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100 में 52 बच्चे ही माध्यमिक तक टिकते हैं

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 17, 2026
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शिक्षक

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।पहली से तीसरी कक्षा तक 100 में 98 बच्चे स्कूल में टिके रहते हैं। माध्यमिक कक्षाओं में यह संख्या 52 रह जाती है। भारतीय शिक्षा की पूरी कहानी इन दो नंबरों के बीच है।

शिक्षा मंत्रालय की यूडीआईएसई प्लस रिपोर्ट 2025-26 आज सामने आई। इसमें देश के 14.67 लाख स्कूल, 1.03 करोड़ शिक्षक और 24.72 करोड़ से ज़्यादा बच्चे शामिल हैं — औसतन हर स्कूल में सात शिक्षक और 169 बच्चे। छात्र-शिक्षक अनुपात 24:1 है, जो नई शिक्षा नीति के 30:1 के मानक से बेहतर है। चरण के हिसाब से यह और अच्छा है — फ़ाउंडेशन में 10:1, प्रेपरेटरी में 12:1, मिडिल में 17:1 और सेकंडरी में 21:1। यानी शिक्षक की उपलब्धता वह समस्या नहीं है जो आम बातचीत में मान ली जाती है।

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असली बात बच्चों के टिकने के आँकड़े में है। फ़ाउंडेशन स्तर पर 98.5 प्रतिशत बच्चे टिके रहते हैं, प्रेपरेटरी में 91.1, मिडिल में 83.7 — और सेकंडरी में सिर्फ़ 51.9 प्रतिशत। एक चरण से दूसरे में जाने की दर तो अच्छी है: 99.2, 93.8 और 88.3 प्रतिशत। दोनों आँकड़े साथ पढ़िए तो बात साफ़ हो जाती है — बच्चे अगली कक्षा में चढ़ते हैं, और उसके बाद बीच में छोड़ देते हैं। बीच में पढ़ाई छोड़ने की दर प्रेपरेटरी में 1.8 प्रतिशत, मिडिल में 3.6 और सेकंडरी में 7.0 प्रतिशत है। यानी दिक़्क़त दाख़िले की नहीं, स्कूल के आख़िरी चार साल की है।

आख़िरी चार साल: स्कूल की एक कक्षा। मिडिल स्तर पर 83.7 प्रतिशत बच्चे टिकते हैं, सेकंडरी में यह गिरकर 51.9 प्रतिशत रह जाता है — रिपोर्ट का सबसे बड़ा अंतर यही है।

बच्चे अगली कक्षा में चढ़ते हैं, और फिर छोड़ देते हैं। दिक़्क़त दाख़िले में नहीं, स्कूल के आख़िरी चार साल में है।

एक नज़र में

• रिपोर्ट: यूडीआईएसई प्लस 2025-26, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग
• दायरा: 14.67 लाख स्कूल, 1.03 करोड़ शिक्षक, 24.72 करोड़ छात्र
• औसत: हर स्कूल में 7 शिक्षक, 169 बच्चे
• छात्र-शिक्षक अनुपात: 24:1 (एनईपी का मानक 30:1)
• चरण के हिसाब से: 10:1, 12:1, 17:1, 21:1
• टिकने की दर: 98.5%, 91.1%, 83.7%, 51.9%
• अगले चरण में जाने की दर: 99.2%, 93.8%, 88.3%
• पढ़ाई छोड़ने की दर: प्रेपरेटरी 1.8%, मिडिल 3.6%, सेकंडरी 7.0%
• सकल नामांकन अनुपात: मिडिल 89.6%, सेकंडरी 71.7%
• एक शिक्षक वाले स्कूल: करीब 3% घटकर 1,00,843
• शून्य नामांकन वाले स्कूल: 29% घटकर 5,663
• लड़कियाँ: कुल नामांकन में 48.4% · महिला शिक्षक: 54.9%
• कंप्यूटर: 69.9% स्कूलों में · इंटरनेट: 67.4% में
• बिजली 95%, पीने का पानी 99.5%, लड़कियों के शौचालय 98.5%, लाइब्रेरी 90.5%

इसी रिपोर्ट में दो नंबर बताते हैं कि जब समस्या नापी जाती है तो सुधर भी जाती है। एक शिक्षक के भरोसे चलने वाले स्कूल करीब 3 प्रतिशत घटकर 1,00,843 रह गए, और शून्य नामांकन वाले स्कूल — यानी जिनके रजिस्टर में एक भी बच्चा नहीं — एक साल में 29 प्रतिशत घटकर 5,663 रह गए। 29 प्रतिशत की गिरावट अपने-आप नहीं होती; यह शिक्षकों की तैनाती दुरुस्त करने और बंद पड़े स्कूलों को मिलाने का नतीजा है। सुविधाएँ भी सुधरी हैं: 95 प्रतिशत स्कूलों में बिजली, 99.5 में पीने का साफ़ पानी, 98.5 में लड़कियों के शौचालय, 90.5 में लाइब्रेरी, 69.9 में कंप्यूटर और 67.4 प्रतिशत में इंटरनेट।

माध्यमिक स्तर पर बच्चों का छूटना आज की ख़बर नहीं, भारतीय स्कूल व्यवस्था की पुरानी और पक्की समस्या है — और इसीलिए इसका इलाज भी हर साल की नई योजना नहीं, ढाँचे में बदलाव है। कारण जाने-पहचाने हैं और ज़्यादातर आर्थिक: पंद्रह की उम्र में बच्चे की मज़दूरी की क़ीमत बन जाती है, माध्यमिक स्कूल मिडिल स्कूल से दूर होता है, और लड़कियों के लिए दूरी के साथ सुरक्षा की चिंता जुड़ जाती है। रास्ते भी साफ़ हैं — पास में माध्यमिक स्कूल, न हो तो आने-जाने या रहने का इंतज़ाम, ऐसे व्यावसायिक विषय जिनसे आख़िरी चार साल नौकरी की राह लगें, और हाज़िरी पर ऐसी नज़र कि स्कूल को दूसरे हफ़्ते में पता चल जाए कि कौन बच्चा आना बंद कर चुका है। सेकंडरी में सकल नामांकन 71.7 प्रतिशत है और मिडिल में 89.6 — इन 18 अंकों को भरना भारतीय शिक्षा में आज सबसे ज़्यादा फ़ायदे का काम है, और उसे नापने वाला सिस्टम पहले से मौजूद है।

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