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स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी पैड देना अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट

कहा, हर स्कूल में छात्राओं के लिए अलग शौचालय हों

by ब्लिट्ज़ इंडिया
February 7, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में मासिक धर्म स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के अधिकार को संविधान प्रदत्त जीवन के अधिकार और मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा के अधिकार का अभिन्न अंग माना है। शीर्ष अदालत ने देशभर के स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराना अनिवार्य कर दिया। यह निर्देश भी दिया कि हर स्कूल में चालू हालत में स्वच्छ और छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय होने चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निर्देशों के उल्लंघन पर स्कूल की मान्यता निरस्त होगी।
अदालत ने कहा, मासिक धर्म से जुड़ी स्वच्छता सुविधाओं एवं उत्पादों तक पहुंच के बिना न तो बालिकाओं की गरिमा सुरक्षित रह सकती है, न ही समानता, शिक्षा व सहभागिता के अधिकारों की पूर्ण रक्षा हो सकती है। इन सहूलियतों को उपलब्ध न कराना सेहत के साथ, बालिकाओं की गरिमा, शिक्षा एवं समानता के अधिकार का भी उल्लंघन है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं के लिए केंद्र सरकार की राष्ट्रीय नीति छात्राओं के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति के देशव्यापी क्रियान्वयन के निर्देश दिए। पीठ ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से सुनिश्चित करने के लिए कहा कि ये सुविधाएं सभी स्कूलों में उपलब्ध कराई जाएं, चाहे वह सरकारी हों, सहायता प्राप्त हों या निजी हों। यह नीति सभी सरकारी व निजी, शहरी व ग्रामीण स्कूलों पर लागू होगी। पीठ ने कहा, अगर सरकारें अलग शौचालय और सैनिटरी पैड देने में विफल रहती हैं, तो उन्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा। सभी सरकारों को इन निर्देशों को तीन महीने में लागू करने के लिए कहा गया है। पीठ ने कहा, स्वस्थ प्रजनन जीवन के अधिकार में यौन स्वास्थ्य से जुड़े शिक्षा व जानकारी प्राप्त करने का हक भी शामिल है। इस मामले में कोर्ट की यह तय करना था कि क्या स्कूलों में लिंग-आधारित शौचालयों की कमी व मासिक धर्म अवशोषक सामग्री तक पहुंच न होना शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है।
ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल हों सैनिटरी
नैपकिन पीठ ने कहा कि स्कूलों
में छात्राओं को एएसडीएम-694 मानकों के अनुरूप अक्सिो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन मुफ्त में उपलब्ध कराए जाएं। नैपकिन शौचालय परिसर में वेडिंग मशीनों के माध्यम से या किसी तय स्थान पर आसानी से उपलब्ध हों।
शौचालयों में हर समय हो पानी व साबुन की व्यवस्था पीठ ने कहा, छात्र-छात्राओं के लिए स्कूलों में अलग-अलग शौचालयों में हर समय पानी व साबुन उपलब्ध रहें। शौचालयों का निर्माण और रखरखाव इस तरह किया जाए कि छात्राओं की निजता और गरिमा बनी रहे। दिव्यांग बच्चों की जरूरतें ध्यान रखते हुए शौचालयों की सुलभता सुनिश्चित की जाए।
शौचालयों में हर समय हो पानी व साबुन की व्यवस्था
पीठ ने कहा, छात्र-छात्राओं के लिए स्कूलों में अलग-अलग शौचालयों में हर समय पानी व साबुन उपलब्ध रहें। शौचालयों का निर्माण और रखरखाव इस तरह किया जाए कि छात्राओं की निजता और गरिमा बनी रहे। दिव्यांग बच्चों की जरूरतें ध्यान रखते हुए शौचालयों की सुलभता सुनिश्चित की जाए।
आदेश सिर्फ अदालतों और कानूनी किताबों तक सीमित न रहे
यह निर्णय सिर्फ अदालतों या कानून की किताबों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह कक्षाओं में उन बालिकाओं के लिए है, जो मदद मांगने से झिझकती हैं। उन शिक्षकों के लिए है, जो संसाधनों की कमी के कारण मदद नहीं कर पाते। उन अभिभावकों व समाज के लिए है, जो अक्सर चुप्पी के असर को नहीं समझते। किसी भी बालिका को उसके शरीर के कारण दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए।
समाज की प्रगति इससे आंकी जानी चाहिए कि वह अपने सबसे कमजोर वर्गों की रक्षा कैसे करता है। जस्टिस जेबी पारदीवाला, आदेश में कहा आदेश के दायरे में सभी शहरी और ग्रामीण स्कूल आएंगे।
तीन महीने में कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं के लिए नीति लागू करने के निर्देश
मासिक धर्म से जुड़ी सुविधाओं की अनुपलब्धता न सिर्फ स्वास्थ्य, बल्कि बालिकाओं की गरिमा, शिक्षा और समानता के अधिकार का भी उल्लंघन है। स्वस्थ प्रजनन जीवन के अधिकार में यौन स्वास्थ्य से संबंधित शिक्षा और जानकारी पाने का अधिकार भी शामिल है।

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