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भारत–ब्रिटेन समझौते के दो हफ़्ते: 99% निर्यात पर शुल्क शून्य होने से असल में बदलता क्या है

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 31, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (सीटा) को लागू हुए दो हफ़्ते पूरे हो गए हैं, और सबसे पहले जो चीज़ बदली वह काग़ज़ी कार्रवाई थी। 15 जुलाई से भारत की क़रीब 99% निर्यात वस्तुओं को ब्रिटेन में शुल्क-मुक्त प्रवेश मिल रहा है, जो दोनों देशों के लगभग पूरे कारोबार को कवर करता है। पहले ही दिन भारत से 140 मिलियन डॉलर से ज़्यादा क़ीमत की पचास से अधिक खेप रवाना हुई — यानी यह कोई रस्मी शुरुआत नहीं थी, बल्कि उन निर्यातकों की क़तार थी जो शुल्क घटने का इंतज़ार कर रहे थे।

यह समझौता जुलाई 2025 में चौदह दौर की बातचीत के बाद हुआ था, और उसके बाद का एक साल दोनों देशों में मंज़ूरी की प्रक्रिया और बचे हुए मुश्किल अध्यायों में लगा। आख़िरी अड़चन इस्पात की थी, जिसका हल एक बीच का रास्ता निकालकर हुआ — भारत के पात्र इस्पात निर्यात के क़रीब 85% हिस्से को शुल्क-मुक्त प्रवेश, और बाक़ी के लिए बढ़ा हुआ देश-विशिष्ट कोटा। सीटा के साथ ही सामाजिक सुरक्षा योगदान पर समझौता (दोहरा योगदान समझौता) भी उसी दिन लागू हुआ, जिसका सीधा फ़ायदा ब्रिटेन में कुछ समय के लिए भेजे जाने वाले हर भारतीय पेशेवर और उन्हें भेजने वाली कंपनियों को होगा।

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चौदह दौर, फिर मंज़ूरी: जुलाई 2025 में हस्ताक्षर, 15 जुलाई 2026 से अमल — और साथ में वह समझौता जो ब्रिटेन भेजे गए भारतीय कर्मचारियों का दोहरा सामाजिक सुरक्षा योगदान ख़त्म करता है।

समझौता तब तक काग़ज़ है जब तक उसके तहत माल न चले। पहली ही सुबह पचास खेप चलीं।

एक नज़र में

• लागू: 15 जुलाई 2026; हस्ताक्षर जुलाई 2025 में, 14 दौर की बातचीत के बाद
• दायरा: भारत की क़रीब 99% निर्यात वस्तुओं पर शुल्क शून्य; कुल द्विपक्षीय कारोबार का लगभग पूरा मूल्य
• अध्याय: 30 — वस्तुएं, सेवाएं, डिजिटल व्यापार, श्रम और पर्यावरण
• पहला दिन: 140 मिलियन डॉलर से ज़्यादा की 50 से अधिक खेप
• इस्पात: क़रीब 85% पात्र निर्यात शुल्क-मुक्त, बाक़ी के लिए बढ़ा हुआ देश-विशिष्ट कोटा
• साथ में: सामाजिक सुरक्षा पर दोहरा योगदान समझौता, उसी दिन से लागू
• मौजूदा कारोबार: क़रीब 56 अरब डॉलर
• 2030 का अनुमान: 100–120 अरब डॉलर

अभी दोनों देशों का कारोबार क़रीब 56 अरब डॉलर का है, और दोनों सरकारों का अनुमान है कि 2030 तक यह बढ़कर 100 से 120 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। यह होगा या नहीं, यह समझौते की भाषा से कम और इस बात से ज़्यादा तय होगा कि इसका इस्तेमाल कौन करता है। शुल्क-मुक्त प्रवेश उस निर्यातक के किसी काम का नहीं जो मूल-स्थान प्रमाणपत्र (रूल्स ऑफ़ ओरिजिन) की शर्तें पूरी करके दिखा न सके। और जो कंपनियां सबसे तेज़ी से फ़ायदा उठाएंगी — बड़े कपड़ा निर्यातक, इंजीनियरिंग सामान बनाने वाले, ब्रिटेन में पंजीकृत दवा कंपनियां — उनके पास यह काम संभालने वाला अनुपालन विभाग पहले से मौजूद है।

इसलिए अगले छह महीने का असली काम छोटे निर्यातक तक पहुंचना है। तीन चीज़ें इस दायरे को तेज़ी से चौड़ा कर सकती हैं। पहला, बड़े निर्यात संवर्धन परिषदों में मूल-स्थान संबंधी हेल्प डेस्क, ताकि मझोली कंपनी को सलाहकार रखे बिना अपनी पात्रता साबित करने का रास्ता मिले। दूसरा, शुल्क सूची का आसान भाषा में हिंदी और प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं में प्रकाशन, ताकि तिरुपुर की बुनाई इकाई या मुरादाबाद का पीतल निर्यातक अपना एचएस कोड ख़ुद देख सके — सारांश पढ़कर अंदाज़ा न लगाना पड़े। और तीसरा, क्षेत्र और कंपनी के आकार के हिसाब से उपयोग का सार्वजनिक डैशबोर्ड, जिससे यह बहस का नहीं, माप का सवाल बन जाए कि सीटा काम कर रहा है या नहीं। भारत ने समझौता कर लिया, मंज़ूरी दिला दी और उसके तहत माल भी भेज दिया। अब यह पक्का करना बाक़ी है कि फ़ायदा उन तक भी पहुंचे जो अपने दम पर वहां तक नहीं पहुंच पाते।

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