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जानलेवा दवाएं

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 4, 2026
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जानलेवा दवाएं

ब्लिट्ज ब्यूरो

स्पेशल इन्वेस्टिगेशन डेस्क आज भारत में किसी भी फार्मेसी में जाइए, तो आप दुनिया के सबसे मुश्किल कंज्यूमर बैटलग्राउंड (उपभोक्ता बाजार की जंग) में कदम रख रहे होते हैं। एक तरफ ₹4,71,898 करोड़ की फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री है — जो वॉल्यूम के हिसाब से दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इंडस्ट्री है और जो 150 से ज्यादा देशों को जेनेरिक दवाएं सप्लाई करती है और गर्व से खुद को ‘दुनिया की फार्मेसी’ कहती है। दूसरी तरफ आप हैं यानी मरीज और अगर संसद की स्टैंडिंग कमिटी की बात मानें, तो आपके साथ नाइंसाफी हो रही है।

दिसंबर 2025 में केमिकल्स और फर्टिलाइजर्स पर बनी स्टैंडिंग कमिटी, जो चुने हुए सांसदों की एक क्रॉस-पार्टी कमिटी है, ने एक ऐसी समस्या को सबके सामने रखा जो सबके सामने पहले से ही मौजूद थी। रिपोर्ट का टाइटल ही एक आरोप जैसा है: ‘फ़ार्मास्युटिकल सेक्टर में दवाओं की बढ़ती कीमतें आम नागरिकों की जिंदगी पर बुरा असर डाल रही हैं।’

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इसकी बातें और भी साफ थीं: भारत में आमतौर पर लिखी जाने वाली दवाओं की कीमत उनकी बनाने की लागत से 500 से 1,800 प्रतिशत ज्यादा होती है। आधा बाजार पूरी तरह से कीमत के नियमों से बाहर काम करता है और ऑनलाइन फार्मेसी, जहां अब लाखों लोग अपनी दवाएं खरीदते हैं, बिना किसी नियम-कानून के काम करती हैं।

समस्या का दायरा

आंकड़े एक ऐसी कहानी बताते हैं जिसे सरकार की कोई भी प्रेस रिलीज कम करके नहीं दिखा सकती। जुलाई 2025 में स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा द्वारा राज्यसभा में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में पूरे भारत में कुल 1,16,323 दवाओं के सैंपल की जांच की गई।

इनमें से 3,104 को मानक गुणवत्ता का नहीं घोषित किया गया और 245 नकली या मिलावटी पाई गईं यानी ऐसी दवाएं जो अनधिकृत लोगों ने चोरी किए गए ब्रांड नामों का इस्तेमाल करके बनाई थीं। उससे पिछले साल, नकली दवाओं की संख्या 282 थी। उससे भी पहले, 424 थी।

डेटा इंटेलिजेंस प्लेटफ़ॉर्म के एक दशक के विश्लेषण से पता चला है कि भारत में जांची गई हर 25 दवाओं में से लगभग एक दवा क्वालिटी स्टैंडर्ड पर खरी नहीं उतरती यानी यह दर लगभग 3.7 प्रतिशत है। अकेले दिसंबर 2025 में, सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइज़ेशन (सीडीएससीओ) के मासिक ड्रग अलर्ट में सात नकली दवाओं की पहचान की गई, जिनमें हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) के लिए बड़े पैमाने पर लिखी जाने वाली दवा ‘टेल्मा-एएम’ भी शामिल थी। एक पक्के मामले में, ब्रांड के मालिक की अपनी मैन्युफैक्चरिंग कंपनी ने जांच करने वालों को बताया कि जिस बैच की जांच हो रही थी, उसे उन्होंने बनाया ही नहीं था यानी वह पूरी तरह से नकली माल था जो बाजार में खुलेआम बिक रहा था।

संसदीय समिति ने पाया कि 2019-20 से 2023-24 के बीच पूरे भारत में दवाओं के 4,57,910 सैंपल की जांच की गई। इनमें से 13,735 सैंपल ‘मानक गुणवत्ता वाले नहीं’ पाए गए और 1,547 को नकली या मिलावटी घोषित किया गया।

भारत में अपनी जेब से होने वाले कुल स्वास्थ्य खर्च का 52 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा सिर्फ दवाओं पर खर्च होता है। हर साल भारत के तीन से सात प्रतिशत परिवार स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च की वजह से गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं, और इसमें दवाओं का खर्च मुख्य कारण होता है।

