ब्लिट्ज ब्यूरो
मुंबई। टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल (टीएमएच) के गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के शोधकर्ताओं के एक नए रिसर्च आर्टिकल पर गंभीर चर्चा का दौर शुरू हो गया है। इस पर दुनिया भर में सवाल भी उठ रहे हैं। इस आर्टिकल में दावा किया गया है कि पपीते के पत्तों के अर्क (बीपीएलई) वाली गोलियां कीमोथेरेपी करा रहे कैंसर मरीजों में प्लेटलेट काउंट बढ़ाने में मदद करती हैं।
‘जर्नल ऑफ ग्लोबल ऑन्कोलॉजी’- अपीयर-रिव्यूड मेडिकल जर्नल ने कुछ दिन पहले टीएमएच का पेपर पब्लिश किया था। अब इस स्टडी की जांच कर रहा है। कोच्चि के हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. सिरियाक एबी फिलिप्स सोशल मीडिया पर ‘द लिवर डॉक’ के नाम से मशहूर हैं। वह छद्म विज्ञान की पोल खोलने के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने जर्नल से इसकी इंटरनल समीक्षा करने का अनुरोध किया था।
रिसर्च पेपर के ऑनलाइन वर्शन में अब एक डिस्क्लेमर (चेतावनी) जोड़ा गया है। इसमें लिखा है कि जर्नल को इस आर्टिकल में बताई गई बातों के दोबारा नतीजों और क्लिनिकल व्याख्या को लेकर कुछ चिंताओं के बारे में बताया गया है और अभी इसकी जांच चल रही है। पाठकों को इसे सावधानी से समझना चाहिए।

219 मरीजों से शुरू हुआ अध्ययन
स्टडी 219 मरीजों के साथ शुरू हुई थी, लेकिन कुछ लोगों को हटाने के बाद रिसर्चर्स ने अंतिम संख्या 198 कर दी, जिसमें 69 लोग प्लेसबो ग्रुप में थे। आखिर में उन्होंने यह नतीजा निकाला कि हालांकि लंबे समय तक फॉलो-अप की जरूरत है, लेकिन उनके नतीजों से पता चलता है कि ये गोलियां कीमोथेरेपी की वजह से होने वाली थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (प्लेटलेट काउंट कम होना) के लिए एक सस्ता इलाज हो सकती हैं और कीमोथेरेपी की तीव्रता को बनाए रखने में मदद कर सकती हैं।
ट्रायल से बहुत सारा डेटा मिलता है। अगर रिसर्च करने वाले नतीजे देखने के बाद तय करते हैं कि ‘मुख्य’ लक्ष्य क्या है, तो वे लगभग हमेशा संयोग से कोई सकारात्मक नतीजा निकाल सकते हैं। पहले से तय करना ही असली साइंस को किस्मत से सही अंदाजा लगाने से अलग करता है। यही वजह है कि जब नतीजे सकारात्मक होते हैं तो हम स्टडी के नतीजों पर भरोसा करते हैं।
रिसर्च के बीच मरीजों की संख्या घटाने पर आपत्ति
डॉ. फिलिप्स ने इस बात पर आपत्ति जताई है। उन्होंने बताया कि पपीते की गोलियां लेने वाले ग्रुप में, अंतिम नतीजे निकालने से पहले रिसर्चर्स ने उन मरीजों को हटा दिया जो ठीक नहीं हुए थे। उन्होंने समझाया कि आप देख सकते हैं कि ठीक होने वाले मरीजों की संख्या 83 पर ही रुकी हुई है, जबकि कुल संख्या (स्टडी में शामिल लोगों की कुल संख्या) 146 से घटकर 129 हो गई है।
डॉ. फिलिप्स ने आगे कहा कि सिर्फ असफल मामलों को हटाकर और सफल मामलों को वैसे ही रखकर, रिसर्चर्स ने असल में एक भी अतिरिक्त मरीज के ठीक हुए बिना पपीते के अर्क का रिकवरी रेट लगभग 57% से बढ़ाकर लगभग 64% कर दिया। इसके अलावा, उन्होंने बताया कि प्लेसबो ग्रुप में भी, कुछ मरीज़ जो ठीक हो गए थे, उन्हें अंतिम एनालिसिस से बाहर कर दिया गया था।
स्टडी करने वाले विशेषज्ञों का दावा
स्टडी के मुख्य लेखक डॉ. विकास ओस्तवाल ने कहा कि जर्नल ने हमसे कुछ सवाल पूछे हैं, जिनका जवाब हम अभी स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल के तहत दे रहे हैं। हमें अपनी रिसर्च पर भरोसा है। हमारे मरीजों को पपीते के अर्क वाली गोलियां दी जा रही हैं, और चौथे दिन तक (एक-आध दिन आगे-पीछे हो सकता है) उनके प्लेटलेट काउंट में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है। ट्रायल के लिए दवाएं ‘माइक्रो लैब्स प्राइवेट लिमिटेड’ ने दी थीं और स्टडी को ‘ज़ाइडस फार्मा प्राइवेट लिमिटेड’ और ‘ल्यूपिन फार्मा प्राइवेट लिमिटेड’ से बाहरी ग्रांट मिली थी। ल्यूपिन फार्मा ही ‘कैरीपापा’ ब्रांड नाम से ये एक्सट्रैक्ट वाली गोलियां बेचती है। डॉ. ओस्तवाल ने कहा कि हालांकि रिसर्च करने वालों को फंडिंग के स्रोतों के बारे में पता था, लेकिन उनमें से किसी को भी – खुद उन्हें भी नहीं- यह नहीं पता था कि फंड देने वालों में से एक कंपनी ये गोलियां बेचती है।

