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‘लिपस्टिक फ्री कैंपस’ अभियान शुरू हुआ केरलम में

पहला कॉस्मेटिक मुक्त कैंपस जिला बना कोल्लम

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 13, 2026
in साउथ
0
'लिपस्टिक फ्री कैंपस' अभियान शुरू हुआ केरलम में

ब्लिट्ज ब्यूरो

तिरुवनंतपुरम। दक्षिण भारतीय राज्य केरलम के कोल्लम जिले में स्कूल कैंपस को सौंदर्य प्रसाधन मुक्त रखने का अभियान छेड़ा गया है। इस कैंपेन की शुरुआत जिला स्तर पर मय्यानाड हायर सेकेंडरी स्कूल से हुई, जिसे साथ ही जिले का पहला ‘लिपस्टिक-फ्री कैंपस’ भी घोषित किया गया है। केरलम की बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) की ओर से शुरू किए गए इस अभियान का उद्देश्य छात्राओं को सौंदर्य प्रसाधनों को तैयार करने में उपयोग होने वाले केमिकल्स के जोखिम से बचाना है और बच्चों के इसके नुकसान के प्रति जागरूक करना है।

कोल्लम जिले के स्कूलों में जून महीने से शुरू किया गया ‘लिपस्टिक-मुक्त परिसर’अभियान मुख्य रूप से स्कूली बच्चों में सौंदर्य प्रसाधनों के बढ़ते उपयोग को रोकने और सस्ते मेकअप उत्पादों से होने वाले गंभीर नुकसान के प्रति जागरूक करने के लिए चलाया जा रहा है। स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को लेकर केरलम की बाल कल्याण समिति द्वारा शुरू किए अभियान का उद्देश्य त्वचा रोग से होने वाले जोखिमों से बचाना है।

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पर्यावरण के लिए सबसे नुकसानदेह चीज
लिपस्टिक-फ़्री कैंपस कैंपेन का उद्घाटन करते हुए कवि कुरिपुझा श्रीकुमार ने कहा कि हर इंसान जन्म से ही सुंदर होता है, तो हमें कॉस्मेटिक्स की जरूरत ही क्यों है? उन्होंने तर्क दिया कि बाहरी दिखावे के बजाय अंदरूनी सुंदरता ज्यादा मायने रखती है। उन्होंने आगे कहा कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली चीजों में परफ्यूम समेत कॉस्मेटिक्स सबसे अधिक नुकसानदेह हैं।

केमिकल युक्त कॉस्मेटिक उत्पादों से है कैंसर का खतरा
दरअसल, राज्य के स्वास्थ्य विभाग की चेतावनी के मुताबिक बाजार में मिलने वाले सस्ते कॉस्मेटिक उत्पादों में जहरीली भारी धातुएं होती हैं, जो बच्चों में आंत के कैंसर का कारण बन सकती हैं। ये जहरीले रसायन छात्राओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाली आम लिपस्टिक में पाए जाते हैं, जबकि मेकअप किट में मरकरी (पारा) और कैडमियम जैसे खतरनाक तत्व पाए गए हैं। कोल्लम जिले के मय्यानाड हायर सेकेंडरी स्कूल टीचर्स ने बताया कि बच्चे स्कूल में लिपस्टिक और दूसरे कॉस्मेटिक्स लेकर आ रहे हैं और क्लास के बीच के समय में उन्हें दोबारा लगा रहे हैं। समिति के सेक्रेटरी एडवोकेट शाइन देव ने कहा कि, इसी वजह से हमने यह कैंपेन शुरू करने का फ़ैसला किया।

स्वाभाविक बनावट को लेकर पैदा हो रही हीनभावना
गौरतलब है वयस्कों की तुलना में बच्चों की त्वचा पतली और अधिक संवेदनशील होती है, जिससे ये हानिकारक रसायन उनके शरीर में तेजी से अवशोषित होकर आंतरिक अंगों को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे बच्चों के मानसिक और व्यवहार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

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