ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।एक हफ्ते की बाढ़ चेतावनियों के पीछे किसी एक मानसून से कहीं ज़्यादा स्थायी चुनौती बैठी है: देश अपने पानी को कैसे रोके, भंडारित करे और बांटे। दुनिया की करीब 18% आबादी भारत में रहती है, पर दुनिया के मीठे पानी का सिर्फ़ लगभग 4% ही उसके पास है (सरकारी अनुमान), और उसकी लगभग तीन-चौथाई बारिश मानसून के चार महीनों में होती है — अक्सर इतनी तेज़ कि ज़मीन उसे सोख ही नहीं पाती। भारत की असली पानी समस्या सिर्फ़ कमी या बाढ़ नहीं, बल्कि समय और भंडारण की है: कुछ हफ्तों में बहुत ज़्यादा पानी, बाकी साल बहुत कम।
दांव हर तरफ है। खेती आज भी भारत के पानी का सबसे बड़ा हिस्सा पीती है, जिसका बड़ा भाग उस भूजल से आता है जिसे कई इलाकों में बारिश की भरपाई से तेज़ खींचा जा रहा है। शहर जुलाई की जलभराव वाली सड़कों से अप्रैल की टैंकर कतारों के बीच झूलते हैं। और जो पहाड़ सबसे भारी मानसून झेलते हैं, वही पानी को नीचे की ओर दौड़ा देते हैं, जहां वह भूजल भरने के बजाय मैदान को डुबो सकता है। हर साल दोहराया जाने वाला काम एक ही है — बरसात की इस बरसात को सूखे महीनों के लिए ज़्यादा से ज़्यादा रोक लेना।
पुरानी सीख, नई ज़रूरत: भारत की बावड़ियां मानसून को सूखे महीनों के लिए सहेजती थीं। स्थायी पानी सवाल आज भी वही है — बरसात की नेमत को उसी के पास ज़्यादा रोको जहां वह गिरती है।
भारत में पानी की उतनी कमी नहीं, जितनी उस पानी की जो उसे चाहिए — जहां और जब चाहिए। इसका हल ज़्यादा बारिश खोजने में नहीं, आई हुई बारिश को रोक लेने में है।
बड़ी तस्वीर
• हिस्सा: दुनिया की ~18% आबादी, ~4% मीठा पानी (सरकारी अनुमान)
• समय: साल की करीब तीन-चौथाई बारिश मानसून के महीनों में
• सबसे बड़ा उपयोग: खेती, जिसका बड़ा हिस्सा भूजल से
• हल: भंडारण, पुनर्भरण और किफ़ायती उपयोग — सिर्फ़ ज़्यादा आपूर्ति नहीं
ईमानदार हिसाब यह है कि रास्ता लंबा है, पर औज़ार पहले से हाथ में हैं। वर्षा जल संचयन और तालाब-पोखरों का पुनरुद्धार पानी को वहीं रोकता है जहां वह गिरता है; वाटरशेड कार्यक्रम और चेक डैम बहाव को धीमा कर भूजल भरते हैं; सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप-स्प्रिंकलर) खेत में हर बूंद को दूर तक ले जाती है; और शहरी गंदे पानी का शोधन कर दोबारा उपयोग बोझ को संसाधन में बदल देता है। “जल जीवन मिशन” के तहत हर ग्रामीण घर तक नल पहुंचाने की मुहिम ने करोड़ों की रोज़मर्रा ज़िंदगी बदली है, और यह तब सबसे अच्छा चलती है जब इसके साथ जल-स्रोत को भरने का काम भी जुड़ा हो।
बड़ी तस्वीर में सकारात्मक बात यह है कि पानी की सुरक्षा भारत की सबसे हल हो सकने वाली बड़ी चुनौतियों में है — यह प्रकृति की कंजूसी कम, सधी इंजीनियरिंग, स्थानीय देखभाल और धीरज भरे निवेश की बात ज़्यादा है। आगे का रास्ता है मानसून की हर बूंद को बचाई जाने वाली पूंजी की तरह देखना: भूजल भरो, पारंपरिक भंडारण लौटाओ, पानी का दाम और उपयोग समझदारी से तय करो, और नदियों को सीमा नहीं, बेसिन के हिसाब से संभालो। इसी निरंतरता से, जुलाई की बाढ़ और मई की किल्लत दो अलग संकट नहीं रह जाते — वे एक ही व्यवस्था के दो सिरे बन जाते हैं, जिसे भारत ने संतुलित करना सीख लिया है।












