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जकार्ता से मेलबर्न तक: भारत ने बुनी व्यापक इंडो-प्रशांत साझेदारी

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 8, 2026
in the blitz, देश
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प्रधानमंत्री मोदी

ब्लिट्ज ब्यूरो

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज मेलबर्न पहुँच रहे हैं — यह उनके तीन-देशीय दौरे का दूसरा चरण है, जो भारत को इंडो-प्रशांत क्षेत्र से और गहराई से जोड़ रहा है। इंडोनेशिया से ऑस्ट्रेलिया और फिर न्यूज़ीलैंड तक चलने वाली इस यात्रा में हर राजधानी में एजेंडा एक ही व्यावहारिक ढाँचे पर टिका है — रक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, स्वच्छ ऊर्जा और आपूर्ति-शृंखलाएँ।

जकार्ता चरण ने माहौल तय कर दिया। तीन दिनों में भारत और इंडोनेशिया ने समुद्री सुरक्षा, रक्षा, अंतरिक्ष, इस्पात आपूर्ति-शृंखला, दुर्लभ खनिज, स्वास्थ्य, कृषि और विज्ञान से जुड़े एक दर्जन से अधिक समझौतों का आदान-प्रदान किया। इनमें सबसे बड़ा — इंडोनेशिया द्वारा भारत की ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल ख़रीदने का सौदा, जिससे फ़िलीपींस और वियतनाम के बाद इंडोनेशिया इस प्रणाली का तीसरा निर्यात-ग्राहक बन गया। राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने प्रधानमंत्री को इंडोनेशिया का सर्वोच्च सम्मान ‘बिंतांग अदिपूर्ण’ प्रदान किया।

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एक ही दौरा जो रक्षा, महत्वपूर्ण खनिज और स्वच्छ ऊर्जा को जोड़ता है — यह दर्शाता है कि भारत उन साझेदारियों को बुन रहा है जिन पर उसकी वृद्धि टिकेगी।

एक नज़र में
  • दौरा: इंडोनेशिया (6–8 जुलाई) → ऑस्ट्रेलिया (8–10 जुलाई) → न्यूज़ीलैंड
  • इंडोनेशिया: 12+ समझौते; ब्रह्मोस सौदा (तीसरा निर्यात-ग्राहक)
  • ऑस्ट्रेलिया: यूरेनियम आपूर्ति व महत्वपूर्ण खनिज केंद्र में
  • न्यूज़ीलैंड: लगभग चार दशकों में किसी भारतीय पीएम की पहली यात्रा

मेलबर्न में ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज़ की मेज़बानी में होने वाले ऑस्ट्रेलिया–भारत वार्षिक शिखर सम्मेलन में एक वाणिज्यिक यूरेनियम आपूर्ति समझौते के आगे बढ़ने की उम्मीद है — जो 2014 में बने ढाँचे को अमल में लाएगा — साथ ही महत्वपूर्ण खनिज, स्वच्छ ऊर्जा, साइबर सुरक्षा और सुदृढ़ आपूर्ति-शृंखलाओं पर सहयोग। अंतिम चरण में प्रधानमंत्री न्यूज़ीलैंड जाएँगे, जो लगभग चालीस वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा होगी।

इस दौरे की रचनात्मक कसौटी क्रियान्वयन होगी: हस्ताक्षरित ढाँचों को वास्तविक आपूर्ति, संयुक्त उद्यमों और रोज़गार में बदलना। सरकार की ऐक्ट ईस्ट नीति और पड़ोसी समुद्री क्षेत्र के लिए ‘महासागर’ दृष्टिकोण पर आधारित यह यात्रा भारत को पूरे क्षेत्र में एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में स्थापित करती है — अब काम इन समझौतों को टिकाऊ, कार्यशील व्यवस्थाओं में बदलने का है।

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