फिर भी, उसी पांच साल की अवधि में, सिर्फ 2,516 मामले दर्ज किए गए और 1,228 गिरफ्तारियां हुईं। समिति की राय बहुत सख़्त थी: ये आंकड़े ‘बहुत कम’ थे, जो कमजोर प्रवर्तन, अपर्याप्त सज़ा और रेगुलेटरी निगरानी में संभावित खामियों की ओर इशारा करते हैं।

पैसे तो दे रहे, पर सुरक्षा नहीं मिल रही

अगर असुरक्षित दवाएं इस संकट का एक पहलू हैं, तो महंगी दवाएं दूसरा पहलू हैं। भारत में हेल्थकेयर पर ‘आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च’ (आेओपीई) यानी वह रकम जो मरीज सीधे अपनी जेब से देते हैं, 2021-22 में कुल हेल्थ खर्च का 39.4 प्रतिशत था, जो 2013-14 में 64 प्रतिशत था।

यह वाकई एक तरक्क ी है। लेकिन फरवरी 2026 में ‘डिस्कवर हेल्थ सिस्टम्स’ नाम के पीयर-रिव्यूड जर्नल में छपी एक रिसर्च से पता चला कि भारत में हेल्थ पर होने वाले कुल ‘आउट-ऑफ-पॉकेट’ खर्च का 52 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा सिर्फ दवाओं पर खर्च होता है। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) का अनुमान है कि हर साल भारत के तीन से सात प्रतिशत परिवार हेल्थकेयर के खर्च — जिसमें दवाओं का खर्च मुख्य वजह है, के कारण गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं।

कई संसदीय समितियों की रिपोर्टों के अनुसार, उपभोक्ताओं को इससे बचाने के लिए बनाया गया रेगुलेटरी सिस्टम नाकाफ़ी है। ‘ड्रग्स (प्राइसेज़ कंट्रोल) ऑर्डर, 2013’ नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) को अधिकतम कीमतें (सीलिंग प्राइस) तय करने का अधिकार देता है लेकिन सिर्फ उन दवाओं के लिए जो ‘नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स’ (जरूरी दवाओं की राष्ट्रीय सूची) में शामिल हैं।

‘आम तौर पर लिखी जाने वाली दवाओं की कीमत उनकी उत्पादन लागत से 500 से 1,800 प्रतिशत तक ज्यादा होती है। बाजार का आधा हिस्सा पूरी तरह से कीमत नियंत्रण के दायरे से बाहर काम करता है।’
— रसायन और उर्वरक पर संसदीय स्थायी समिति, दिसंबर 2025

बाकी सभी दवाएं निर्माता अपनी मर्ज़ी की कीमत पर लॉन्च कर सकते हैं। सालाना 10 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोतरी के लिए नोटिफिकेशन की जरूरत होती है, लेकिन लॉन्च के समय की कीमत पूरी तरह से रेगुलेशन से बाहर होती है। ‘फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन’ दवाएं जो डायबिटीज से लेकर सांस के इन्फेक्शन तक हर चीज के लिए लिखी जाती हैं, पूरी तरह से इस सिस्टम के दायरे से बाहर हैं।

समिति ने एक बहुत गंभीर उदाहरण की ओर इशारा किया, सिप्रोफ़्लोक्सासिन 500एमजी और टिनिडाजोल 600एमजी के कॉम्बिनेशन को ₹3,500 प्रति स्टि्रप की एमआरपी पर बेचा जा रहा था। जब डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्युटिकल्स से पूछा गया, तो उन्होंने पुष्टि की कि ये दवाएं ‘शेड्यूल्ड फॉर्मूलेशन’ नहीं थीं यानी एनपीपीए का इनकी कीमत पर कोई अधिकार नहीं था। विभाग ने बस कंधे उचका दिए।

क्या कोई सुन रहा है?

