ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।रोज़ की सुर्खियों से दूर, भारत साफ़ बिजली की क्षमता उस रफ़्तार से जोड़ रहा है जो चुपचाप दुनिया की सबसे तेज़ में शुमार हो गई है। देश की कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़कर करीब 288 गीगावाट हो गई है, और अकेले 2026 की पहली छमाही में करीब 29 गीगावाट नई सौर और पवन क्षमता जुड़ी — एक रिकॉर्ड बढ़त, जिसकी अगुवाई सौर ऊर्जा और घरेलू छत-सौर योजना के तहत आई तेज़ी ने की। कुल सौर क्षमता 150 गीगावाट के पार जा चुकी है, और भारत अब स्थापित सौर क्षमता में दुनिया में तीसरे नंबर पर है। यह कोई एक पड़ाव नहीं, एक लगातार ऊपर की ओर मुड़ता वक्र है।
इस बदलाव को अपने-आप आगे बढ़ने वाला बनाती है इसकी अर्थव्यवस्था। सौर और पवन अब सबसे सस्ती नई बिजली हैं जो भारत बना सकता है, इसलिए जुड़ा हर गीगावाट लंबे समय में बिजली की लागत घटाता है, न कि बढ़ाता — और साथ ही तेल-कोयले के उस आयात बिल को हल्का करता है जो व्यापार संतुलन पर बोझ है, और हवा भी साफ़ करता है। छत-सौर की मुहिम इस फ़ायदे को घरों और छोटे कारोबारियों तक फैलाती है, उपभोक्ता को उत्पादक बनाती है, और एक गर्म होती, ज़्यादा बिजली खाती अर्थव्यवस्था में ग्रिड पर दबाव घटाती है।
[ PHOTOGRAPH ] भारत का एक बड़ा सौर ऊर्जा पार्क, नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार का प्रतीक
लगातार मुड़ता वक्र: भारत की नवीकरणीय क्षमता करीब 288 गीगावाट, 2026 की पहली छमाही में रिकॉर्ड ~29 गीगावाट सौर-पवन जुड़ी, कुल सौर 150 गीगावाट के पार — दुनिया में तीसरा स्थान।
ऊर्जा की सबसे साफ़ इकाई अब सबसे सस्ती भी बनती जा रही है। भारत की बढ़त यह है कि इस बार सही काम और किफ़ायती काम एक ही दिशा में हैं।
बड़ी तस्वीर
• कुल नवीकरणीय: करीब 288 गीगावाट स्थापित क्षमता
• पहली छमाही 2026: रिकॉर्ड ~29 गीगावाट सौर और पवन जुड़ी
• सौर: कुल क्षमता 150 गीगावाट के पार; भारत दुनिया में तीसरा
• अगली चुनौती: भंडारण (बैटरी), मज़बूत ग्रिड, और सेल-मॉड्यूल का घरेलू निर्माण
ईमानदार हिसाब उस बात का नाम भी लेता है जो वक्र को बनाए रखने के लिए अभी बननी बाकी है। सूरज और हवा घटते-बढ़ते रहते हैं, इसलिए बदलाव का कठिन आधा हिस्सा उनके इर्द-गिर्द की व्यवस्था है — बैटरी और पंप-हाइड्रो भंडारण, धूप और हवा वाले राज्यों से बिजली को मांग वाले इलाकों तक ले जाने वाली मज़बूत पारेषण लाइनें, और इतना समझदार ग्रिड जो इस सबका संतुलन बिठा सके। साथ में वह औद्योगिक काम है — सेल, मॉड्यूल और बैटरियां आयात करने के बजाय भारत में ज़्यादा बनाना, ताकि साफ़-ऊर्जा का यह विस्तार विदेश में नहीं, देश में ही फैक्ट्रियां और रोज़गार जड़े।
बड़ी तस्वीर में सकारात्मक बात यह है कि यह भारत के सबसे ऊंचे रिटर्न वाले निवेशों में है: एक साझा बुनियाद जो एक साथ ऊर्जा की लागत घटाती है, आयात-निर्भरता कम करती है और जन-स्वास्थ्य सुधारती है, और हर गीगावाट के साथ थोड़ी और मज़बूत होती जाती है। आगे का रास्ता इस रफ़्तार को बनाए रखते हुए वह भंडारण, ग्रिड और घरेलू आपूर्ति-श्रृंखला सोच-समझकर खड़ी करना है जो रिकॉर्ड क्षमता को चौबीसों घंटे भरोसेमंद बिजली में बदल दे। इसी सावधानी से, 2026 की यह खामोश बुनियाद दशकों तक एक साफ़, सस्ती और ज़्यादा आत्मनिर्भर ऊर्जा-व्यवस्था की रीढ़ बन जाती है।











