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मुआवजा बढ़ाकर अपराधी की सजा घटाना खतरनाक ट्रेंड: सुप्रीम कोर्ट

-कहा, आरोपी पैसा देकर बच सकते हैं, मदुरै हाइकोर्ट का फैसला रद किया

by ब्लिट्ज़ इंडिया
February 25, 2026
in the blitz
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राजेश दुबे

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर अपराधों में किसी की सजा घटाकर मुआवजा बढ़ाने को खतरनाक ट्रेंड बताया। मदुरै हाइकोर्ट के एक फैसले पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि इससे समाज में गलत संदेश जाता है कि आरोपी सिर्फ पैसा देकर अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं।
जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि सजा का उद्देश्य अपराध के प्रति डर पैदा करना है, ताकि भविष्य में अपराध रोके जा सकें। सजा न तो अत्यधिक कठोर होनी चाहिए और न इतनी नरम कि उसका भय खत्म हो जाए।

दरअसल, सुप्रीण कोर्ट मद्रास हाईकोर्ट के मदुरै बेंच के एक फैसले के खिलाफ दायर हुई याचिका पर सुनवाई कर रहा था। हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति पर चाकू से हमला कर गंभीर चोट पहुंचाने के मामले में दो आरोपियों को ट्रायल कोर्ट से मिली तीन साल की सजा घटाकर 5-5 हजार रुपए के मुआवजे को बढ़ाकर 50-50 हजार रुपए कर दिया था। शीर्ष अदलात ने ये फैसला रद कर दिया।

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पीठ ने स्पष्ट किया कि पीड़ित को मुआवजा देना महत्वपूर्ण है लेकिन यह सजा का विकल्प नहीं हो सकता। भारतीय न्याय प्रणाली बदले पर नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्स्थापन के सिद्धांत पर आधारित है।

कोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 395 में पीड़ित को मुआवजा देने का प्रावधान है, लेकिन यह सजा के अतिरिक्त है, ये सजा की जगह नहीं ले सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सजा सुनाते समय अदालतों को इन बिंदुओं पर विचार करना चाहिए:
अपराध और सजा के बीच अनुपात (प्रोपोर्शनैलिटी)

  • मामले के तथ्य और परिस्थितियां
  • समाज पर प्रभाव गंभीर (एग्रीवेटिंग)
  • राहतकारी (मिटिगेटिंग) कारक
  • आरोपियों को चार हफ्ते में सरेंडर का आदेश
  • सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद करते हुए ट्रायल कोर्ट की तीन साल की सजा बहाल कर दी। साथ ही निर्देश दिया कि आरोपी चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करें और शेष सजा काटें। ट्रायल कोर्ट को पहले से काटी गई अवधि का समायोजन करने के निर्देश भी दिए गए।

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