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2026: नया भारत ग्लोबल इकॉनमी का केंद्र

by ब्लिट्ज़ इंडिया
January 3, 2026
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दीपक द्विवेदी
नई दिल्ली। 2026 की पहली किरण के साथ ही भारत के लिए एक गौरवशाली खबर आई है। ताजा आंकड़ों ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि भारत अब जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। 4.18 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी के साथ भारत ने जापान (4.15 ट्रिलियन डॉलर) को मामूली अंतर से पछाड़ दिया है। यह वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती ताकत का बड़ा सबूत है लेकिन, दिल्ली के सरकारी गलियारों और मुंबई के व्यापारिक घरानों में इस जीत का जश्न पूरी सावधानी के साथ मनाया जा रहा है। सरकार जानती है कि असली चुनौती अब शुरू हुई है। जो ‘आसान’ लक्ष्य थे, वो हासिल किए जा चुके हैं। अब अगला लक्ष्य, यानी जर्मनी को पीछे छोड़कर 2028 तक तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना है जो कहीं अधिक गहरे व संरचनात्मक बदलाव की मांग करता है। यह रास्ता पहले से कहीं ज्यादा कठिन और पेचीदा है।
चमक के पीछे की चुनौतियां
ऊपरी तौर पर देखें तो भारत की स्थिति अभी बहुत मजबूत है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने ब्याज दरों में कटौती कर संकेत दिया है कि महंगाई काबू में है और विकास की रफ्तार बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का अनुमान है कि इस साल भारत 6.6% की दर से बढ़ेगा, जो सुस्त पड़ती दुनिया में एक बड़ी मिसाल है।
मगर तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। एक तरफ डेटा सेंटर और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे आधुनिक सेक्टर चमक रहे हैं तो दूसरी तरफ आम जनता की खरीदारी (मास कंसप्शन) की रफ्तार को बढ़ाया जाना अभी अपेक्षित है। अब तक की तरक्क ी का बड़ा हिस्सा सरकारी खर्च और बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) पर टिका रहा है। अगर हमें जर्मनी को पीछे छोड़ना है, तो अब निजी कंपनियों को निवेश के लिए आगे आना होगा। सवाल यह है कि क्या देश के बड़े उद्योगपति जोखिम लेने को तैयार हैं?
क्या हम सिर्फ ‘असेंबली’ कर रहे हैं?
भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है। ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव’ (पीएलआई) स्कीम की वजह से मोबाइल फोन का एक्सपोर्ट तो कई गुना बढ़ा है लेकिन हकीकत यह है कि भारत में फोन के पुर्जे अभी भी बाहर से आ रहे हैं। मोबाइल में इस्तेमाल होने वाले सामान का केवल 18-20% हिस्सा ही भारत में बन रहा है।
जानकारों का कहना है कि अगर हमें ‘मिडिल इनकम ट्रैप’ (मध्यम आय के जाल) से बचना है तो हमें सिर्फ ‘डिब्बे बंद’ करने वाली फैक्ट्री नहीं बल्कि पुर्जे बनाने वाली फैक्ट्री बनना होगा। हमें चिप, स्क्रीन और बैटरी खुद बनानी होगी, तभी असली तरक्क ी होगी।
खेती से फैक्ट्री तक का सफर
सबसे बड़ी चुनौती रोजगार की है। आंकड़ों के मुताबिक, कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़कर 37% हुई है लेकिन इनमें से ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में खेती-बाड़ी से जुड़ी हैं। यह खुशी की बात कम और मजबूरी ज्यादा लगती है।

भा रत को अपनी लेबर फोर्स को खेतों से निकालकर फैक्टि्रयों में लाना होगा। इसके लिए सालों से लटके ‘लेबर कोड’ को लागू करना अब जरूरी हो गया है ताकि श्रमिकों को सुरक्षा मिले और कंपनियों को काम करने की आजादी।
बदलती दुनिया और भारत
पूरी दुनिया में व्यापार के नियम बदल रहे हैं। अमेरिका ने नए टैक्स (टैरिफ) लगा दिए हैं, जिससे हमारे कपड़ा और दवा उद्योग पर बुरा असर पड़ सकता है। अब हम सिर्फ अमेरिका के भरोसे नहीं रह सकते। ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापारिक समझौते (एफटीए) करना अब सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि हमारी जरूरत बन गया है।
निष्कर्ष
चौथे नंबर पर आना हमारी मेहनत और अनुशासन का फल है लेकिन बड़ी अर्थव्यवस्था होने और ‘विकसित’ देश होने में अभी लंबा फासला है। 2026 का संदेश साफ है: ‘असेंबली’ वाली अर्थव्यवस्था हमें यहां तक ले आई लेकिन अब ‘नवाचार’ ही हमें आगे ले जाएगा। जश्न मनाइए लेकिन याद रहे कि असली चढ़ाई अभी बाकी है।
अगला कदम
‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव’ (पीएलआई) या ‘उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन’ योजना है, जो भारत सरकार की एक पहल है जिसका उद्देश्य घरेलू विनिर्माण (मैन्यूफैक्चरिंग) को बढ़ावा देना, निर्यात बढ़ाना और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत भारत को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाना है; इसके तहत, कंपनियों को बढ़ी हुई बिक्री पर वित्तीय प्रोत्साहन (4-6%) मिलता है, जो उन्हें उत्पादन बढ़ाने और प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार करने के लिए प्रोत्साहित करता है, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, सौर मॉड्यूल जैसे क्षेत्रों में। अब हमें पीएलआई स्कीम के आंकड़ों की विसंगतियों और सिर्फ असेंबली बनाम असली मैन्युफैक्चरिंग की सच्चाई पर विस्तार से चर्चा करनी होगी ताकि असली चुनौतियों से निपटा जा सके।

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– सिर्फ जीडीपी ही नहीं, प्रति व्यक्ति आय भी होगी बढ़ानी
– निजी कंपनियों को भी निवेश के लिए आना होगा आगे

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