ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।26 साल की अस्मिता चालिहा ने कोरिया मास्टर्स जीत लिया — उनके करियर का पहला बीडब्ल्यूएफ वर्ल्ड टूर खिताब, और इस टूर्नामेंट में किसी भी भारतीय की पहली जीत। पहला गेम हारने के बाद।
गुवाहाटी की अस्मिता ने फ़ाइनल में चीन की हान चियानशी को 14-21, 21-14, 21-14 से हराया। हान चौथी वरीयता प्राप्त थीं। कोरिया मास्टर्स बीडब्ल्यूएफ का सुपर 300 टूर्नामेंट है, और इस स्तर या उससे ऊपर का खिताब जीतने वाली भारतीय महिला एकल खिलाड़ियों की सूची छोटी है — साइना नेहवाल और पीवी सिंधु जैसे ओलंपिक पदक विजेताओं के साथ अब अस्मिता का नाम भी उसमें है। रास्ता भी आसान नहीं था। क्वार्टर फ़ाइनल में उन्होंने टूर्नामेंट की टॉप सीड जापान की हिना अकेची को हराया, और सेमीफ़ाइनल में हमवतन रक्षिता रामराज को।
एक गेम पीछे से: फ़ाइनल में पहला गेम 14-21 से हारने के बाद अगले दोनों गेम 21-14 — वही स्कोर, उलटा।
पहला खिताब उम्र से नहीं आता। वो उस दिन आता है जब खिलाड़ी पहला गेम हारकर भी हिसाब बदलना सीख लेता है।
एक नज़र में
• खिलाड़ी: अस्मिता चालिहा, 26 वर्ष, असम
• टूर्नामेंट: कोरिया मास्टर्स, बीडब्ल्यूएफ सुपर 300
• फ़ाइनल: हान चियानशी (चीन) को 14-21, 21-14, 21-14 से हराया
• ख़ास बात: करियर का पहला वर्ल्ड टूर खिताब
• एक और पहली बार: कोरिया मास्टर्स जीतने वाली पहली भारतीय
• क्वार्टर फ़ाइनल: टॉप सीड हिना अकेची (जापान) को हराया
• सेमीफ़ाइनल: रक्षिता रामराज के ख़िलाफ़ भारतीय मुक़ाबला
• उसी हफ़्ते: गांधीनगर में एशियन वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में भारत के 10 पदक
इस जीत में एक और बात नोट करने लायक़ है — सेमीफ़ाइनल भारतीय बनाम भारतीय था। कुछ साल पहले तक यह इत्तेफ़ाक़ माना जाता; अब यह लगातार होने लगा है। किसी भी खेल में असली मज़बूती एक चैंपियन से नहीं, उस भीड़ से आती है जो अंतिम चार तक पहुँचती है। महिला एकल में भारत के पास अब कई नाम हैं जो सुपर 300 और उससे ऊपर के ड्रॉ में टॉप सीड को हरा सकते हैं। यही वो गहराई है जिस पर बड़े टूर्नामेंट के नतीजे टिकते हैं।
अस्मिता का सफ़र इस बात की भी मिसाल है कि पूर्वोत्तर से निकलने वाले खिलाड़ियों को अब मुख्यधारा के सर्किट तक पहुँचने में पहले जैसी दिक़्क़त नहीं होती — अकादमी, कोचिंग और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट का ख़र्च, तीनों पर व्यवस्था बेहतर हुई है। आगे का काम साफ़ है: जूनियर से सीनियर सर्किट में जाने वाले खिलाड़ियों के लिए साल भर पर्याप्त मैच, और चोट प्रबंधन। खिताब जीतना पहला क़दम है, उसे दोहराना असली परीक्षा। अस्मिता ने ख़ुद कहा है कि यह पहला है, आख़िरी नहीं — और 26 की उम्र में उनके पास इसे साबित करने का पूरा वक़्त है।