डॉ. फिलिप्स ने जताई चिंता
डॉ. फिलिप्स ने यह चिंता भी जताई कि स्टडी का मुख्य लक्ष्य (प्राइमरी एंडपॉइंट) 7वें दिन से बदलकर चौथे दिन कर दिया गया था। नतीजों का विश्लेषण करने से पहले ही ट्रायल का मुख्य लक्ष्य तय हो जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि ओरिजिनल रजिस्ट्रेशन और प्रोटोकॉल में मुख्य लक्ष्य ‘7वें दिन तक प्लेटलेट रिकवरी’ तय किया गया था, लेकिन इसके बजाय चौथे दिन के डेटा का इस्तेमाल किया गया जबकि चौथे दिन का डेटा सिर्फ बीच में जांच के लिए था।
ट्रायल से बहुत सारा डेटा मिलता है। अगर रिसर्च करने वाले नतीजे देखने के बाद तय करते हैं कि ‘मुख्य’ लक्ष्य क्या है, तो वे लगभग हमेशा संयोग से कोई सकारात्मक नतीजा निकाल सकते हैं। पहले से तय करना ही असली साइंस को किस्मत से सही अंदाजा लगाने से अलग करता है। यही वजह है कि जब नतीजे सकारात्मक होते हैं तो हम स्टडी के नतीजों पर भरोसा करते हैं।

स्टडी की विश्वसनीयता पर सवाल
पब्लिक हेल्थ संस्थान से रिटायर हुए एक बायोस्टैटिस्टिशियन ने भी सहमति जताते हुए कहा कि विश्लेषण के बाद मुख्य लक्ष्य बदलना और दोनों ग्रुप में कुछ लोगों को बाहर करना एक खतरे का संकेत है, जो स्टडी की विश्वसनीयता को कम करता है। हो सकता है कि डॉक्टरों ने कोई क्लिनिकल फायदा देखा हो और उसे डेटा में फिट करने की कोशिश की हो, लेकिन कागज पर तो निश्चित रूप से एक समस्या है।
‘इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल एथिक्स’ के संस्थापकों में से एक और टाटा हॉस्पिटल की एथिक्स कमिटी के पूर्व सदस्य डॉ. अमर जेसानी ने कहा कि राय में हमेशा अंतर हो सकता है। जो बात स्वीकार्य नहीं है, वह है बिना वैज्ञानिक तरीके से किया गया काम। इस मामले में यही साबित करना होगा। आगे बढ़ने का एक तरीका यह है कि टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल रॉ (कच्चा) और बिना पहचान वाला डेटा पब्लिक डोमेन में जारी करे। जानकारों का कहना है कि हालांकि जर्नल की जांच महत्वपूर्ण होगी, लेकिन एक नया क्लिनिकल ट्रायल नतीजों को साबित या गलत साबित करने में मदद करेगा।
आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है?
इस पूरे विवाद का मतलब यह नहीं है कि पपीते के पत्तों का अर्क पूरी तरह प्रभावी है या पूरी तरह बेकार है। इसका मतलब केवल इतना है कि इस खास रिसर्च के नतीजों की दोबारा जांच की जा रही है। जब तक वैज्ञानिक समीक्षा पूरी नहीं हो जाती और अन्य स्वतंत्र अध्ययन भी ऐसे ही नतीजे नहीं दिखाते, तब तक किसी भी दावे को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। इसलिए कैंसर या प्लेटलेट्स से जुड़ी किसी भी समस्या में केवल डॉक्टर की सलाह पर ही इलाज करना सबसे सुरक्षित तरीका है।











