ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। ‘जब तक आप अपना लक्ष्य पाने के लिए अपने अंदर जुनून और आग नहीं जगाते, तब तक आप सिर्फ बाहरी स्रोतों से कुछ खास हासिल नहीं कर सकते। सपने कंफर्ट जोन में तो नहीं मिलते।’ यह कहना है 18 साल की तन्वी शर्मा का जिन्होंने छोटी-सी उम्र में इंडियन मर्चेंट नेवी में शामिल होकर अपने परिवार का मान बढ़ाया है। तन्वी शर्मा की सक्सेस स्टोरी देश की उन अनगिनत बेटियों के लिए प्रेरणा है, जो कुछ अलग करके परिवार का नाम रोशन करना चाहती हैं।
तन्वी शर्मा, कश्मीर के राजौरी की रहने वाली हैं। उन्होंने 10वीं क्लास में ठान लिया था कि उन्हें करियर में आगे क्या करना है। तन्वी ने कहा, ’12वीं पास करने के बाद मेरे पास कई ऑप्शन थे, क्योंकि मेरे पास फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स और बायोलॉजी था। इसलिए मैं इंजीनियरिंग के लिए जेईई या मेडिकल के लिए नीट, दोनों में से कोई भी ऑप्शन चुन सकती थी।’ उन्होंने ये दोनों ऑप्शन छोड़कर मर्चेंट नेवी को चुना।
मर्चेंट नेवी चुनने की वजह
मर्चेंट चुनने के पीछे की वजह के बारे में बात करते हुए तन्वी कहती हैं, ‘मैं एक ऐसा करियर सर्च कर रही थी, जो सबसे अलग हो। मुझे लगा कि कुछ ऐसा करना चाहिए जिसमें मैं आने वाली पीढ़ी के लिए एक उदाहरण सेट कर सकूं, ताकि वे प्रेरित होकर कुछ नया करने के बारे में सोचें। अपने राज्य, स्कूल और परिवार पर गर्व कर सकें।
परिवार की डांट सुनी, संघर्ष किया
तन्वी के लिए यहां तक पहुंचना आसान नहीं था। उनके पिता शुरू में बेटी को मर्चेंट नेवी में भेजने को लेकर खुश नहीं थे। कई बार तन्वी को डांटा भी। फिर मां ने सपोर्ट किया। उन्होंने पिता को मनाया कि कम से कम पहले एग्जाम देने के लिए जाना चाहिए। यहीं से तन्वी को नई उड़ान भरने का मौका मिला। इस मौके पर उनकी मां हर वक्त उनके साथ थी।
मां ने बढ़ाया हौसला
जब परिवार के लोग तन्वी के फैसले से खुश नहीं थे, तब उनकी मां सुमन शर्मा उनके सपने के लिए ढाल बनकर खड़ी थीं। तन्वी कहती हैं, ‘इस कामयाबी का सबसे बड़ा श्रेय मेरी मां को जाता है। क्योंकि परीक्षा के लिए दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर और कभी-कभी गोवा भी जाना पड़ता था। मेरे साथ कोई जाने वाला नहीं था, तो मैं मम्मी के साथ जाती थी।
तन्वी की मां सुमन शर्मा बताती हैं कि बेटी को शुरू से नेवी में जाने का सपना था और उसने इसके लिए बहुत मेहनत की है। स्कूलों वालों ने भी बहुत मदद की। उन्होंने कहा, ’10वीं क्लास के बाद, उसने (तन्वी शर्मा) खुद तय कर लिया था कि उसे यही रास्ता चुनना है। शुरू में, उसके पिता उसे भेजने को लेकर हिचकिचा रहे थे लेकिन मैंने कहा कि कम से कम उसे परीक्षा तो देने दें। उसने परीक्षा पास की और उसका सपना पूरा हो गया।’














