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बुवाई पटरी पर, अब नज़र अगस्त की बारिश पर

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 11, 2026
in the blitz, कृषि
0
दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।जून के आख़िर में खरीफ की बुवाई पिछले साल से करीब 23 फ़ीसदी पीछे थी। जुलाई ख़त्म होते-होते यह फ़ासला घटकर करीब 3 फ़ीसदी रह गया। किसान ने बारिश का इंतज़ार किया और फिर तेज़ी से बुवाई की। अब सवाल अगस्त का है।

25 जून तक बुवाई का रकबा पिछले साल के मुक़ाबले करीब 23 फ़ीसदी कम था। 31 जुलाई तक यह कमी घटकर करीब 3 फ़ीसदी रह गई, और बुवाई सामान्य क्षेत्र के करीब 87.7 फ़ीसदी तक पहुँच गई। फ़सलवार देखें तो धान 2.2 फ़ीसदी और कपास 2.4 फ़ीसदी पीछे हैं — यानी लगभग बराबरी पर। दालें और मोटे अनाज अब भी 6 से 8 फ़ीसदी पीछे चल रहे हैं। मानसून की कुल कमी 9 अगस्त तक घटकर सामान्य से करीब 11 फ़ीसदी नीचे आ गई थी।

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देर से, पर पूरी: बुवाई का पिछड़ना और फिर पकड़ लेना — यह भारतीय किसान की सबसे कम गिनी जाने वाली क्षमता है।

बुवाई का फ़ासला भर गया, यह अच्छी ख़बर है। पर जो दो फ़सलें अब भी पीछे हैं, वही थाली में सबसे जल्दी दिखती हैं।

एक नज़र में

• 25 जून तक: बुवाई पिछले साल से करीब 23 फ़ीसदी पीछे
• 31 जुलाई तक: फ़ासला घटकर करीब 3 फ़ीसदी
• सामान्य क्षेत्र का: करीब 87.7 फ़ीसदी
• धान: 2.2 फ़ीसदी पीछे। कपास: 2.4 फ़ीसदी पीछे
• दालें और मोटे अनाज: 6 से 8 फ़ीसदी पीछे
• मानसून की कमी: 9 अगस्त तक करीब 11 फ़ीसदी
• अगस्त का अनुमान: सामान्य से कम बारिश (94 फ़ीसदी से नीचे)
• अगस्त का हिस्सा: सीज़न की करीब 29 फ़ीसदी बारिश, खरीफ की करीब 20 फ़ीसदी बुवाई
• 13 अगस्त के आसपास: बंगाल की खाड़ी में नया कम दबाव का क्षेत्र संभव

अब आगे की बात। मौसम विभाग ने अगस्त के लिए सामान्य से कम बारिश का अनुमान दिया है — दीर्घावधि औसत के 94 फ़ीसदी से नीचे। यह इसलिए मायने रखता है क्योंकि पूरे मानसून सीज़न की करीब 29 फ़ीसदी बारिश अगस्त में ही होती है, और खरीफ की करीब 20 फ़ीसदी बुवाई भी इसी महीने। यानी बुवाई का काम भले पटरी पर आ गया हो, फ़सल का असली इम्तिहान अभी बाक़ी है — बुवाई और कटाई के बीच जो पानी चाहिए, वो अगस्त और सितंबर से आता है। राहत की एक ख़बर यह है कि 13 अगस्त के आसपास उत्तर-पश्चिम बंगाल की खाड़ी में नया कम दबाव का क्षेत्र बनने के आसार हैं, जिससे ओडिशा और पूर्वी इलाक़ों में एक और दौर की बारिश मिल सकती है।

घर के बजट से इसका सीधा रिश्ता है। दालें और मोटे अनाज ही वो दो समूह हैं जो रकबे में सबसे ज़्यादा पीछे हैं, और यही वो चीज़ें हैं जो मंडी से थाली तक सबसे तेज़ी से पहुँचती हैं। कल आने वाले जुलाई के महंगाई आंकड़े में भी दालें और खाद्य तेल दबाव वाली चीज़ों में गिनाए जा रहे हैं। किसान के लिए काम की बात यह है: जहाँ बुवाई देर से हुई है, वहाँ कम अवधि वाली क़िस्में और सही समय पर सिंचाई का इंतज़ाम अब सबसे ज़्यादा फ़र्क़ डालेगा; और जहाँ दलहन का रकबा कम रह गया, वहाँ अगली रबी में उसकी भरपाई की गुंजाइश बनती है। ज़िला कृषि दफ़्तर की सलाह और मौसम विभाग का हफ़्तेवार पूर्वानुमान — ये दो चीज़ें इस महीने रोज़ देखने लायक़ हैं।

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