• Latest
  • Trending
पीएम मोदी का ‘दिमागी नक्सल’ बयान: विपक्ष की प्रतिक्रिया और वैचारिक बहस

‘दिमागी नक्सल’ पर सियासत: विपक्ष की छटपटाहट या ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’

August 24, 2026
श्रीहरिकोटा से एनवीएस-03 लेकर उड़ान भरता जीएसएलवी-एफ18। एजेंसी जांच: तस्वीर पर एएनआई, पीटीआई या रॉयटर्स का नाम हो तो न लगाएं।

नाविक को मिला तीसरा नया उपग्रह

November 2, 2026
नार्को-सिंडिकेट पर महाप्रहार

नार्को-सिंडिकेट पर महाप्रहार

October 31, 2026
नशे पर सर्जिकल स्ट्राइक

नशे पर सर्जिकल स्ट्राइक

October 31, 2026
युवाओं के आइडिया और उत्पादों को पंख देने की तैयारी

युवाओं के आइडिया और उत्पादों को पंख देने की तैयारी

October 31, 2026
केविन पीटरसन ने बताया, कैसे बदल रहा है भारत

नया भारत, जिसे दुनिया देख रही है

October 31, 2026
यूपी सरकार 1,000 एकड़ में डेटा सेंटर और आईटी हब करेगी विकसित

यूपी सरकार 1,000 एकड़ में डेटा सेंटर और आईटी हब करेगी विकसित

October 31, 2026
यमुना को स्वच्छ बनाने के लिए दिल्ली के 70 घाटों पर उतरे हजारों लोग

यमुना को स्वच्छ बनाने के लिए दिल्ली के 70 घाटों पर उतरे हजारों लोग

October 31, 2026
फिर बदला भदोही का नाम

फिर बदला भदोही का नाम

October 31, 2026
'मोदी-आबे की दोस्ती पद से नहीं, विश्वास से बनी थी'

‘मोदी-आबे की दोस्ती पद से नहीं, विश्वास से बनी थी’

October 31, 2026
गुजरात लगातार पांचवीं बार स्टार्टअप के लिए सर्वश्रेष्ठ राज्य बना

गुजरात लगातार पांचवीं बार स्टार्टअप के लिए सर्वश्रेष्ठ राज्य बना

October 31, 2026
बेलापुर में भूमि के दाम आसमान पर

बेलापुर में भूमि के दाम आसमान पर

October 31, 2026
हवा सुधारने को बीएमसी का 'डीप क्लीन प्लान'

हवा सुधारने को बीएमसी का ‘डीप क्लीन प्लान’

October 31, 2026
Tuesday, November 3, 2026
Retail
संपर्क
डाउनलोड
  • देश
  • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय
    • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्री
  • चुनाव विशेष
  • स्टेट-नेशनल
  • महिला-खेल
  • डाउनलोड
  • अंग्रेजी
  • संपर्क
  • ई-पेपर
No Result
View All Result
Welcome To Blitz India Media
No Result
View All Result

‘दिमागी नक्सल’ पर सियासत: विपक्ष की छटपटाहट या ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’

बिना नाम लिए प्रधानमंत्री के वार से विपक्ष क्यों हुआ असहज ?

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 24, 2026
in राष्ट्रीय
0
पीएम मोदी का ‘दिमागी नक्सल’ बयान: विपक्ष की प्रतिक्रिया और वैचारिक बहस

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। 15 अगस्त 2026 को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले के प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा वैचारिक मुद्दा उठाया जिसने विपक्षी खेमे में भूचाल सा ला दिया।

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि देश ने हथियारबंद नक्सलवाद और माओवादी हिंसा को लगभग समाप्त कर दिया है लेकिन अब ‘दिमागी नक्सल’ (इंटेलेक्चुअल या वैचारिक नक्सल) देश में नई अराजकता और हिंसा के रास्ते तलाशने में जुटे हैं। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि ऐसे वैचारिक व दिमागी नक्सलियों की पहचान कर उन्हें समाज की मुख्यधारा और राष्ट्र निर्माण से अलग (आइसोलेट) किया जाना चाहिए।

