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राफेल लड़ाकू विमान पर रोडमैप तैयार

50 प्रतिशत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर अड़े भारतीय वार्ताकार, फ्रांसीसी अधिकारी झुके

by ब्लिट्ज़ इंडिया
March 4, 2026
in the blitz
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ब्लिट्ज ब्यूरो

पेरिस। भारत और फ्रांस के अधिकारी 114 राफेल लड़ाकू विमान पर सौदा तय करने के लिए जमकर माथा पच्ची कर रहे हैं। बिल्कुल उसी तरह से सौदेबाजी हो रही है जैसे दिल्ली के सरोजनी नगर मार्केट में कपड़े खरीदते वक्त होती है। पिछले दिनों नवभारत टाइम्स से बात करते हुए नौसेना के एक पूर्व अधिकारी , जो रूस के साथ एक मिलिट्री हार्डवेयर (बड़े सौदे) में शामिल थे, ने कहा था कि ये बातचीत भी उसी तरह से होती है जैसे सब्जी खरीदते वक्त की जाती है। एक-एक प्वाइंट पर कई-कई राउंड में बैठक। इस तरह के डिफेंस डील में आखिरी जीत उसी की होती है जो सबसे ज्यादा धैर्य दिखाता है। इसीलिए दोनों ही देशों के अधिकारियों के धैर्य की परीक्षा हो रही है।

फ्रांसीसी अखबारों का कहना है कि भारत की पहली शर्त ही ‘मेक इन इंडिया’ है और चूंकी फ्रांसीसी कंपनी पहली बार देश से बाहर अपनी फैसिलिटी खोलने जा रही है, इसलिए काफी हिचकिचाहट है। फ्रांस से बाहर राफेल का प्रोडक्शन शुरू करने में कई अधिकारियों को एतराज भी है, लेकिन अरबों डॉलर की डील हाथ से बाहर जाने नहीं देना चाहते। इसीलिए बातचीत चल रही है। माना जा रहा है कि अभी कम से कम एक साल और बातचीत में लगेगा। अगले साल मार्च-अप्रैल तक राफेल पर सौदेबाजी पूरी हो सकती है।

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भारत की रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) से राफेल सौदे को मंजूरी मिल चुकी है। रक्षा मंत्रालय में हथियारों की खरीद-बिक्री की जिम्मेदारी संभाल चुके रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल संजय वर्मा से नवभारत टाइम्स ने इस पूरी प्रक्रिया को समझने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि रक्षा समझौते होना काफी जटिल और कई महीनों और कई सालों तक चलने वाली प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि जैसे डीएसी से मंजूरी मिलने के बाद अब तकनीकी मूल्यांकन समिति (टीईसी) इसकी जांच करेगी। इसके बाद फिर कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) से सौदे को मंजूरी लेनी होगी। सीसीएस से फाइनेंशियल मंजूरी मिलती है और उसके बाद जाकर ही आखिरी समझौते पर दस्तखत किए जाते हैं।

संजय वर्मा ने कहा कि भारत में ये चरण कई महीनों तक चलने वाली प्रक्रिया है और कई बार डिफेंस डील में इस वजह से देरी हो जाती है, लेकिन ये जरूरी है। जैसे राफेल को लेकर भारत हर हाल में मेक इन इंडिया चाहता है। राफेल अगर भारत में बनता है तो लड़ाकू विमानों को लेकर एक इको-सिस्टम डेवलप होगा, जिसका असर अगले कई दशकों तक देखने को मिलेगा। फ्रांसीसी अखबार ले मोंडे ने इस डील को लेकर लिखा है कि यह फ्रांसीसी डिफेंस फर्मों के लिए एक बड़ी कामयाबी है, जिनका बिजनेस मॉडल काफी हद तक एक्सपोर्ट पर निर्भर करता है। लेकिन यह एक चुनौती भी है, क्योंकि भारतीय अधिकारी देश में और ज्यादा इन्वेस्टमेंट और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को पक्क ा करने के लिए पक्क ा इरादा दिखा रहे हैं। इसने ये भी बताया है कि फ्रांसीसी अधिकारी ‘भारत को बड़ी छूट देने को तैयार हैं।’

टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर सबसे ज्यादा खींचतान
रिपोर्ट के मुताबिक, राफेल बनाने वाली कंपनी डसॉल्ट ने लोकल मैन्युफैक्चरिंग के लिए करीब 40% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का ऑफर रखा है, लेकिन बातचीत में शामिल भारतीय अधिकारी 50 प्रतिशत से कम पर तैयार नहीं हैं। भारतीय अधिकारी अड़े हुए हैं। ये घरेलू इकोसिस्टम को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है। कई सारी बातों पर अभी और माथापच्ची करना बाकी है जैसे टेक्निकल ओवरसाइट कमेटी (टीओसी) के दौरान डसॉल्ट को एक पूरा रोडमैप बनाना होगा, भारतीय प्रोडक्शन के लिए तय इक्विपमेंट की एक डिटेल्ड लिस्ट तैयार करनी होगी, इसमें शामिल पार्टनर कंपनियों की तलाश करनी होगी और हर एक को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का सही लेवल क्या होगा, ये तय करना होगा। कुल मिलाकर ये काफी सख्त चेकलिस्ट है जिसका मकसद यह पक्क ा करना है कि 50% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर सिर्फ कागजों पर ना रहे।

भारत में बनेगा फ्यूजलेज : एक बात जो तय हो चुका है वो ये कि राफेल का पूरा फ्यूजलेज भारत में ही बनाया जाएगा, जिसमें टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (पीएएसएल) एक अहम खिलाड़ी के तौर पर आगे आ रहा है। एक ऐसी कंपनी के लिए जो पहले से ही ग्लोबल एयरोस्पेस सप्लाई चेन में गहराई से जुड़ी हुई है, यह एक बहुत बड़ी छलांग होगी। एयरक्राफ्ट के सबसे मुश्किल और स्ट्रक्चर के हिसाब से जरूरी हिस्सों में से एक को यहीं अपने देश में संभालना एक बड़ा कदम है।

इंजन पर बातचीत : सफ्रान के साथ एम 88 टर्बोफैन इंजन के स्थानीय विनिर्माण और असेंबली पर गंभीर चर्चा चल रही है। इसके लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) एक मजबूत दावेदार के रूप में उभरी है। फ्रांसीसी कंपनी सफ़रान ने भारत में इंजन असेंबली लाइन खोलने के लिए सार्वजनिक रूप से तत्परता दिखाई है, जो इस सौदे में मेक इन इंडिया के प्रति फ्रांस की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
फ्रांसीसी अखबार का कहना है कि हालांकि प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन गहन बातचीत और तकनीकी मूल्यांकन के कारण इस सौदे के मार्च 2027 के आसपास अंतिम रूप लेने की संभावना है।

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