ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।दशकों तक भारत की ज़मीन से अंतरिक्ष तक पहुंचना सिर्फ़ सरकार का काम रहा। इस महीने यह बदल गया। हैदराबाद के स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस के बनाए रॉकेट ने श्रीहरिकोटा से उड़ान भरी और अपने उपग्रहों को 450 किलोमीटर की कक्षा में स्थापित कर दिया — और इसके साथ भारत दुनिया का सिर्फ़ तीसरा देश बन गया, अमेरिका और चीन के बाद, जहां किसी निजी कंपनी ने अपनी मशीनें ख़ुद अंतरिक्ष तक पहुंचाई हैं। इस मिशन का नाम था ‘आगमन’ — और इसने अपने नाम को सच कर दिखाया।
उड़ान के पीछे के आंकड़े इंजीनियरों को चुपचाप गर्व से भर देते हैं। चार चरणों वाला, सात मंज़िल ऊंचा विक्रम-1 छोटे उपग्रहों को लेकर जाने वाला रॉकेट है, जो करीब 350 किलोग्राम वज़न को निचली कक्षा तक पहुंचा सकता है। इसने लगभग सत्रह मिनट में अपनी तय ऊंचाई छू ली और कई ग्राहकों के उपग्रह छोड़े — जिनमें एक भारतीय पृथ्वी-निगरानी उपग्रह और अंतरिक्ष के मलबे को पकड़ने वाला एक रोबोटिक हाथ भी शामिल था। साल 2018 में बनी स्काईरूट इस साल की शुरुआत में एक अरब डॉलर के मूल्यांकन को छूने वाली पहली भारतीय अंतरिक्ष कंपनी बनी थी। इस उड़ान ने उस भरोसे को नतीजे में बदल दिया।
एक नए अंतरिक्ष युग की शुरुआत: स्काईरूट के विक्रम-1 ने श्रीहरिकोटा से उड़ान भरकर पहली ही कोशिश में 450 किमी की कक्षा छुई — और भारत को अमेरिका व चीन के बाद निजी कक्षीय प्रक्षेपण वाला तीसरा देश बना दिया।
सरकारी एजेंसी ने साबित किया कि भारत अंतरिक्ष तक पहुंच सकता है। निजी उड़ान साबित करती है कि अब भारत यह बार-बार कर सकता है — ऐसी रफ़्तार पर, जिस पर बाज़ार कारोबार खड़ा कर सके।
एक नज़र में
• उपलब्धि: भारत का पहला निजी कक्षीय रॉकेट, स्काईरूट का विक्रम-1 (मिशन ‘आगमन’)
• कारनामा: श्रीहरिकोटा से ~17 मिनट में ~450 किमी की कक्षा
• रॉकेट: चार चरण, सात मंज़िल ऊंचा; ~350 किग्रा निचली कक्षा तक
• कंपनी: 2018 में स्थापित; एक अरब डॉलर मूल्यांकन छूने वाली पहली भारतीय अंतरिक्ष कंपनी
एक उड़ान इस पल की ख़ुशी से आगे क्यों मायने रखती है? क्योंकि यह बताती है कि 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने का फ़ैसला अब असली फल दे रहा है। एक चलता-फिरता निजी रॉकेट छोटे उपग्रहों को कक्षा में भेजने की लागत घटाता है और लाइन छोटी करता है — वही उपग्रह जो बाढ़ का नक़्शा बनाते हैं, किसानों को राह दिखाते हैं, दूर के स्कूलों को जोड़ते हैं और डेटा-अर्थव्यवस्था को ताक़त देते हैं। यह प्रतिभाशाली भारतीय इंजीनियरों को विदेश जाने के बजाय देश में ही रॉकेट बनाने का मौक़ा भी देता है, और भारत को छोटे-उपग्रह प्रक्षेपण के उस वैश्विक बाज़ार में जगह दिलाता है जिसे भरोसेमंद और सस्ती उड़ानों की तलाश है।
ईमानदार बात यह है कि एक सफल उड़ान शुरुआत है, कारोबार नहीं। स्काईरूट और उसके साथियों को अब कई उड़ानों में लगातार भरोसा, रफ़्तार और सही क़ीमत साबित करनी होगी; इसरो एक साथी और सहारा बना रहेगा, प्रतिद्वंद्वी नहीं; और इस पूरे तंत्र को परखने की सुविधाएं, धैर्य वाला निवेश और साफ़ नियम चाहिए। सकारात्मक रास्ता ठीक इसी साझेदारी की रक्षा करना है — एक सरकारी एजेंसी जो अपने लॉन्च पैड और जानकारी खोले, निजी कंपनियां जो लागत और रफ़्तार पर नए प्रयोग करें, और एक नीति जो दोनों को बढ़ावा दे। इस तरह देखें तो एक स्टार्टअप की पहली कक्षा भारत के दूसरे अंतरिक्ष युग की पहली पंक्ति बन जाती है।