सभी पार्टियों के सांसदों ने फार्मास्युटिकल उपभोक्ताओं से जुड़ी चिंताओं को लगातार उठाया है।

सितंबर 2025 में ‘बीएमसी पब्लिक हेल्थ’ में छपी एक पीयर-रिव्यूड स्टडी में जनवरी 2017 से फरवरी 2024 तक यानी 11 संसदीय सत्रों के दौरान लोकसभा के डिजिटल रिपॉजिटरी का विश्लेषण किया गया। पता चला है कि इस दौरान सांसदों ने दवाओं से जुड़े 1,121 सवाल पूछे जो संसद में स्वास्थ्य से जुड़े कुल सवालों का लगभग पांचवां हिस्सा था। दवाओं की कीमत, उपलब्धता, क्वालिटी और ई-फार्मेसी के नियमन (रेगुलेशन) जैसे मुद्दे सबसे ज्यादा उठाए गए।

कांग्रेस सांसद जेबी माथर हिशम ने दिसंबर 2025 में राज्यसभा के ‘जीरो आवर’ में कोझिकोड, त्रिशूर और तिरुवनंतपुरम में हुई छापेमारी का जिक्र किया। इन छापों में ‘मैन्युफ़ैक्चरर्स और मार्केटिंग कंपनियों का एक ऐसा अनरेगुलेटेड नेटवर्क’ सामने आया था जो घटिया क्वालिटी की दवाएं बेच रहे थे।

उन्होंने इसे कोई छोटी-मोटी चूक नहीं, बल्कि राज्य के ड्रग कंट्रोल विभागों की सिस्टम की विफलता बताया और केंद्रीय जांच की मांग की। इस बीच, नीति आयोग ने अपनी ‘किफायती दवाओं और स्वास्थ्य उत्पादों पर समिति’ (सीएएमपीएच) को कीमतों पर नियंत्रण के लिए दवाओं की सिफारिश करने का अधिकार दिया है, फिर भी 2024 में, इसी समिति ने एनपीपीए को 11 जरूरी दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरीको मंजूरी देने के लिए सलाह दी थी, जिसकी संसदीय समिति ने कड़ी आलोचना की थी।

गहरी समस्या

ई-फार्मेसी का मामला तो और भी चिंताजनक है। भारत का ऑनलाइन दवा बाजार तेज़ी से बढ़ रहा है और इस पर लगभग कोई नियम-कानून लागू नहीं है। सांसद वी. विजयसाई रेड्डी की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने ई-फार्मेसी के नियमों का ड्राफ़्ट फाइनल न होने पर ‘हैरानी’ जताई। समिति ने चेतावनी दी कि इस देरी से तेजी से बढ़ते डिजिटल बाजार में अनिश्चितता पैदा हो रही है और गैर-कानूनी प्लेटफॉर्म बिना किसी निगरानी के डॉक्टर की पर्ची वाली दवाएं, लत लगाने वाली दवाएं और पूरी तरह से नकली दवाएं बेच पा रहे हैं।

कुछ अच्छी बातें भी हुई हैं। जन औषधि नेटवर्क बढ़कर 17,990 आउटलेट तक पहुंच गया है और जून 2025 तक इससे ग्राहकों की अनुमानित ₹38,000 करोड़ की बचत हुई है। यूसीपीएमपी 2024 ने फार्मास्युटिकल मार्केटिंग एथिक्स कोड (जो पहले स्वैच्छिक था) को अनिवार्य बना दिया है।

इंडियन फार्माकोपिया 2026 जो 1 जुलाई 2026 से लागू होगा। दवाओं की गुणवत्ता के राष्ट्रीय मानकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक बेहतर बनाता है। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की जगह लेने के लिए एक नया कानून तैयार किया जा रहा है। यह कानून पहली बार सीडीएससीओ को नकली दवाओं के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करने की कानूनी शक्तियां देगा।

लेकिन पॉलिसी पर नजर रखने वालों और कंज्यूमर ग्रुप्स का कहना है कि ये उपाय अच्छे तो हैं, लेकिन ये समस्या की जड़ (स्ट्रक्चरल बीमारी) के बजाय सिर्फ लक्षणों का इलाज करते हैं।

संसदीय समिति ने साफ तौर पर बताया है कि क्या बदलाव जरूरी हैं, डीपीसीओ में संशोधन करके ट्रेड मार्जिन को हमेशा के लिए सही (रेशनलाइज़) करना; नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं और फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन को लॉन्च-प्राइस रेगुलेशन के दायरे में लाना; ई-फ़ार्मेसी के लिए एक अलग कानून बनाना; सभी राज्यों में प्राइस मॉनिटरिंग और रिसोर्स यूनिट्स का विस्तार करना और दवाओं से जुड़ी शिकायतों के लिए एक सिंगल नेशनल पोर्टल बनाना।

