ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।भारत की अंतरिक्ष एजेंसी ने अपने लिए एक व्यस्त और सोचा-समझा कैलेंडर तय किया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) इस वित्त वर्ष में सात प्रक्षेपण का लक्ष्य लेकर चल रहा है, और अगला मिशन करीब दो महीने के भीतर होने की उम्मीद है — यह बात इसरो प्रमुख वी. नारायणन ने इसी हफ्ते कही। एक अकेली शानदार उड़ान नहीं, बल्कि एक के बाद एक भरोसेमंद उड़ानों की लय ही किसी अंतरिक्ष कार्यक्रम को राष्ट्रीय गर्व से आगे बढ़ाकर देश का एक काम करता हुआ बुनियादी ढांचा बना देती है।
इस सूची में ज़रूरत की चीज़ें भी हैं और इतिहास रचने वाली भी। सबसे अहम में एक है GISAT-2 — एक भू-इमेजिंग उपग्रह, जो बाढ़, चक्रवात या भूस्खलन जैसी आपदा के समय तेज़ी से तस्वीरें भेजने के लिए बना है, यानी आसमान से आपदा राहत पर टिकी एक नज़र। इसरो के मुताबिक उसके दो उपग्रह पूरी तरह तैयार हैं और पांच-छह अंतिम जोड़-तोड़ के चरण में हैं। इससे आगे साल की दो बड़ी उपलब्धियां हैं: मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम “गगनयान” की पहली बिना-चालक दल वाली परीक्षण उड़ान, और तमिलनाडु के कुलशेखरपट्टिनम में दूसरे प्रक्षेपण केंद्र की शुरुआत, जो अगले करीब छह महीने में होने की उम्मीद है। यह खाका ऐसे समय आया है जब कुछ ही दिन पहले स्काईरूट का विक्रम-1 कक्षा तक पहुंचने वाला भारत का पहला निजी रॉकेट बना — यानी सरकारी एजेंसी और नया निजी क्षेत्र अब साथ-साथ ऊपर चढ़ रहे हैं।
एक लय, एक बार की बात नहीं: इसरो का इस साल सात प्रक्षेपण का इरादा — आपदा में तस्वीरें भेजने वाले उपग्रह से लेकर गगनयान की पहली परीक्षण उड़ान तक — अंतरिक्ष को एक भरोसेमंद क्षमता में बदलने की कोशिश है।
कोई देश अंतरिक्ष शक्ति एक उड़ान से नहीं, इस बात से नापा जाता है कि वह कितनी बार फिर उड़ान भर सकता है। एक भरा-पूरा, समय पर चलने वाला कैलेंडर ही किसी कार्यक्रम के परिपक्व होने की चुपचाप गवाही है।
एक नज़र में
• लक्ष्य: इस वित्त वर्ष सात प्रक्षेपण; अगला मिशन करीब दो महीने में
• कतार में: GISAT-2 — आपदा में तेज़ तस्वीरें भेजने वाला भू-इमेजिंग उपग्रह
• बड़ी उपलब्धि: गगनयान की पहली बिना-चालक दल परीक्षण उड़ान
• नया केंद्र: कुलशेखरपट्टिनम (तमिलनाडु) में दूसरा प्रक्षेपण केंद्र, ~6 महीने में
यह कैलेंडर अंतरिक्ष जगत से बाहर भी अहम क्यों है? क्योंकि इसका बड़ा हिस्सा सीधे ज़मीन की रोज़मर्रा ज़िंदगी से जुड़ता है। GISAT-2 जैसे पृथ्वी-निगरानी उपग्रह वही बाढ़ और चक्रवात चेतावनियां भेजते हैं जो तटीय और नदी किनारे बसे लोगों की रक्षा करती हैं; कुलशेखरपट्टिनम में दूसरा केंद्र श्रीहरिकोटा पर बोझ घटाएगा और दक्षिण की ओर होने वाले छोटे प्रक्षेपणों के लिए मुफ़ीद है; और गगनयान की बिना-चालक उड़ान भारतीयों को कक्षा तक ले जाने की दिशा में एक सधा हुआ पहला कदम है। हर प्रक्षेपण पूरे उद्योग को भी खींचता है — इंजन, उपकरण, कच्चा माल और हुनरमंद रोज़गार।
सीधी बात यह है कि यहां महत्वाकांक्षा को उसके “पूरा होने” से आंकना बेहतर है। सात प्रक्षेपण एक वादा है; असली मोल तब मिलेगा जब उड़ानें एक के बाद एक समय पर पूरी हों। आगे का रास्ता है — स्थिर धन, गहरा आपूर्ति तंत्र और वह सरकारी-निजी साझेदारी जो अभी आकार ले रही है, ताकि भारत के इंजीनियर सिर्फ उपग्रह नहीं, एक भरोसेमंद प्रक्षेपण क्षमता खड़ी करें, जिस पर पूरा क्षेत्र टिक सके। इसी धीरज से चला जाए, तो कक्षा में एक व्यस्त साल आगे के कई सालों की बुनियाद बन जाता है।












