ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।झारखंड में आज बंद है। वजह भर्ती परीक्षाएँ हैं। लेकिन शोर हटाकर देखिए तो अभ्यर्थियों की माँगों में जो एक बात सबसे नीचे दबी है, वही सबसे ज़रूरी है — तारीख़ें पहले से तय हों, और तय तारीख़ पर काम हो।
रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में 29 जुलाई से अभ्यर्थी धरने पर हैं। मुद्दा झारखंड लोक सेवा आयोग और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों का है। सोमवार को विधानसभा की तरफ़ निकाला गया मार्च रोका गया, और उसके बाद आज राज्यव्यापी बंद का ऐलान हुआ। माँगों की सूची लंबी है — जाँच, एक प्रारंभिक परीक्षा रद्द करने की माँग, और प्रक्रिया में पारदर्शिता। पर इन सबके नीचे एक माँग ऐसी है जो बाक़ी सब हल हो जाने के बाद भी बची रहेगी: भर्ती परीक्षा और रिज़ल्ट का एक पक्का, छपा हुआ कैलेंडर।
जो साल कोई नहीं गिनता: तारीख़ तय न हो तो सबसे बड़ा नुक़सान परीक्षा का नहीं, इंतज़ार में बीते बरसों का होता है।
एक पेपर रद्द होने से एक मौक़ा जाता है। कैलेंडर तय न होने से वो साल जाते हैं जिनमें मौक़े का इंतज़ार होता है।
एक नज़र में
• कहाँ: रांची, झारखंड — 29 जुलाई 2026 से धरना
• मुद्दा: जेपीएससी और जेएसएससी भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी
• सोमवार: विधानसभा की ओर मार्च रोका गया
• आज: राज्यव्यापी बंद
• असली प्रक्रियागत माँग: परीक्षा और रिज़ल्ट का तय कैलेंडर
• देश में बेरोज़गारी दर: जून 2026 में 5.5 फ़ीसदी
• शहरों में: 6.6 फ़ीसदी। गाँवों में: 5.0 फ़ीसदी
• जो ठीक हो सकता है: सालाना कैलेंडर, रिज़ल्ट की तय समय-सीमा, पद संख्या पहले से सार्वजनिक
अब ज़रा 23 साल के एक अभ्यर्थी की जगह रखकर सोचिए। छोटे शहरों और क़स्बों में ग्रेजुएट के लिए सरकारी नौकरी अब भी सबसे बड़ा संगठित मौक़ा है, और उसकी तैयारी पूरे समय का काम है। अगर नोटिफ़िकेशन कब आएगा यह पता न हो, तो वह बीच में कोई निजी नौकरी करे या न करे — तय नहीं कर पाता। अगर रिज़ल्ट कब आएगा यह पता न हो, तो वह कब रुके — यह भी तय नहीं कर पाता। दोनों फ़ैसले टलते जाते हैं, और यही टलना सबसे महँगा पड़ता है। जून के आंकड़े बताते हैं कि देश में बेरोज़गारी दर 5.5 फ़ीसदी है, पर शहरों में 6.6 और गाँवों में 5.0। यह अंतर काम की कमी से कम, पढ़े-लिखे नौजवानों की उस क़तार से ज़्यादा बनता है जो पक्की नौकरी के इंतज़ार में खड़ी है। भर्ती चक्र लेट होने का सीधा मतलब है — क़तार और लंबी।
अच्छी बात यह है कि इस समस्या का हल पैसे का नहीं, व्यवस्था का है। कई आयोग यह पहले से कर रहे हैं: साल भर का कैलेंडर पहले जारी करना, परीक्षा और रिज़ल्ट के बीच दिनों की संख्या तय रखना, पदों की संख्या नोटिफ़िकेशन के साथ ही बताना, आंसर-की पर आपत्ति का मौक़ा देना, और नॉर्मलाइज़ेशन का तरीक़ा परीक्षा से पहले समझा देना — बाद में सफ़ाई देने के बजाय। संघ लोक सेवा आयोग का सालाना कैलेंडर इसका देसी उदाहरण है, और उसे अपनाने में ख़र्च कुछ नहीं है। सीधी बात यह है कि इन आंदोलनों में ग़ुस्सा नतीजे से कम, अनिश्चितता से ज़्यादा होता है। झारखंड सरकार अभ्यर्थियों से बातचीत कर रही है। रास्ता भी साफ़ दिख रहा है — इस बार की शिकायत मौजूदा प्रक्रिया से निपटे, और अगली बार के लिए कैलेंडर तय हो जाए। दूसरी बात ही वह है जो इस कहानी को हर साल दोहराने से रोकेगी।













