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मानसून की मेहरबानी से आगे: जल सुरक्षा की लंबी राह

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 23, 2026
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कावेरी जल विवाद पर फिर गरमाई तमिलनाडु की राजनीति

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।हर साल यही नाटक दोहराता है: 1.4 अरब लोगों का देश जून और जुलाई भर सांस थामे आसमान की ओर देखता है। इस बार का देर से आया मानसून और उसके कारण पिछड़ी बुवाई एक गहरी, ढांचागत सच्चाई की ताज़ा याद है — कि भारत का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी चंद हफ़्तों की बारिश के भरोसे जीता है। किसी एक मौसम से बड़ा सवाल यह नहीं कि इस साल मानसून मेहरबान रहेगा या नहीं, बल्कि यह कि भारत अपने खेतों, शहरों और उद्योगों को इस पर से कैसे कम निर्भर बनाए।

दांव बहुत बड़ा और सबका साझा है। खेती भारत की करीब आधी आबादी को सहारा देती है, फिर भी उसकी बहुत सारी ज़मीन आज भी सिंचित नहीं, बारिश पर निर्भर है; दुनिया के मीठे पानी का एक छोटा हिस्सा भारत के पास है, जबकि आबादी दुनिया की छठवीं है; और भूजल — वह अदृश्य भंडार जो दशकों से चुपचाप फ़सलें सींचता रहा — उत्तर और पश्चिम के बड़े हिस्सों में भरने से तेज़ी से ख़ाली हो रहा है। ऊपर से गरम होती जलवायु हर मानसून को और अनियमित बना रही है।

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अच्छे साल को बुरे के लिए बचाना: जलाशय, नहरें और फिर से भरे गए भूजल-भंडार ही किसी देश को अनिश्चित मानसून से भरोसेमंद जल-आपूर्ति तक ले जाते हैं — खाद्य और जल सुरक्षा के पीछे की ख़ामोश अवसंरचना।

कोई देश मानसून को क़ाबू नहीं कर सकता, पर यह तय कर सकता है कि उसका भविष्य उस पर कितना निर्भर रहे। जल सुरक्षा वही फ़ैसला है — नहरों, भूजल और फ़सल के चुनाव में लिया गया।

बड़ी तस्वीर

• निर्भरता: भारत की बहुत सी खेती अब भी सिंचित नहीं, बारिश पर आश्रित
• भंडार: कई इलाक़ों में भूजल भरने से तेज़ी से घट रहा
• दबाव: गरम होती जलवायु हर मानसून को और अनियमित बना रही
• औज़ार: कुशल सिंचाई, जल भंडारण, भूजल पुनर्भरण, समझदार फ़सल-चुनाव

राहत की बात यह है कि ये जानकारी की नहीं, अमल की समस्याएं हैं — और औज़ार भारत के पास पहले से हैं। बूंद-बूंद (ड्रिप) और सूक्ष्म सिंचाई हर बूंद से ज़्यादा फ़सल दे सकती है; तालाबों, पोखरों और चेक-डैम का पुनर्जीवन मानसून की तेज़ बौछारों को सूखे महीनों के लिए सहेज सकता है; भूजल पुनर्भरण बाढ़ के पानी को ख़तरे के बजाय बचत-खाते में बदल देता है; और पानी व बिजली की ऐसी क़ीमत जो बचत को इनाम दे, किसानों को सबसे प्यासी फ़सलों से धीरे-धीरे दूर ले जा सकती है। इसके लिए किसी चमत्कार की नहीं, धैर्य, निवेश और हर बूंद को संपत्ति मानने की इच्छाशक्ति की ज़रूरत है।

बड़ी तस्वीर में सकारात्मक और आगे का रास्ता है जल सुरक्षा को मौसमी घबराहट के बजाय स्थायी प्राथमिकता बनाना। इसका मतलब है सिंचाई का दायरा बढ़ाना ताकि कम किसान पहली बारिश के समय पर निर्भर रहें; हर इलाक़े की फ़सल को वहां उपलब्ध पानी से मिलाना, और फ़सल बदलने वाले किसानों को उचित सहारा देना; अच्छे सालों को बुरे सालों के लिए सहेजने वाला भंडारण बनाना और उसे बनाए रखना; और जल-प्रबंधकों को दशकों आगे की योजना बनाने के आंकड़े व अधिकार देना। ऐसा करें तो आसमान की ओर हर साल की चिंता भरी टकटकी थोड़ी कम होती जाएगी — इसलिए नहीं कि मानसून भरोसेमंद हो गया, बल्कि इसलिए कि भारत उसके प्रति सहनशील हो गया।

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