YOU MAY ALSO LIKE

राफेल, सुखोई के साथ काशी में दिखा वायुसेना का दम

मन की बात मेरे लिए तीर्थ यात्रा से कम नहीं: पीएम मोदी

पीएम मोदी ने नहीं लिया किसी का नाम

इस पूरे भाषण में प्रधानमंत्री ने किसी भी राजनीतिक दल, नेता या व्यक्ति विशेष का नाम नहीं लिया था। इसके बावजूद, इस टिप्पणी के आते ही विपक्षी दलों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। कांग्रेस, वाम दलों और अन्य विपक्षी नेताओं ने न केवल इस बयान को अपने ऊपर ले लिया बल्कि सोशल मीडिया पर खुलकर ‘दिमागी नक्सली’ होने के तमगे भी बांटने शुरू कर दिए। सवाल यह उठता है कि जब प्रधानमंत्री ने किसी का नाम नहीं लिया था तो विपक्ष को इतनी ‘मिर्च’ क्यों लगी और वे इतनी जल्दी रक्षात्मक या आक्रामक मुद्रा में क्यों आ गए?

असहमति बनाम राष्ट्रविरोधी वैचारिकी

प्रधानमंत्री मोदी के बयान का मूल आशय लोकतांत्रिक असहमति या राजनीतिक आलोचना को दबाना नहीं था। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार की नीतियों की आलोचना करना और सवाल पूछना है जिसे हर स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान माना जाता है। सरकार और भाजपा का पक्ष स्पष्ट करते हुए केंद्रीय मंत्री रिजिजू ने बयान जारी कर साफ किया कि ‘दिमागी नक्सली’ वे राजनेता नहीं हैं जो संविधान में विश्वास रखते हैं, बल्कि वे हैं जो गुप्त रूप से या वैचारिक तौर पर माओवादी हिंसा का समर्थन करते हैं और राष्ट्रीय अखंडता को चुनौती देने वाले तत्वों को बौद्धिक खुराक देते हैं।

विपक्ष को करना होगा आत्ममंथन

जब प्रधानमंत्री ने बिना नाम लिए इस छिपी हुई वैचारिकी पर प्रहार किया तो यह प्रहार सीधे तौर पर उन तत्वों पर लगा जो विकास की मुख्यधारा में बाधा बनते रहे हैं। यदि कोई राजनीतिक दल या नेता खुद को असहज महसूस करता है या इस वक्तव्य को अपनी आलोचना मान बैठता है तो यह आत्ममंथन का विषय है कि क्या उनकी नीतियां या बयान वास्तव में देश विरोधी या अराजक तत्वों के साथ वैचारिक संरेखण (अलाइनमेंट) रखती हैं?

विपक्ष में ‘दिमागी नक्सली’ घोषित करने की होड़ सी लगी

लोक मनोविज्ञान में एक पुरानी कहावत है—’चोर की दाढ़ी में तिनका’। प्रधानमंत्री के भाषण के तुरंत बाद पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम और तृणमूल कांग्रेस तथा अन्य दलों के नेताओं ने जिस तरह से प्रतिक्रिया दी और खुद को ‘दिमागी नक्सली’ घोषित करने की होड़ सी लगा दी, वह अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता का यह कहना कि मुझे दिमागी नक्सली होने पर गर्व है, राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया।
विपक्ष की इस बौखलाहट के पीछे मुख्य कारण उनकी राजनीतिक हताशा है। दशकों तक देश के बड़े भूभाग पर खूनी संघर्ष को वैचारिक संरक्षण मिलता रहा है। जब मोदी सरकार ने बंदूकों के जोर पर चलने वाले नक्सलवाद को उनके गढ़ में जाकर परास्त किया, तो उनके वैचारिक मददगारों की जमीन खिसक गई। विपक्ष इस बात से डरा हुआ है कि यदि जनता ने ‘दिमागी नक्सलवाद’ के इस चेहरे को पहचान लिया, तो उनकी तथाकथित प्रगतिशील और उदारवादी राजनीति की आड़ में चलने वाला राष्ट्रविरोधी एजेंडा बेनकाब हो जाएगा।

