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जेपीएससी रद्द, अब सवाल कैलेंडर का

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 17, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।परीक्षा रद्द होना अभ्यर्थी की जीत है। पर उसकी असली मांग रद्द करना नहीं थी — अगली तारीख़ थी।

झारखंड सरकार 14वीं जेपीएससी परीक्षा के साथ-साथ 2023 और 2025 की बैकलॉग परीक्षाओं को रद्द करने पर सहमत हो गई है, और भर्ती प्रक्रिया में सुधार के क़दमों का ऐलान किया है। राँची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में अभ्यर्थी 29 जुलाई से धरने पर बैठे हैं। सरकार के फ़ैसले के बाद भी उन्होंने धरना जारी रखा है, और सीबीआई जाँच की मांग पर क़ायम हैं।

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अब वह बात, जो इस ख़बर में सबसे कम लिखी जाती है। परीक्षा रद्द होना अपने आप में राहत नहीं है। एक अभ्यर्थी जिसकी उमर 30 के आसपास है, जो दो-तीन साल राँची या पटना के कमरे में किराया देकर तैयारी कर रहा है, उसके लिए हर रद्द परीक्षा का मतलब है कि उसकी उमर की सीमा उतनी और पास आ गई। रद्द करने का फ़ैसला पुरानी ग़लती सुधारता है; वह नई तारीख़ नहीं देता। इसीलिए धरना ख़त्म नहीं हुआ — क्योंकि जो माँगा गया था वह भरोसा था, और भरोसा तारीख़ से बनता है।

तारीख़ ही भरोसा है: रद्द होने का फ़ैसला पुरानी ग़लती सुधारता है, लेकिन अभ्यर्थी की उमर की सीमा वापस नहीं लाता। इसीलिए भर्ती कैलेंडर सबसे बड़ी माँग है।

रद्द होना पुरानी ग़लती सुधारता है। नई तारीख़ नहीं देता। अभ्यर्थी तारीख़ माँग रहा है।

एक नज़र में

• रद्द: 14वीं जेपीएससी परीक्षा
• साथ में: 2023 और 2025 की बैकलॉग परीक्षाएँ
• सरकार का ऐलान: भर्ती प्रक्रिया में सुधार के क़दम
• धरना: राँची, जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम
• कब से: 29 जुलाई 2026
• अभ्यर्थियों की माँग: सीबीआई जाँच
• जो नहीं आया: अगली परीक्षा की तारीख़
• असली लागत: उमर की सीमा, किराया, कोचिंग का ख़र्च
• सुधार का पैमाना: अधिसूचना से नियुक्ति तक कितने महीने
• देखने वाली बात: अगले तीन साल का भर्ती कैलेंडर

राज्य लोक सेवा आयोगों की यह दिक़्क़त झारखंड तक सीमित नहीं है, और यही इसे सुधारने लायक़ बनाता है। देश के कई राज्यों में एक भर्ती चक्र — अधिसूचना से नियुक्ति पत्र तक — तीन से पाँच साल ले लेता है, और इस दौरान कोई एक चरण अदालत में या जाँच में फँस जाए तो चक्र और लंबा हो जाता है। जो अभ्यर्थी इस चक्र में फँसता है वह इन बरसों में और कहीं नौकरी भी नहीं ढूँढ़ता, क्योंकि तैयारी पूरे समय की माँग करती है। यानी देरी की लागत सिर्फ़ ख़ाली पद नहीं, वे बरस भी हैं जो कमाई के बिना निकल गए।

आगे का रास्ता वही है जो कुछ राज्यों में पहले ही आज़माया जा चुका है, और वह मुश्किल नहीं है। पहला — तीन साल का भर्ती कैलेंडर पहले से प्रकाशित हो, जिसमें हर परीक्षा की अधिसूचना, प्रारंभिक, मुख्य और साक्षात्कार की महीनेवार तारीख़ें तय हों। जहाँ ऐसा कैलेंडर छपता है वहाँ अभ्यर्थी अपनी पढ़ाई और अपनी उमर, दोनों की योजना बना पाता है। दूसरा — प्रश्नपत्र बनाने और छापने की प्रक्रिया का तीसरे पक्ष से ऑडिट, हर परीक्षा के बाद, और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक। और तीसरा, सबसे सस्ता — हर आयोग हर साल यह छापे कि अधिसूचना से नियुक्ति तक औसतन कितने महीने लगे। जिस राज्य में यह संख्या घटती दिखेगी, वहाँ धरने की ज़रूरत अपने आप कम होती जाएगी।

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