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39 मेडल और एक झंडा: भारत ग्लासगो से जीत लेकर लौट रहा है और 2030 की ज़िम्मेदारी लेकर भी

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 2, 2026
in the blitz
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भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में 39 पदकों के साथ किया शानदार समापन

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।मेडल की गिनती बीते दिनों का हिसाब है। मेज़बानी का झंडा आने वाले चार साल का वादा है। भारत को आज दोनों एक साथ मिल रहे हैं। ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत ने 39 मेडल जीते — 13 सोना, 17 चाँदी और 9 काँसा। समापन समारोह में खेलों का झंडा अहमदाबाद को सौंपा जा रहा है, जो 2030 में इन खेलों की मेज़बानी करेगा।

गिनती से ज़्यादा दिलचस्प यह है कि मेडल आए कहाँ से। मुक्केबाज़ों ने 10 मेडल जीते और उनमें सात सोने के रहे — भारत का अब तक का सबसे अच्छा रिंग प्रदर्शन। यह आँकड़ा इसलिए बड़ा है क्योंकि भारत की पुरानी शिकायत यही रही है कि हमारे खिलाड़ी फ़ाइनल तक पहुँचते तो हैं, जीतते कम हैं। इस बार वह बात उलट गई। एथलेटिक्स से 10 मेडल आए — पाँच चाँदी और पाँच काँसा — पर एक भी सोना नहीं। पैरा-एथलेटिक्स से छह मेडल आए, जिनमें तीन सोने के हैं। मीराबाई चानू ने वेटलिफ़्टिंग में भारत का पहला सोना दिलाया और लगातार तीसरी बार कॉमनवेल्थ ख़िताब जीता, जबकि अस्मिता डे ने जूडो में भारत को इन खेलों का पहला-ही सोना दिलाया।

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दस में सात सोने: मुक्केबाज़ी में भारत ने इस बार फ़ाइनल तक पहुँचने की नहीं, फ़ाइनल जीतने की आदत दिखाई।

फ़ाइनल तक पहुँचना तैयारी बताता है। फ़ाइनल जीतना बताता है कि तैयारी के बाद क्या सिखाया गया।

एक नज़र में

• कुल मेडल: 39 — 13 सोना, 17 चाँदी, 9 काँसा
• मुक्केबाज़ी: 10 मेडल, जिनमें सात सोने के — अब तक का सर्वश्रेष्ठ
• एथलेटिक्स: 10 मेडल — पाँच चाँदी, पाँच काँसा
• पैरा-एथलेटिक्स: छह मेडल, तीन सोने के
• मीराबाई चानू: ग्लासगो में भारत का पहला सोना और लगातार तीसरा कॉमनवेल्थ ख़िताब
• अस्मिता डे: जूडो में भारत का कॉमनवेल्थ गेम्स का पहला सोना
• 2030: मेज़बानी अहमदाबाद के पास; समापन में 20 मिनट का भारतीय सांस्कृतिक कार्यक्रम

अब सबसे ज़रूरी बात, जो मेडल तालिका में नहीं दिखती। इन खेलों ने भारत को तीन साफ़ जानकारियाँ दी हैं। मुक्केबाज़ी में ढाँचा बन चुका है और वह नतीजा दे रहा है — इसे दूसरी खेलों में दोहराने की कोशिश होनी चाहिए। एथलेटिक्स में दस बार पोडियम तक पहुँचना और एक बार भी सबसे ऊपर न पहुँचना कोच और अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबलों के अनुभव की कमी बताता है, प्रतिभा की नहीं। और जूडो में पहला सोना यह बताता है कि जिस खेल में हम कमज़ोर माने जाते थे, वहाँ भी रास्ता है — पर उसके पीछे अभी लाइन नहीं है, अकेली खिलाड़ी है। तीनों जानकारियाँ मेडल से ज़्यादा क़ीमती हैं, क्योंकि इन तीनों पर पैसा लगाने का इंतज़ाम इसी हफ़्ते मंज़ूर हुए पाँच साल के खेल कार्यक्रम में मौजूद है।

अहमदाबाद के लिए भी सबक़ इसी में है। मेज़बानी का सबसे बड़ा फ़ायदा स्टेडियम नहीं होता, वह ध्यान होता है जो चार साल तक उन खेलों पर टिका रहता है जिन्हें आम दिनों में कोई नहीं देखता। शहर के पास सरदार पटेल स्पोर्ट्स एन्क्लेव का बड़ा ढाँचा पहले से है, मेट्रो चल रही है, और पूरे चार साल हैं — यानी शुरुआत अच्छी है। असली परीक्षा यह होगी कि हर नए बनने वाले मैदान का इस्तेमाल 2031 में कौन करेगा, यह पहली ईंट रखने से पहले तय हो जाए। जिन देशों ने यह तय किया, उनके पास खेल के बाद ढाँचा बचा; जिन्होंने नहीं किया, उनके पास बिल बचा। भारत के पास इस बार समय भी है और उदाहरण भी।

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