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आस्था व भारत के गौरव को कोई डिगा नहीं सकता

पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारी महान सभ्यता के लोगों ने मंदिर को फिर से जीवंत किया

by ब्लिट्ज़ इंडिया
January 10, 2026
in the blitz
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नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री

सोमनाथ… यह शब्द सुनते ही हमारे मन और हृदय में गर्व व आस्था की भावना भर जाती है। भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात में, प्रभास पाटन नाम की जगह पर स्थित सोमनाथ भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतिकरण है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम ्में भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है। ज्योतिर्लिंगों का वर्णन इस पंक्ति से शुरू होता है… सौराष्ट्रे सोमनाथं च… यानी ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। यह इस पवित्र धाम की सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है। शास्त्रों में यह भी कहा गया है। सोमलिङ्ग नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।। लभते फलं मनोवाञ्छितं मृतः स्वर्ग समाश्रयेत ्॥ अर्थात, सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मन में जो भी पुण्य कामनाएं होती हैं, वे पूरी होती हैं और मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होती है।

दुर्भाग्यवश यही सोमनाथ, जो करोड़ों लोगों की श्रद्धा और आस्था का केंद्र था, विदेशी आक्रमणकारियों का निशाना बना, जिनका उद्देश्य विध्वंस था। वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है, क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1,000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने इस मंदिर पर बड़ा आक्रमण किया था, इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। यह आक्रमण आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से किया गया बर्बर प्रयास था।

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सोमनाथ हमला मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में शामिल है। फिर भी, आज एक हजार वर्ष बाद भी यह मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है। साल 1026 के बाद से इसे इसके पूरे वैभव के साथ पुनःनिर्मित करने के प्रयास जारी रहे। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1951 में आकार ले सका। संयोग से 2026 सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी साल है। 11 मई, 1951 को इसका पुनर्निर्माण संपन्न हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ वह समारोह ऐतिहासिक था, जब मंदिर के द्वार दर्शन के लिए खोले गए थे।

सन ्1026 में सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण में वहां के लोगों के साथ की गई क्रूरता और विध्वंस का वर्णन अनेक ऐतिहासिक स्रोतों में विस्तार से मिलता है। जब इन्हें पढ़ा जाता है, तो हृदय कांप उठता है। हम कल्पना कर सकते हैं कि इसका उस दौर में भारत और लोगों के मनोबल पर कितना गहरा प्रभाव पड़ा होगा। मगर सोमनाथ पर हमले और फिर गुलामी के लंबे कालखंड के बावजूद आज मैं पूरे विश्वास और गर्व से यह कहना चाहता हूं कि सोमनाथ की गाथा विध्वंस की कहानी नहीं है। यह भारतमाता की करोड़ों संतानों के स्वाभिमान की गाथा है। यह हम भारत के लोगों की अटूट आस्था की गाथा है।

सन ्1026 में शुरू हुई मध्यकालीन बर्बरता ने आगे चलकर दूसरों को भी सोमनाथ पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया, लेकिन हर बार, पीढ़ी-दर-पीढ़ी, हमारी महान सभ्यता के लोगों ने खुद को संभाला, मंदिर को फिर से खड़ा किया और उसे पुनः जीवंत किया। सन ् 1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे। वह अनुभव उन्हें भीतर तक आंदोलित कर गया था। सन ्1897 में चेन्नई में दिए गए एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने कहा, ‘दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको ज्ञान के अनगिनत पाठ सिखाएंगे। ये आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे। इन मंदिरों पर सैकड़ों आक्रमणों के निशान हैं, और सैकड़ों बार इनका पुनर्जागरण हुआ है। ये बार-बार नष्ट किए गए, और हर बार अपने ही खंडहरों से फिर खड़े हुए। पहले की तरह सशक्त, पहले की तरह जीवंत। यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवन-धारा है। इसको छोड़ देने का मतलब है, मृत्यु। इससे अलग हो जाने पर विनाश ही होगा।’

यह सर्वविदित है कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया। 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा हुई। उस यात्रा के अनुभव ने भीतर तक झकझोर दिया, उसी समय उन्होंने घोषणा की कि यहीं सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा। अंततः 11 मई, 1951 को सोमनाथ के भव्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। सरदार पटेल इस ऐतिहासिक दिन को देखने के लिए जीवित नहीं थे, लेकिन उनका सपना राष्ट्र के सामने साकार होकर भव्य रूप में उपस्थित था। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस घटना से बहुत उत्साहित नहीं थे। वह नहीं चाहते थे कि राष्ट्रपति व मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी, लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे और फिर जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया।

– कई वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए भारत की ओर देख रही दुनिया
– नए संकल्प के साथ, विकसित भारत के निर्माण के लिए हम तैयार

सोमनाथ मंदिर का कोई भी उल्लेख के एम मुंशी के योगदानों को याद किए बिना अधूरा है। उन्होंने उस समय सरदार पटेल का प्रभावी रूप से समर्थन किया था। सोमनाथ पर उनका कार्य, विशेष रूप से उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ, द आइन इटरनल’ अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। जैसा कि इस पुस्तक के शीर्षक से स्पष्ट होता है, हम एक ऐसी सभ्यता है, जो आत्मा और विचारों की अमरता में अटूट विश्वास रखती है। हम विश्वास करते हैं- नैन छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। सोमनाथ का भौतिक ढांचा नष्ट हो गया, पर उसकी चेतना अमर रही।

इन्हीं विचारों ने हमें हर कालखंड, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने का सामर्थ्य दिया है। इन्हीं मूल्यों और हमारे लोगों के संकल्प की वजह से आज भारत पर दुनिया की नजर है। वह हमारे ‘इनोवेटिव’ युवाओं में निवेश करना चाहती है। हमारी कला, हमारी संस्कृति, हमारा संगीत और हमारे पर्व आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं। योग व आयुर्वेद जैसे विषय पूरी दुनिया में प्रभाव डाल रहे हैं। ये स्वस्थ जीवन को बढ़ावा दे रहे हैं। आज कई वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए दुनिया भारत की ओर देख रही है।

अनादि काल से सोमनाथ जीवन के हर क्षेत्र के लोगों को जोड़ता आया है। अगर हजार साल पहले खंडित हुआ सोमनाथ मंदिर अपने पूरे वैभव के साथ फिर से खड़ा हो सकता है, तो हम हजार साल पहले का समृद्ध भारत भी बना सकते हैं। आइए, इसी प्रेरणा के साथ हम आगे बढ़ते हैं। एक नए संकल्प के साथ, एक विकसित भारत के निर्माण के लिए। एक ऐसा भारत जिसका सभ्यतागत ज्ञान हमें विश्व-कल्याण के लिए प्रयास करते रहने की प्रेरणा देता है।

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