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पहली चिप की उलटी गिनती: अब भारत में बनेगा सिलिकॉन

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 22, 2026
in विज्ञान-खेल
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।गुजरात के तटवर्ती मैदान में एक कस्बे जितनी बड़ी फ़ैक्ट्री उस पड़ाव के करीब है, जिसका इंतज़ार देश दशकों से कर रहा था। धोलेरा में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने ताइवान की पावरचिप (पीएसएमसी) के साथ मिलकर करीब 91,000 करोड़ रुपये की लागत से भारत का पहला व्यावसायिक सेमीकंडक्टर (अर्धचालक) कारख़ाना बनाया है, जो सरकार के मुताबिक 2026 के आख़िर तक अपनी पहली ‘मेड-इन-इंडिया’ चिप निकालने की राह पर है। यह पहली चिप 28 नैनोमीटर की होगी — एक भरोसेमंद, आम इस्तेमाल वाली तकनीक, जो दुनिया भर में कारों, फ़ोन, उपकरणों और मशीनों को चलाती है। यह धरती की सबसे उन्नत चिप नहीं है, और शुरुआत के लिए यही समझदारी भरी जगह है।

यह हौसला सिर्फ़ प्रतीक का नहीं, उद्योग का है। धोलेरा का यह कारख़ाना हर महीने 50,000 वेफ़र तक बनाने के लिए बना है, और इसकी चिप बिजली-प्रबंधन तथा लॉजिक जैसे कामों के लिए होंगी — इलेक्ट्रिक वाहन, टेलीकॉम, रक्षा, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और डिस्प्ले, यानी ठीक वही उपकरण जो भारतीय फ़ैक्ट्रियां लगातार बढ़-चढ़कर जोड़ रही हैं। इसके साथ साणंद में एक असेंबली-एंड-टेस्ट संयंत्र और ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ के दूसरे प्रोजेक्ट पैकेजिंग, कच्चे माल और कुशल कामगारों की वे परतें बना रहे हैं जिनकी किसी भी चिप-उद्योग को ज़रूरत होती है।

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भरोसेमंद तकनीक से शुरुआत: धोलेरा की पहली चिप 28नैनोमीटर की होगी — वही सिलिकॉन जो कारों, उपकरणों और मशीनों को चलाता है — और क्षमता हर महीने 50,000 वेफ़र तक।

चिप बनाना सबसे कठिन चिप से नहीं सीखा जाता। एक काम की चिप भरोसे से बनाकर, फिर ऊपर चढ़कर सीखा जाता है।

एक नज़र में

• कारख़ाना: धोलेरा में टाटा–पीएसएमसी फ़ैब; करीब 91,000 करोड़ रुपये
• पहली चिप: 28नैनोमीटर, 2026 के आख़िर तक का लक्ष्य
• क्षमता: हर महीने 50,000 वेफ़र तक
• इस्तेमाल: ईवी, टेलीकॉम, वाहन और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए चिप

सिलिकॉन का एक टुकड़ा इतना अहम क्यों? क्योंकि चिप आधुनिक अर्थव्यवस्था का दाना है, और भारत अब तक इसे लगभग पूरा आयात करता रहा है — यह निर्भरता तब तकलीफ़देह ढंग से उजागर हुई थी जब कुछ साल पहले एक वैश्विक किल्लत ने देश की अपनी कार और इलेक्ट्रॉनिक्स लाइनें ठप कर दी थीं। आम चिप भी घर में बनाना उस आपूर्ति-शृंखला को छोटा करता है, ऊंची क़ीमत वाली मैन्युफ़ैक्चरिंग और उससे जुड़े कुशल रोज़गार को यहीं टिकाता है, और भारतीय उपकरण-निर्माताओं को वह पुर्ज़ा देश में ही देता है जो अभी वे मंगाते हैं।

ईमानदार बात यह भी है कि चिप-कारख़ाने बेहद बारीक होते हैं, और शुरुआती ‘यील्ड’ — हर वेफ़र पर अच्छी चिप का अनुपात — व्यावसायिक स्तर तक पहुंचने में वक़्त लेती है। सकारात्मक बात यह है कि भारत इसे सही क्रम में कर रहा है: एक भरोसेमंद तकनीक और विश्वस्तरीय साझेदार से शुरुआत, और साथ-साथ असेंबली, हुनर और कच्चे माल का आधार खड़ा करना। आगे का रास्ता है अमल का अनुशासन — पहली चिप का लक्ष्य पूरा करना, यील्ड बढ़ाना, और तंत्र को चौड़ा करना — ताकि ‘डिज़ाइन इन इंडिया’ के साथ ‘मेड इन इंडिया’ भी एक-एक वेफ़र करके जुड़ता जाए।

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