ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।जून के आख़िर में बुवाई क़रीब 23 फ़ीसदी पीछे थी, अब सिर्फ़ पौने पाँच फ़ीसदी। यह अच्छी ख़बर है। साथ में एक बात और है — इस साल फ़सल का बड़ा हिस्सा देर से बोया गया, और देर से बोई फ़सल का भाग्य अब की बारिश तय करती है।
24 जुलाई 2026 तक खरीफ की बुवाई 78.74 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि पिछले साल इसी समय तक 82.62 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी — यानी 3.88 लाख हेक्टेयर या 4.7 फ़ीसदी कम। सुधार साफ़ दिख रहा है, क्योंकि 25 जून तक यह अंतर लगभग 23 फ़ीसदी था। फ़सलवार देखें तो धान 2.2 फ़ीसदी और कपास 2.4 फ़ीसदी पीछे है, जबकि दलहन और मोटे अनाज 6 से 8 फ़ीसदी पीछे हैं। 1 अगस्त तक मानसून की कुल बारिश सामान्य से 11.5 फ़ीसदी कम रही है।
देर से बोई गई, इसलिए ज़्यादा नज़र में: धान का रक़बा 2.2 फ़ीसदी ही पीछे है, बड़ी फ़सलों में सबसे कम — लेकिन इस साल का बड़ा हिस्सा जून की जगह जुलाई में बोया गया।
भारत में मानसून की क़रीब 29 फ़ीसदी बारिश अगस्त में होती है और खरीफ की क़रीब 20 फ़ीसदी बुवाई भी इसी महीने। देर वाले साल में यही महीना दोहरा काम करता है।
एक नज़र में
• बुवाई: 24 जुलाई तक 78.74 लाख हेक्टेयर · पिछले साल 82.62 लाख
• अंतर: 3.88 लाख हेक्टेयर, यानी 4.7 फ़ीसदी
• सुधार: 25 जून को अंतर क़रीब 23 फ़ीसदी था
• फ़सलवार: धान −2.2% · कपास −2.4% · दलहन-मोटे अनाज −6 से −8%
• बारिश: 1 अगस्त तक सामान्य से 11.5 फ़ीसदी कम
• मौसम विभाग: अगस्त और सीज़न के दूसरे हिस्से में सामान्य से कम बारिश का अनुमान
देर से बोई फ़सल पर अलग तरह से ध्यान देने की वजह खेती की है, आँकड़ों की नहीं। जुलाई के तीसरे हफ़्ते में बोई गई फ़सल में बाली और दाना भरने का समय तीन-चार हफ़्ते आगे खिसक जाता है, यानी पानी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत अगस्त के आख़िर और सितंबर में पड़ती है — मानसून के बीच में नहीं, उसकी पूँछ में। इसलिए कुल कितना पानी बरसा, यह उतना मायने नहीं रखता जितना यह कि कब और कितने अंतराल से बरसा। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक और पूर्वी मैदानों में अगस्त की बारिश अगर बराबर बँटकर आए तो देर वाली फ़सल आराम से निकल जाएगी; वही पानी अगर तीन तेज़ झड़ियों में गिरे तो नहीं, क्योंकि छोटा पौधा बहते पानी का इस्तेमाल नहीं कर पाता। दलहन और मोटे अनाज पर नज़र रखनी चाहिए — ये ज़्यादातर बारिश के भरोसे हैं और साल की दूसरी छमाही में दाल का भाव यही तय करते हैं।
घबराने की बात कोई नहीं है, और यह भी साफ़ कह देना चाहिए। जलाशयों का भंडार, इसके बाद आने वाली रबी की फ़सल और सरकारी बफ़र स्टॉक — ये तीनों कमज़ोर खरीफ और आपकी थाली के बीच खड़े हैं, और पिछले एक दशक में तीनों मज़बूत हुए हैं। अब ज़ोर ज़िला-स्तर पर होना चाहिए: जहाँ अब भी रक़बा ख़ाली है वहाँ ब्लॉक स्तर पर कम अवधि वाली दलहन और मोटे अनाज का बीज उपलब्ध हो; फ़सल बीमा की नामांकन खिड़की बंद होने से पहले किसान जुड़ जाएँ; और स्थानीय भाषा में साफ़ सलाह मिले कि सिंचाई कब रोकनी है और कब देनी है। भारत के पास ज़िलेवार आँकड़े मौजूद हैं। देर वाले खरीफ को सामान्य साल बनाने का तरीक़ा यही है — मदद अक्टूबर में नहीं, अगस्त में पहुँचे।