‘शब्दावली’ बदलने की राजनीति और विक्टिम कार्ड

विपक्ष की यह पुरानी आदत रही है कि जब भी राष्ट्रीय सुरक्षा या वैचारिक शुद्धता का कोई सवाल उठता है, वे तुरंत ‘विक्टिम कार्ड’ (पीड़ित होने का नाटक) खेलने लगते हैं। पहले ‘अर्बन नक्सल’, फिर ‘आंदोलनजीवी’ और अब ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों पर विपक्ष ने यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की कि सरकार हर उस व्यक्ति को दबाना चाहती है जो सवाल पूछता है।

लेकिन यह तर्क अपने आप में कमजोर है। सवाल पूछना और भारतीय संविधान के दायरे में रहकर सरकार बदलना लोकतंत्र का अधिकार है लेकिन भारतीय संविधान को ही खारिज करने वालों, देश के टुकड़े करने का सपना देखने वालों और देश के विकास को विदेशी इशारों पर रोकने वालों की वकालत करना बौद्धिक बेईमानी है। विपक्ष इस वैचारिक अंतर को धुंधला करना चाहता है ताकि वे जनता की नजरों में वैध आलोचना और अवैध अराजकता को एक ही खांचे में रख सके।

यह साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘दिमागी नक्सली’ वाला बयान किसी राजनीतिक दल के खिलाफ व्यक्तिगत हमला नहीं था बल्कि यह एक सचेत राष्ट्र की ओर से वैचारिक प्रदूषण के खिलाफ चेतावनी थी। विपक्ष का इस पर बिलबिलाना और असहज होना इस बात का प्रमाण है कि कहीं न कहीं उनके अपने दामन पर उन ताकतों के साथ वैचारिक जुड़ाव के दाग हैं जो भारत की प्रगति को पचा नहीं पा रहे हैं। नाम न लिए जाने के बावजूद यदि जूता दूसरों के पैरों में फिट बैठ रहा है तो दर्द प्रधानमंत्री का नहीं, बल्कि उन लोगों का है जो खुद को उस श्रेणी में पाते हैं। जनता अब समझदार है और वह जानती है कि देशहित की बात करने वाले और देश तोड़ने के रास्ते तलाशने वाले ‘दिमागी नक्सलियों’ में असल फर्क क्या है।

ShareTweetSend

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

POPULAR NEWS

  • India shows way out to UN military observer group

    संरा के सैन्य पर्यवेक्षक समूह को भारत ने दिखाया बाहर का रास्ता

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • प्रोपर्टी पर जिसका 12 साल से कब्जा, वही होगा मालिक

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • 12 साल से है जमीन पर कब्जा तो वही होगा असली मालिक

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • गंगाजल खराब नहीं होता, लेकिन क्यों ?

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • पृथ्वी का आखिरी देश जहां सूरज केवल 40 मिनट के लिए ही डूबता है

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
Welcome To Blitz India Media

© 2023 Blitz India Media -BlitzIndia Building A New Nation

Navigate Site

  • About
  • Our Team
  • Contact

Follow Us

No Result
View All Result
  • देश
  • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय
    • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्री
  • चुनाव विशेष
  • स्टेट-नेशनल
  • महिला-खेल
  • डाउनलोड
  • अंग्रेजी
  • संपर्क
  • ई-पेपर

© 2023 Blitz India Media -BlitzIndia Building A New Nation