ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। 15 अगस्त 2026 को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले के प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा वैचारिक मुद्दा उठाया जिसने विपक्षी खेमे में भूचाल सा ला दिया।
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि देश ने हथियारबंद नक्सलवाद और माओवादी हिंसा को लगभग समाप्त कर दिया है लेकिन अब ‘दिमागी नक्सल’ (इंटेलेक्चुअल या वैचारिक नक्सल) देश में नई अराजकता और हिंसा के रास्ते तलाशने में जुटे हैं। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि ऐसे वैचारिक व दिमागी नक्सलियों की पहचान कर उन्हें समाज की मुख्यधारा और राष्ट्र निर्माण से अलग (आइसोलेट) किया जाना चाहिए।
पीएम मोदी ने नहीं लिया किसी का नाम
इस पूरे भाषण में प्रधानमंत्री ने किसी भी राजनीतिक दल, नेता या व्यक्ति विशेष का नाम नहीं लिया था। इसके बावजूद, इस टिप्पणी के आते ही विपक्षी दलों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। कांग्रेस, वाम दलों और अन्य विपक्षी नेताओं ने न केवल इस बयान को अपने ऊपर ले लिया बल्कि सोशल मीडिया पर खुलकर ‘दिमागी नक्सली’ होने के तमगे भी बांटने शुरू कर दिए। सवाल यह उठता है कि जब प्रधानमंत्री ने किसी का नाम नहीं लिया था तो विपक्ष को इतनी ‘मिर्च’ क्यों लगी और वे इतनी जल्दी रक्षात्मक या आक्रामक मुद्रा में क्यों आ गए?
असहमति बनाम राष्ट्रविरोधी वैचारिकी
प्रधानमंत्री मोदी के बयान का मूल आशय लोकतांत्रिक असहमति या राजनीतिक आलोचना को दबाना नहीं था। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार की नीतियों की आलोचना करना और सवाल पूछना है जिसे हर स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान माना जाता है। सरकार और भाजपा का पक्ष स्पष्ट करते हुए केंद्रीय मंत्री रिजिजू ने बयान जारी कर साफ किया कि ‘दिमागी नक्सली’ वे राजनेता नहीं हैं जो संविधान में विश्वास रखते हैं, बल्कि वे हैं जो गुप्त रूप से या वैचारिक तौर पर माओवादी हिंसा का समर्थन करते हैं और राष्ट्रीय अखंडता को चुनौती देने वाले तत्वों को बौद्धिक खुराक देते हैं।
विपक्ष को करना होगा आत्ममंथन
जब प्रधानमंत्री ने बिना नाम लिए इस छिपी हुई वैचारिकी पर प्रहार किया तो यह प्रहार सीधे तौर पर उन तत्वों पर लगा जो विकास की मुख्यधारा में बाधा बनते रहे हैं। यदि कोई राजनीतिक दल या नेता खुद को असहज महसूस करता है या इस वक्तव्य को अपनी आलोचना मान बैठता है तो यह आत्ममंथन का विषय है कि क्या उनकी नीतियां या बयान वास्तव में देश विरोधी या अराजक तत्वों के साथ वैचारिक संरेखण (अलाइनमेंट) रखती हैं?
विपक्ष में ‘दिमागी नक्सली’ घोषित करने की होड़ सी लगी
लोक मनोविज्ञान में एक पुरानी कहावत है—’चोर की दाढ़ी में तिनका’। प्रधानमंत्री के भाषण के तुरंत बाद पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम और तृणमूल कांग्रेस तथा अन्य दलों के नेताओं ने जिस तरह से प्रतिक्रिया दी और खुद को ‘दिमागी नक्सली’ घोषित करने की होड़ सी लगा दी, वह अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता का यह कहना कि मुझे दिमागी नक्सली होने पर गर्व है, राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया।
विपक्ष की इस बौखलाहट के पीछे मुख्य कारण उनकी राजनीतिक हताशा है। दशकों तक देश के बड़े भूभाग पर खूनी संघर्ष को वैचारिक संरक्षण मिलता रहा है। जब मोदी सरकार ने बंदूकों के जोर पर चलने वाले नक्सलवाद को उनके गढ़ में जाकर परास्त किया, तो उनके वैचारिक मददगारों की जमीन खिसक गई। विपक्ष इस बात से डरा हुआ है कि यदि जनता ने ‘दिमागी नक्सलवाद’ के इस चेहरे को पहचान लिया, तो उनकी तथाकथित प्रगतिशील और उदारवादी राजनीति की आड़ में चलने वाला राष्ट्रविरोधी एजेंडा बेनकाब हो जाएगा।
‘शब्दावली’ बदलने की राजनीति और विक्टिम कार्ड
विपक्ष की यह पुरानी आदत रही है कि जब भी राष्ट्रीय सुरक्षा या वैचारिक शुद्धता का कोई सवाल उठता है, वे तुरंत ‘विक्टिम कार्ड’ (पीड़ित होने का नाटक) खेलने लगते हैं। पहले ‘अर्बन नक्सल’, फिर ‘आंदोलनजीवी’ और अब ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों पर विपक्ष ने यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की कि सरकार हर उस व्यक्ति को दबाना चाहती है जो सवाल पूछता है।
लेकिन यह तर्क अपने आप में कमजोर है। सवाल पूछना और भारतीय संविधान के दायरे में रहकर सरकार बदलना लोकतंत्र का अधिकार है लेकिन भारतीय संविधान को ही खारिज करने वालों, देश के टुकड़े करने का सपना देखने वालों और देश के विकास को विदेशी इशारों पर रोकने वालों की वकालत करना बौद्धिक बेईमानी है। विपक्ष इस वैचारिक अंतर को धुंधला करना चाहता है ताकि वे जनता की नजरों में वैध आलोचना और अवैध अराजकता को एक ही खांचे में रख सके।
यह साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘दिमागी नक्सली’ वाला बयान किसी राजनीतिक दल के खिलाफ व्यक्तिगत हमला नहीं था बल्कि यह एक सचेत राष्ट्र की ओर से वैचारिक प्रदूषण के खिलाफ चेतावनी थी। विपक्ष का इस पर बिलबिलाना और असहज होना इस बात का प्रमाण है कि कहीं न कहीं उनके अपने दामन पर उन ताकतों के साथ वैचारिक जुड़ाव के दाग हैं जो भारत की प्रगति को पचा नहीं पा रहे हैं। नाम न लिए जाने के बावजूद यदि जूता दूसरों के पैरों में फिट बैठ रहा है तो दर्द प्रधानमंत्री का नहीं, बल्कि उन लोगों का है जो खुद को उस श्रेणी में पाते हैं। जनता अब समझदार है और वह जानती है कि देशहित की बात करने वाले और देश तोड़ने के रास्ते तलाशने वाले ‘दिमागी नक्सलियों’ में असल फर्क क्या है।














