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बाढ़ के आरोप ख़ारिज: भारत ने पाकिस्तान के अपने ही आंकड़े सामने रखे

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 25, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।भारत ने पाकिस्तान के उन आरोपों को दो टूक ख़ारिज कर दिया है जिनमें कहा गया था कि उसने जानबूझकर पानी छोड़कर बाढ़ की स्थिति पैदा की। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को इन दावों को निराधार और तकनीकी रूप से अटिकाऊ बताते हुए कहा कि चिनाब नदी में हाल का बढ़ा हुआ बहाव 20 से 23 जुलाई के बीच जम्मू और उससे लगे जलग्रहण क्षेत्रों में हुई भारी मानसूनी बारिश का सीधा नतीजा है — यानी वही बारिश जिसने भारत के अपने उत्तरी पहाड़ों में बाढ़ और भूस्खलन की तबाही मचाई है।

भारत का जवाब सबसे मज़बूत ज़मीन पर टिका था — ख़ुद सामने वाले का रिकॉर्ड। भारत ने याद दिलाया कि लाहौर स्थित पाकिस्तान के अपने बाढ़ पूर्वानुमान प्रभाग ने भी चिनाब में भारी बहाव को ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में हुई मूसलाधार बारिश से जोड़ा था। बाढ़ से जुड़ी जानकारी रोक लेने के आरोप पर मंत्रालय ने कहा कि यह सुझाव तथ्यों पर आधारित नहीं है, और दोहराया कि भारत मानवीय आधार पर, कूटनीतिक माध्यमों से, ज़रूरत पड़ने पर उच्च-बाढ़ के आंकड़े पाकिस्तान से साझा करता रहेगा।

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वजह बारिश, इरादा नहीं: भारत ने चिनाब के बढ़े बहाव को 20–23 जुलाई के बीच जम्मू और आसपास के जलग्रहण क्षेत्रों की भारी मानसूनी बारिश से जोड़ा, और बताया कि पाकिस्तान का अपना बाढ़ पूर्वानुमान प्रभाग भी यही कारण बता चुका है।

सबसे असरदार जवाब अक्सर सबसे ऊंची आवाज़ वाला नहीं होता। यहां जवाब बना — बारिश का रिकॉर्ड, नदी के बहाव का आंकड़ा, और ख़ुद सामने वाले के विभाग का हवाला।

एक नज़र में

• भारत का रुख़: आरोप निराधार और तकनीकी रूप से अटिकाऊ
• बताई गई वजह: 20–23 जुलाई को जम्मू के जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश
• पुष्टि: पाकिस्तान के लाहौर स्थित बाढ़ पूर्वानुमान प्रभाग का भी यही आकलन
• वचन: मानवीय आधार पर उच्च-बाढ़ के आंकड़े साझा करना जारी

यह पूरा मामला उस मानसून की पृष्ठभूमि में है जो सीमा के दोनों ओर भारी पड़ा है। जिस बारिश ने चिनाब को उफनाया, उसी ने जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर में जानें लीं और हज़ारों लोगों को विस्थापित किया; मौसम विभाग ने 20 जुलाई को उत्तराखंड और मेघालय के हिस्सों में बेहद भारी वर्षा दर्ज की। इस बेसिन की नदियां वही दिखाती हैं जो उनके ऊपर के पहाड़ों पर बरसता है — और जिस जलग्रहण क्षेत्र में असाधारण बारिश हो, वहां से असाधारण बहाव ही निकलेगा, चाहे नीचे या ऊपर बैठा कोई भी प्रशासन कुछ भी चाहता हो।

आगे का रचनात्मक रास्ता वही है जिसका संकेत भारत ने दिया है: राजनीतिक तापमान चाहे जो हो, मानवीय माध्यम खुला रखा जाए। बाढ़ की चेतावनियां दोनों किनारों पर जान बचाती हैं, और कूटनीतिक माध्यम से उच्च-बाढ़ के आंकड़े साझा करने का वादा इसीलिए निभाने लायक़ है कि मानसून सरहदें नहीं देखता। बड़ा सबक़ पूरे बेसिन के लिए है — जैसे-जैसे हिमालयी क्षेत्र में अतिवृष्टि की घटनाएं बढ़ रही हैं, असली निवेश साझा मौसम-समझ, बेहतर जलग्रहण पूर्वानुमान और बाढ़-रोधी ढांचे में है। जल-विज्ञान राजनीति का कमज़ोर औज़ार है, पर सहयोग का बेहतरीन आधार।

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