ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।दिल्ली में अटल कैंटीन की संख्या सौ हो गई है। थाली की कीमत नहीं, कैंटीन की जगह देखिए — वहीं इस योजना का पूरा डिज़ाइन छिपा है।
शनिवार को, अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर, दिल्ली में 25 नई अटल कैंटीन शुरू हुईं और इनके साथ राजधानी में कुल संख्या 100 पहुँच गई। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कैंटीन का दौरा किया और आम लोगों के साथ बैठकर वहीं खाना खाया। हर कैंटीन में पूरी थाली 5 रुपये में मिलती है। योजना दिसंबर 2025 में पहले चरण की 45 कैंटीन से शुरू हुई थी, फ़रवरी 2026 में 25 और जुड़ीं, और अब यह सौ पर है।
अब असली बात, जो आँकड़े में नहीं दिखती। ये कैंटीन कहाँ खोली गई हैं — औद्योगिक इलाक़ों में, झुग्गी बस्तियों में, प्रवासी मज़दूरों की बसाहटों में और घनी आबादी वाले मोहल्लों में। यही चुनाव योजना की समझ बताता है। दिहाड़ी पर काम करने वाला आदमी घर से टिफ़िन लेकर नहीं निकलता, और काम की जगह के पास खाने का सस्ता ठिकाना न हो तो वह खाना छोड़ देता है, या 40–50 रुपये की थाली ख़रीदता है। सीधी बात यह है कि 5 रुपये की थाली उस आदमी के लिए बचत नहीं है — वह उस दिन के खाने और भूखे रहने के बीच का फ़र्क़ है।
सौवीं कैंटीन तक: मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने शनिवार को 25 नई अटल कैंटीन शुरू कीं और ख़ुद वहाँ बैठकर खाना खाया। हर थाली 5 रुपये में।
5 रुपये की थाली दिहाड़ी वाले के लिए बचत नहीं है। वह खाने और भूखे रहने के बीच का फ़र्क़ है।
एक नज़र में
• कुल कैंटीन: दिल्ली में अब 100
• ताज़ा जुड़ीं: 15–16 अगस्त 2026 को 25 नई
• मौक़ा: अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि
• थाली की कीमत: 5 रुपये
• पहला चरण: दिसंबर 2025 में 45 कैंटीन
• दूसरा चरण: फ़रवरी 2026 में 25 और
• जगह का चुनाव: औद्योगिक इलाक़े, झुग्गी बस्तियाँ, प्रवासी बसाहटें, घनी आबादी
• साथ में: महिलाओं के लिए पिंक कार्ड से मुफ़्त बस यात्रा को प्राथमिकता
• बाज़ार भाव से तुलना: आम थाली 40–50 रुपये
• देखने वाली बात: कैंटीन खुलने का समय, शिफ़्ट के हिसाब से या दफ़्तर के
इसके साथ एक और बात मुख्यमंत्री ने कही — महिलाओं के लिए पिंक कार्ड से मुफ़्त बस यात्रा को प्राथमिकता दी जाएगी। दोनों बातें अलग-अलग योजनाएँ लगती हैं, पर एक ही गणित की हैं। कम आमदनी वाले परिवार में महीने का ख़र्च दो चीज़ों में सबसे ज़्यादा जाता है — खाना और आना-जाना। इन्हीं दोनों पर सीधी राहत मिलती है तो हाथ में बचा पैसा फ़ीस, दवा या क़र्ज़ की किश्त में जाता है। यह वह असर है जो किसी योजना के आँकड़े में दर्ज नहीं होता, पर घर के बजट में साफ़ दिखता है।
आगे का रास्ता भी साफ़ है, और बड़ी बात यह है कि इसमें ख़र्च नहीं, इंतज़ाम की ज़रूरत है। पहली चीज़ — कैंटीन खुलने का समय। मज़दूर की शिफ़्ट सुबह 7 बजे शुरू होती है और शाम को देर से ख़त्म होती है; अगर कैंटीन दफ़्तर के समय पर चलेगी तो थाली सस्ती रहकर भी उस तक नहीं पहुँचेगी। दूसरी — रोज़ कितनी थालियाँ बिकीं, इसका आँकड़ा कैंटीन-वार सार्वजनिक हो जाए। जहाँ थालियाँ ख़त्म हो जाती हैं वहाँ माँग ज़्यादा है और वहाँ एक और कैंटीन चाहिए; जहाँ बची रह जाती हैं वहाँ जगह या समय ग़लत है। यह आँकड़ा सरकार के पास हर दिन बनता है। उसे छापना सबसे सस्ता सुधार है।













