ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।इंदौर के चिड़ियाघर में अब 14-डी सिनेमा और वर्चुअल जंगल सफ़ारी है। दिलचस्प बात यह है कि इस पर सरकार का पूँजी ख़र्च नहीं लगा।
देश का पहला वर्चुअल ज़ू मध्य प्रदेश के इंदौर में शुरू हो गया है। इसके साथ इंदौर चिड़ियाघर में 14-डी सिनेमा थिएटर और वर्चुअल जंगल सफ़ारी भी खोली गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 16 अगस्त को इन सुविधाओं का उद्घाटन किया और स्कूली बच्चों के साथ 14-डी सिनेमा में एक फ़िल्म भी देखी। वर्चुअल जंगल सफ़ारी में लोग तकनीक के ज़रिए जंगल और वन्यजीवों का अनुभव कर सकते हैं।
अब वह बात जो ज़्यादा काम की है। 14-डी सिनेमा और वर्चुअल जंगल सफ़ारी पीपीपी मॉडल यानी सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत करीब 4.5 करोड़ रुपये की लागत से बनी हैं। यानी शहर को एक नई सुविधा मिली और उसके लिए सरकारी ख़ज़ाने से पूँजी नहीं निकली। छोटे और मझोले शहरों के चिड़ियाघरों, संग्रहालयों और विज्ञान केंद्रों के लिए यह मॉडल देखने लायक़ है — क्योंकि इन जगहों के लिए पैसा हमेशा कम पड़ता है, और आगंतुक की टिकट से चलने वाली सुविधा अपने ख़र्च ख़ुद निकाल सकती है।
नई सुविधा: इंदौर का चिड़ियाघर, जहाँ 16 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने देश का पहला वर्चुअल ज़ू, 14-डी सिनेमा और वर्चुअल जंगल सफ़ारी शुरू की।
शहर को नई सुविधा मिली, और सरकारी ख़ज़ाने से पूँजी नहीं निकली। छोटे शहरों के चिड़ियाघरों के लिए यही मॉडल देखने लायक़ है।
एक नज़र में
• क्या: देश का पहला वर्चुअल ज़ू
• कहाँ: इंदौर चिड़ियाघर, मध्य प्रदेश
• उद्घाटन: 16 अगस्त 2026
• किसने किया: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव
• साथ में: 14-डी सिनेमा थिएटर, वर्चुअल जंगल सफ़ारी
• लागत: करीब 4.5 करोड़ रुपये
• मॉडल: पीपीपी — सार्वजनिक-निजी भागीदारी
• किसके लिए: बच्चे, स्कूली समूह, पर्यटक
• मक़सद: तकनीक के ज़रिए वन्यजीव और प्रकृति की जानकारी
बच्चों के लिहाज़ से इसका मतलब सीधा है। चिड़ियाघर में जानवर दिखते हैं, पर उनका जंगल नहीं दिखता — न वह जंगल, जहाँ बाघ रहता है, न वह ऊँचाई जहाँ से नदी दिखती है। वर्चुअल सफ़ारी वही खाई भरती है, और स्कूली समूहों के लिए यह किताब के पाठ से आगे की चीज़ है। मुख्यमंत्री ने उद्घाटन के दिन बच्चों के साथ बैठकर फ़िल्म देखी, जो इस सुविधा के असली दर्शक कौन हैं, यही बताता है।
आगे का काम भी छोटा और साफ़ है। ऐसी सुविधाएँ चलती तब हैं जब स्कूलों के लिए सस्ती या मुफ़्त शैक्षिक स्लॉट रखी जाएँ, हिंदी में सामग्री हो, और मशीनों का रखरखाव पहले दिन जैसा बना रहे — तकनीक आधारित केंद्र सबसे ज़्यादा इसी वजह से बंद होते हैं। इंदौर ने शुरुआत कर दी है; बड़ी बात यह होगी कि भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर और रीवा जैसे शहरों तक यह पहुँचे, और वहाँ भी सरकारी पूँजी के बिना।













