ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।इस हफ़्ते मानसून जब जलाशय भर रहा है, तभी उसके नीचे एक लंबी कहानी भी चल रही है: भारत हर घर के लिए पानी कैसे पक्का करे — बरसात में भी और सूखे महीनों में भी। पहुंच के मामले में प्रगति ऐतिहासिक रही है। जल जीवन मिशन के तहत नल कनेक्शन वाले ग्रामीण घर मार्च 2026 तक बढ़कर करीब 15.82 करोड़ हो गए — यानी 81% से ज़्यादा ग्रामीण घर — जबकि 2019 में मिशन शुरू होते वक़्त यह सिर्फ़ 3.23 करोड़ (17% से कम) थे। 2.7 लाख से ज़्यादा गांव ‘हर घर जल’ प्रमाणित हो चुके हैं, जहां हर घर और सार्वजनिक संस्थान में नल है। इतने कम समय में इतने लोगों तक एक बुनियादी सेवा पहुंचाना कम देशों ने कर दिखाया है।
अगला अध्याय ज़्यादा बारीक और अपने ढंग से ज़्यादा कठिन है। नल एक वादा है; उसमें हर दिन भरोसे से बहता साफ़ पानी उस वादे को पूरा करना है — और असली काम अब इन्हीं दोनों के बीच के फ़ासले में है। इसी को पहचानते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मिशन को दिसंबर 2028 तक बढ़ा दिया है, बढ़े हुए बजट और हर कनेक्शन के पीछे मौजूद जल-स्रोत की स्थिरता पर साफ़ ज़ोर के साथ। चुनौती अब पाइप बिछाने से हटकर उसे भरा रखने की है: उन भूजल भंडारों, धाराओं और जलाशयों की रक्षा करना जो व्यवस्था को पानी देते हैं।
नल के पीछे का स्रोत: करीब 15.82 करोड़ ग्रामीण घर अब जुड़े हैं; मिशन का 2028 तक विस्तार अब स्रोत की स्थिरता पर ज़ोर देता है — हर पाइप के पीछे भूजल और जलाशय भरे रखना।
पाइप बिछाना जल सुरक्षा का दिखने वाला आधा हिस्सा है। हर सूखे साल उसे भरा रखना — वह आधा हिस्सा जो टिकता है।
बड़ी तस्वीर
• पहुंच: मार्च 2026 तक ~15.82 करोड़ ग्रामीण नल कनेक्शन (81%+)
• शुरुआत: 2019 में 3.23 करोड़ कनेक्शन (17% से कम)
• प्रमाणित: 2.7 लाख+ ‘हर घर जल’ गांव
• आगे: मिशन 2028 तक बढ़ा, स्रोत-स्थिरता पर ज़ोर
ईमानदार हिसाब दबाव के बिंदु भी गिनाता है: उत्तर-पश्चिम और प्रायद्वीप के हिस्सों में भूजल का ज़रूरत से ज़्यादा दोहन, कहीं-कहीं पानी की गुणवत्ता, और कठिन भूभाग तथा फंडिंग की कमी से कुछ राज्यों में धीमी रफ़्तार। यही वजह है कि मानसून और जल मिशन एक ही बातचीत में आते हैं। हर सुव्यवस्थित बरसात ज़मीन के नीचे पानी जमा करने का मौका है — रिचार्ज गड्ढों, तालाबों के जीर्णोद्धार, चेक डैम और जल-संभर कामों के ज़रिए — ताकि बादल हटने के बाद भी नल चलता रहे। यहां वर्षा-जल संचयन कोई नारा नहीं, बल्कि वह तरीका है जो सर्वसुलभ आपूर्ति को टिकाऊ बनाता है।
बड़ी तस्वीर में सकारात्मक बात यह है कि भारत ने लगभग-सर्वसुलभ पहुंच का कठिन, बेआवाज़ काम कर लिया है और अब उतने ही ज़रूरी स्थायित्व की ओर बढ़ रहा है। आगे का रास्ता है पाइप को स्रोत के साथ जोड़ना: भूजल को नापना और भरना, खेती में — जो सबसे ज़्यादा पानी लेती है — कुशल उपयोग के लिए जल का प्रबंधन, शहरों के छोड़े पानी का ज़्यादा शोधन और पुनरुपयोग, और गांव की जल समितियों को अपनी आपूर्ति का ज़िम्मा देना। इसी धीरज से, हर घर में नल वही बन जाता है जो उसे बनना था — एक बार की उपलब्धि नहीं, बल्कि पीढ़ियों तक टिकने वाली जल सुरक्षा।










