ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।उत्तर के पहाड़ों पर बारिश फिर पूरे ज़ोर पर लौट आई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने बुधवार के लिए हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के कुछ हिस्सों में रेड चेतावनी जारी की है, जहां कहीं-कहीं बेहद भारी बारिश हो सकती है और भीगी ढलानों पर अचानक बाढ़ तथा भूस्खलन का असली ख़तरा है। उत्तराखंड में देहरादून, नैनीताल, चमोली, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग और पिथौरागढ़ जैसे ज़िले चेतावनी में शामिल हैं; मैदानों में दिल्ली समेत एक दर्जन से ज़्यादा राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट है, क्योंकि दक्षिण-पश्चिम मानसून फिर सक्रिय दौर में लौट आया है।
अधिकारी चेतावनी के पीछे-पीछे नहीं, उसके साथ चल रहे हैं। पहाड़ी घाटियों में नदियों के जलस्तर पर नज़र है, आपदा-मोचन दल पहले से तैनात हैं, और पहाड़ों को जोड़ने वाले तीर्थ तथा पर्यटन मार्गों के लिए यात्रा-सलाह जारी है। इतनी खड़ी ढलानों पर ख़तरा कुल बारिश से कम, उसकी रफ़्तार से ज़्यादा होता है — एक बादल फटने से चंद मिनटों में नाला उफनती धारा बन जाता है — इसलिए ज़ोर अब हाईवे खुले रखने, नालियां बहती रखने और लोगों तक फ़ोन और सायरन से जानकारी पहुंचाते रहने पर है।
सक्रिय दौर: आईएमडी की रेड चेतावनी हिमाचल, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हिस्सों में; चिह्नित पहाड़ी ज़िलों में बाढ़-भूस्खलन का ख़तरा — राहत दल पहले से तैनात।
पहाड़ों में जान बारिश की गहराई से नहीं, उसकी रफ़्तार से जाती है। चेतावनी का वक़्त ही असली लड़ाई है।
एक नज़र में
• रेड चेतावनी: हिमाचल, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हिस्से
• ख़तरा: भीगी ढलानों पर अचानक बाढ़ और भूस्खलन
• चिह्नित ज़िले: देहरादून, नैनीताल, चमोली, पौड़ी, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़
• मैदान: दिल्ली समेत 12+ राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट
दो सच्चाइयों को एक साथ थामना ज़रूरी है। यही वह बारिश है जो देश के जलाशय भरती है, उस खरीफ़ की बुवाई के लिए मिट्टी भिगोती है जो देश का पेट भरती है, और लंबी गर्मी में सूखे भूजल को फिर भरती है; एक मज़बूत और अच्छी तरह फैला मानसून अर्थव्यवस्था के लिए सबसे स्वागतयोग्य चीज़ों में है। असली काम इस फ़ायदे को समेटते हुए उसी मौसम के तीखे किनारे को कुंद करना है — किसी पहाड़ी कस्बे का अचानक डूबना, हाईवे पर भूस्खलन, नीचे की ओर उफनती नदी।
सकारात्मक बात यह है कि भारत की पूर्व-चेतावनी व्यवस्था चुपचाप और सक्षम हुई है, और सक्रिय दौर ठीक वही है जिसके लिए यह बनी है। आगे का रास्ता है सूचना-कड़ी को आख़िरी गांव तक पहुंचाते रहना, राहत दलों को सिर्फ़ अनुमानित चरम पर नहीं बल्कि पूरे दौर में तैनात रखना, और जल-निकासी, तटबंधों तथा ढलानों में लगातार निवेश करना। इसी स्थिरता से, तेज़ बारिश का एक हफ़्ता भी वही रहता है जो मानसून भारत के लिए हमेशा रहा है — डरने की नहीं, सुरक्षित तरीके से समेटने की एक पूंजी।










