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क्रांतिकारी बदलाव: अब आम जनों के लिए हुए पद्म पुरस्कार

पीपल्स पद्म’ से बदली देश की सम्मान परंपरा

by ब्लिट्ज़ इंडिया
February 2, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। गणतंत्र दिवस 2026 पर घोषित पद्म पुरस्कारों की सूची इस बार केवल सम्मान पाने वाले नामों की घोषणा नहीं रही, बल्कि इसने देश की सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रणाली में आए एक गहरे और स्थायी बदलाव को सामने रखा है। वर्षों तक प्रभाव, सिफारिश और सीमित दायरे से जुड़ी मानी जाने वाली यह परंपरा अब व्यापक जनभागीदारी और जमीनी योगदान पर आधारित होती दिखाई दे रही है।
सरकारी प्रक्रिया में किए गए संरचनात्मक सुधारों के बाद पद्म पुरस्कार अब “पहचान वालों का सम्मान” न रहकर “योगदान करने वालों की पहचान” बनते जा रहे हैं। यही बदलाव अब ‘पीपल्स पद्म’ के रूप में उभरकर सामने आया है।
सिफारिश से चयन तक का सफर
लंबे समय तक पद्म पुरस्कारों के लिए नामांकन की प्रक्रिया मुख्य रूप से राज्य सरकारों, मंत्रालयों और संस्थागत चैनलों के माध्यम से होती रही। इसके चलते शहरी क्षेत्रों और स्थापित चेहरों का वर्चस्व बना रहता था। ग्रामीण, आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों में कार्य करने वाले लोगों की भागीदारी सीमित थी।
राष्ट्रीय पुरस्कार पोर्टल की शुरुआत के बाद यह व्यवस्था बदली। अब कोई भी नागरिक किसी व्यक्ति के कार्यों के आधार पर उसका नाम प्रस्तावित कर सकता है। इस प्रक्रिया ने पारंपरिक ‘लॉबिंग कल्चर’ को कमजोर किया है और चयन का केंद्र पद, प्रसिद्धि या राजनीतिक पहचान से हटकर सामाजिक प्रभाव पर आ गया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2026 में कुल 131 व्यक्तियों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिनमें लगभग एक-तिहाई ऐसे लोग हैं जो अब तक राष्ट्रीय मंच पर अपेक्षाकृत अज्ञात रहे हैं।
जमीनी भारत को मिला स्थान
इस वर्ष की सूची में कई ऐसे नाम सामने आए हैं जिन्होंने दशकों तक बिना प्रचार या मंच के समाज के लिए कार्य किया। कर्नाटक के पूर्व बस कंडक्टर अंके गौड़ा को ग्रामीण क्षेत्र में मुफ्त पुस्तकालय आंदोलन खड़ा करने के लिए सम्मानित किया गया है। उनकी पहल ने सैकड़ों बच्चों को शिक्षा से जोड़ा।
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लंबे समय से स्वास्थ्य सेवाओं में जुटे डॉ. बुधरी ताटी को पद्म सम्मान दिया जाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि चयन प्रक्रिया में अब कठिन परिस्थितियों में किए गए सतत सामाजिक कार्यों को प्राथमिकता दी जा रही है।
राष्ट्रीय योगदान और राजनीतिक संतुलन
2026 की सूची में विभिन्न क्षेत्रों के योगदानकर्ताओं के बीच संतुलन भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। फिल्म अभिनेता धर्मेंद्र सिंह देओल को मरणोपरांत पद्म विभूषण प्रदान किया गया, जबकि मलयालम सिनेमा के वरिष्ठ अभिनेता ममूटी को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। राजनीतिक क्षेत्र से केरल के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ विपक्षी नेता वी.एस. अच्युतानंदन को शामिल किया जाना भी उल्लेखनीय रहा। विश्लेषकों के अनुसार, यह चयन इस बात की ओर संकेत करता है कि राष्ट्रीय सम्मानों में वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर सार्वजनिक जीवन में किए गए योगदान को महत्व दिया जा रहा है।
विविधता और बदलता सामाजिक चेहरा
इस वर्ष पद्म पुरस्कारों में सामाजिक विविधता भी प्रमुख रूप से दिखाई दी। कुल 19 महिलाओं को विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। स्वास्थ्य, शिक्षा, खेल और सामाजिक सेवा से जुड़ी महिलाओं की उपस्थिति को बदलते सामाजिक परिदृश्य का प्रतिबिंब माना जा रहा है। खेल जगत से भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रोहित शर्मा और महिला टीम की कप्तान हरमनप्रीत कौर को सम्मान मिलना देश की नई खेल संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों को मान्यता देने के रूप में देखा जा रहा है।
इसके अलावा, विदेशों में कार्यरत प्रवासी भारतीयों को सूची में शामिल किए जाने को भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा और बढ़ती सॉफ्ट पावर से जोड़ा जा रहा है।
सम्मान की नई परिभाषा
विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में पद्म पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया में आए ये बदलाव इसे केवल औपचारिक सम्मान से आगे ले गए हैं। अब यह प्रक्रिया समाज में सकारात्मक योगदान देने वाले व्यक्तियों को सामने लाने का माध्यम बनती जा रही है।
2026 की पद्म सूची को उसी परिवर्तनशील सोच का संकेत माना जा रहा है, जिसमें भारत अब प्रसिद्धि नहीं, प्रभाव को महत्व देता है और सम्मान को प्रेरणा का माध्यम बनाता है।
– अब सम्मान पद और पहुंच से नहीं, जुझारू योगदान से हो रहा है तय

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