ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।मतदान केंद्र पर, मेले के गेट पर, त्योहार की भीड़ में खाकी में खड़ा वह आदमी अक्सर पुलिस नहीं होता। वह पीआरडी का जवान होता है। और मंगलवार तक उसके पास अपना कोई कैशलेस इलाज का हक़ नहीं था।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 18 अगस्त को गोरखपुर में प्रांतीय रक्षक दल (पीआरडी) के जवानों के सम्मेलन में ‘मुख्यमंत्री पीआरडी कैशलेस चिकित्सा योजना’ की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुँचना चाहिए, और प्रदेश में वर्दीधारी कर्मियों के लिए आवास और सुविधाओं के काम का ज़िक्र किया।
मुख्यमंत्री ने कहा, “जब अच्छी सरकार आती है तो सबके ‘अच्छे दिन’ आते हैं। पहले पुलिस अधिकारियों और कर्मियों के लिए बैरक की ठीक सुविधा नहीं थी। प्रदेश में 56 ज़िले ऐसे हैं जहाँ सबसे ऊँची इमारत पुलिस बैरक होगी… लखनऊ में प्रांतीय रक्षक दल के लिए भी बहुमंज़िला बैरक बनी है। बदलाव किसी एक वर्ग के लिए नहीं होता… मैं इस सुविधा पर सभी अधिकारियों और स्वयंसेवकों को बधाई देता हूँ।”
गोरखपुर, 18 अगस्त: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रांतीय रक्षक दल के जवानों के सम्मेलन में कैशलेस चिकित्सा योजना की शुरुआत की।
पैसे बाद में वापस मिलने वाली योजना और अस्पताल में पहले पैसे न देने वाली योजना — ये दो अलग चीज़ें हैं। इस आमदनी वाले घर के लिए यही पूरा फ़र्क़ है।
एक नज़र में
• योजना: मुख्यमंत्री पीआरडी कैशलेस चिकित्सा योजना
• शुरुआत: गोरखपुर, 18 अगस्त 2026
• किसने शुरू की: योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश
• मौक़ा: प्रांतीय रक्षक दल के जवानों का सम्मेलन
• किसे फ़ायदा: पीआरडी स्वयंसेवक — मतदान केंद्र, मेला, त्योहार और भीड़ प्रबंधन में तैनात
• साथ में: लखनऊ में पीआरडी के लिए बहुमंज़िला बैरक; 56 ज़िलों में पुलिस बैरक कार्यक्रम
• इसी महीने: 15 अगस्त को ‘युवा ब्रिगेड योजना’ की घोषणा
प्रांतीय रक्षक दल की जगह प्रदेश की व्यवस्था में अजीब है। ये जवान न नियमित पुलिस हैं, न उन्हें उतना वेतन मिलता है। लेकिन चुनाव के दिन बूथ पर, धार्मिक मेलों में, त्योहार की भीड़ में और ज़िले के कार्यक्रमों में वर्दी में जो चेहरा आम आदमी को सबसे पहले दिखता है, वह अक्सर इन्हीं का होता है। और सुविधाओं के मामले में यही तबका सबसे नीचे रहा है।
कैशलेस सुविधा एक बहुत ठोस चीज़ बदलती है। अस्पताल के काउंटर पर वह पल हट जाता है जब परिवार को पहले पैसे का इंतज़ाम करना पड़ता है और दावा बाद में करना पड़ता है। अब असली सवाल यह है कि योजना ज़मीन पर कितनी चलती है, और वह एक ही बात से तय होगा — ज़िलों में कितने अस्पताल इस योजना से जुड़े हैं। पीआरडी के जवान ज़्यादातर गोरखपुर, बस्ती, देवीपाटन और पूर्वांचल के ज़िलों में रहते हैं, राजधानी में नहीं। अगर ज़िलेवार सूचीबद्ध अस्पतालों की सूची और दावा निपटान का औसत समय सार्वजनिक कर दिया जाए, तो जवान को ज़रूरत पड़ने से पहले पता होगा कि कार्ड चलेगा या नहीं। छोटा-सा प्रशासनिक क़दम है, पर यही घोषणा को हक़ में बदलता है।











