ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।दो केंद्र शासित प्रदेशों में राशन की सब्सिडी अब बैंक खाते में नहीं, डिजिटल रुपये के टोकन के रूप में आ रही है। इसमें एक शब्द सब कुछ तय करता है — ‘प्रोग्रामेबल’। यह आपके ज़िले तक पहुँचे, उससे पहले जान लीजिए कि इसका मतलब क्या है और क्या नहीं।
प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना में अब तक सब्सिडी दो तरह से पहुँचती रही है — या तो राशन दुकान पर सस्ता अनाज, या नक़द हस्तांतरण के प्रयोगों में सीधे बैंक खाते में पैसा। सीबीडीसी यानी डिजिटल रुपये का रास्ता इससे अलग है। सब्सिडी लाभार्थी के डिजिटल वॉलेट में टोकन के रूप में आती है, और वे टोकन सिर्फ़ तय अनाज ख़रीदने में, सिर्फ़ राशन दुकान या सूचीबद्ध दुकानदार के यहाँ चलते हैं। पहला प्रयोग पुडुचेरी में 26 फ़रवरी 2026 को शुरू हुआ था। इस महीने चंडीगढ़ और दादरा-नगर हवेली इसमें जुड़े हैं।
वही रुपया, एक शर्त के साथ: डिजिटल रुपये का टोकन नोट की तरह ही रिज़र्व बैंक का जारी किया हुआ पैसा है। फ़र्क़ बस इतना है कि जारी करते समय उस पर शर्त लगाई जा सकती है कि वह कहाँ ख़र्च होगा।
बैंक खाते में आया पैसा उसी क्षण किसी का भी हो जाता है। टोकन तब तक सरकार की मंशा बना रहता है, जब तक वह उसी काम में ख़र्च न हो जाए जिसके लिए भेजा गया था।
एक नज़र में
• योजना: प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना
• पहला प्रयोग: पुडुचेरी, 26 फ़रवरी 2026
• अब जुड़े: चंडीगढ़ और दादरा-नगर हवेली
• रूप: डिजिटल वॉलेट में प्रोग्रामेबल सीबीडीसी टोकन
• कहाँ चलेगा: राशन दुकान या सूचीबद्ध दुकानदार, सिर्फ़ तय अनाज के लिए
• क्या नहीं बदला: राशन कार्ड, पात्रता, अनाज की मात्रा
• क्या जुड़ा: तुरंत, ट्रैक होने वाला और उद्देश्य-बद्ध भुगतान
तीन बातें साफ़ कर लेना ज़रूरी है, क्योंकि ऐसे बदलावों पर अफ़वाह जानकारी से तेज़ चलती है। पहली — आपके हक़ में कुछ नहीं बदला। न अनाज की मात्रा, न पात्रता, न राशन कार्ड। सिर्फ़ पैसा आने का रास्ता बदला है। दूसरी — सीबीडीसी टोकन कोई कूपन या वाउचर नहीं है, यह रिज़र्व बैंक का जारी किया हुआ क़ानूनी पैसा है; शर्त जारी करते समय जुड़ती है, पैसे की क़ीमत घटती नहीं। तीसरी — निगरानी सब्सिडी पर है, आपके बाक़ी ख़र्च पर नहीं। सिस्टम बस इतना देखता है कि अनाज के लिए जारी टोकन अनाज में ही ख़र्च हुआ। जिस देश ने बीस साल यह पता लगाने में लगाए हों कि सब्सिडी का रुपया आख़िर गया कहाँ, उसके लिए यही पूरी बात है।
चुनौतियाँ भी बिल्कुल आम हैं और हल हो सकने लायक़ हैं। वॉलेट के लिए चलता हुआ फ़ोन और नेटवर्क चाहिए, और ये दोनों ठीक उन्हीं ज़िलों में सबसे कमज़ोर हैं जहाँ राशन सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। राशन दुकानदार को समय पर पैसा मिलना चाहिए, वरना अनाज उसके हाथ से निकल जाएगा और भुगतान अटका रहेगा। और बुज़ुर्ग लाभार्थी के लिए ऐप नहीं, किसी की मदद से चलने वाला तरीक़ा चाहिए। यही वजह है कि यह प्रयोग तीन छोटे केंद्र शासित प्रदेशों में हो रहा है — पुडुचेरी में कोई दिक़्क़त आए तो संभल जाती है, किसी बड़े राज्य में नहीं संभलती। अच्छा क़दम यह होगा कि पुडुचेरी के छह महीने के दो आँकड़े सार्वजनिक कर दिए जाएँ: कितने फ़ीसदी टोकन उसी महीने में भुनाए गए, और दुकानदार को पैसा मिलने में औसतन कितने दिन लगे। ये दो आँकड़े ठीक हुए, तो डिजिटल रुपये का यह सबसे उपयोगी काम साबित होगा।