ये कोई बहुत बड़ी या अजीब मांगें नहीं हैं। ये कंज्यूमर प्रोटेक्शन (ग्राहक सुरक्षा) के लिए कम से कम जरूरी बातें हैं, जो ₹4,71,898 करोड़ का यह उद्योग जो गर्व से खुद को दुनिया की फ़ार्मेसी कहता है, अपने ही नागरिकों को देने के लिए ज़िम्मेदार है।

भारत का फ़ार्मास्युटिकल सेक्टर दुनिया को उम्मीद देता है। अब समय आ गया है कि वह अपने देश के लोगों को भी वही उम्मीद दे।

सुधार का एजेंडा

दिसंबर 2025 की संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट, जो कई सालों में दवाओं की कीमतों की सबसे विस्तृत विधायी जांच है, बताती है कि भारतीय उपभोक्ताओं को क्या मिलना चाहिए। ब्लिट्ज इंडिया इसकी मुख्य मांगों का सारांश देता है।

स्थायी व्यापार मार्जिन युक्तिकरण: डीपीसीओ 2013 में संशोधन करके मार्जिन कैपिंग को एक स्थायी कानूनी अधिकार बनाएं, न कि सीमित समय के लिए कोई उपाय।

गैर-अनुसूचित दवाओं पर मूल्य नियंत्रण: एनपीपीए के अधिकार क्षेत्र का विस्तार करें ताकि वे उन दवाओं की लॉन्च कीमतों को नियंत्रित कर सकें जो अभी एनएलईएम ढांचे से बाहर हैं।

पारदर्शी मूल्य निर्धारण डेटा: स्टॉकिस्ट (पीटीएस) को दी जाने वाली कीमत का डेटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराएं ताकि मरीज जो दवाएं खरीदते हैं, उनकी वास्तविक लागत देख सकें।

अभी ई-फार्मेसी कानून: नुस्खे के सत्यापन, प्रमाणिकता, वितरण मानकों और शिकायत निवारण को कवर करने वाले समर्पित ई-फार्मेसी नियमों को अंतिम रूप दें और लागू करें।

अधिकतम प्रवर्तन: नकली या घटिया दवाएं बनाने वालों के खिलाफ त्वरित मुकदमा और अधिकतम जुर्माना, पांच वर्षों में 2,516 मुकदमे पर्याप्त नहीं हैं।

एकल राष्ट्रीय शिकायत पोर्टल: हर भारतीय मरीज के लिए एनपीपीए, सीडीएससीओ, राज्य औषधि नियंत्रकों और जन औषधि की शिकायतों को एक सुलभ मंच पर एकीकृत करें।

जबरदस्त आंकड़े

सेहत से जुड़े आंकड़े₹4,71,898 करोड़ – भारत के फार्मास्युटिकल सेक्टर का सालाना टर्नओवर ( 2024-25)। वॉल्यूम के हिसाब से भारत दुनिया में तीसरे और वैल्यू के हिसाब से 11वें नंबर पर है।

39.4% — भारतीयों द्वारा अपनी जेब से किया जाने वाला कुल हेल्थ खर्च (2021-22); यह 2013-14 के 64% से कम तो हुआ है, लेकिन अभी भी खतरनाक रूप से ज़्यादा है।

52%+ — जेब से होने वाले कुल हेल्थ खर्च का 52% से ज़्यादा हिस्सा सिर्फ़ दवाओं पर खर्च होता है (डिस्कवर हेल्थ सिस्टम्स, फरवरी 2026)।

3,104 एनएसक्यू + 245 नकली — अकेले 2024-25 में टेस्ट किए गए 1.16 लाख सैंपल में से इतनी दवाएं क्वालिटी में फेल हुईं या नकली पाई गईं।
25 में से 1 — एक दशक (2014–2025) में टेस्ट की गई दवाओं में से इतनी दवाएं औसतन क्वालिटी स्टैंडर्ड्स पर खरी नहीं उतरीं ( अक्टूबर 2025)।

500% – 1,800% — आम तौर पर लिखी जाने वाली कुछ दवाओं की कीमत उनकी प्रोडक्शन कॉस्ट से इतनी ज़्यादा है (संसदीय स्थायी समिति, दिसंबर 2025)।

3% – 7% — हर साल इतने भारतीय परिवार हेल्थ खर्च की वजह से गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं — इसमें दवाओं का खर्च मुख्य वजह है (ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन)।

₹38,000 करोड़ — जून 2025 तक जन औषधि केंद्रों (17,990 आउटलेट) की वजह से ग्राहकों की अनुमानित बचत।

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