समिति का हिसाब उतना ही भरोसेमंद हो जाएगा जितना बैंक का, उस दिन छोटे किसान के लिए कर्ज़ की क़तार सबसे छोटी हो जाएगी।














