ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।अरुणाचल की दो घाटियों में एक ही रात दो हादसे हुए। तलाश में जुटी टीमों की गिनती बताती है कि पहाड़ में बचाव किस तरह किया जाता है।
शुक्रवार देर शाम भारी बारिश के बाद दिबांग घाटी के पासु पानी सेना कैंप में फ्लैश फ्लड आया और 5 ग्रेनेडियर्स के दो शेल्टर बहा ले गया। सात जवान पानी में बह गए, जिनमें दो को बचा लिया गया और पाँच की तलाश जारी है। इसी रात ऊपरी सुबनसिरी ज़िले में केओजारिंग-ब्याचिंग सड़क निर्माण साइट पर बड़ा भूस्खलन हुआ, जिसमें मलबे में दबकर चार मज़दूरों की मौत हो गई।
तलाश में जो-जो जुटा है, उसकी सूची अपने आप में पहाड़ की भूगोल बता देती है। 5 ग्रेनेडियर्स की दो सर्च एंड रेस्क्यू टीमें, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की 58वीं बटालियन, सीमा सड़क बनाने वाले जीआरईएफ की 62 आरसीसी, अरुणाचल पुलिस और स्थानीय स्वयंसेवक — पाँच अलग-अलग तरह के दस्ते एक ही तलाश में। मैदान में एक एजेंसी काफ़ी होती है। दिबांग जैसी घाटी में सड़क खोलने वाला अलग होता है, नदी में उतरने वाला अलग, और रास्ता जानने वाला कोई तीसरा — इसीलिए यहाँ बचाव कभी अकेले नहीं होता।
पाँच दस्ते, एक तलाश: सेना की दो टीमों के साथ आईटीबीपी की 58वीं बटालियन, जीआरईएफ की 62 आरसीसी, राज्य पुलिस और स्थानीय स्वयंसेवक दिबांग घाटी में जुटे हैं।
मैदान में एक एजेंसी काफ़ी होती है। दिबांग घाटी में रास्ता खोलने वाला और नदी में उतरने वाला एक आदमी नहीं होता।
एक नज़र में
• कब: शुक्रवार देर शाम, भारी बारिश के बाद
• कहाँ: पासु पानी सेना कैंप, दिबांग घाटी
• यूनिट: 5 ग्रेनेडियर्स के दो शेल्टर बहे
• बहे: सात जवान · बचाए गए: दो · लापता: पाँच
• दूसरा हादसा: ऊपरी सुबनसिरी, केओजारिंग-ब्याचिंग सड़क साइट
• भूस्खलन में मौत: चार मज़दूर
• तलाश में: 5 ग्रेनेडियर्स की दो एसएआर टीमें
• साथ में: आईटीबीपी की 58वीं बटालियन, जीआरईएफ की 62 आरसीसी
• और: अरुणाचल पुलिस और स्थानीय स्वयंसेवक
• बड़ा सबक़: निर्माण साइट पर मानसून का मौसमी प्रोटोकॉल
दोनों हादसों में एक बात मिलती-जुलती है, और वही आगे के लिए काम की है। दोनों जगह लोग अस्थायी ठिकानों पर थे — एक जगह शेल्टर, दूसरी जगह सड़क निर्माण की साइट। पहाड़ी नदी का फ्लैश फ्लड ऊपर हुई बारिश से आता है, नीचे हुई बारिश से नहीं, और नीचे बैठे आदमी को अक्सर आसमान साफ़ दिखता है। इसीलिए सीमावर्ती इलाक़ों में जो चेतावनी काम करती है वह मौसम का पूर्वानुमान नहीं, ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में लगे जलस्तर मापक हैं — जो घंटे भर पहले बता देते हैं कि पानी आ रहा है।
आगे का रास्ता तीन साफ़ क़दमों का है, और तीनों पहले से मौजूद तकनीक पर टिके हैं। पहला — ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में जलस्तर और बारिश मापने वाले सेंसर, जिनका अलर्ट सीधे नीचे के कैंप और निर्माण साइट तक पहुँचे। दूसरा — मानसून के महीनों में अस्थायी शेल्टर और मज़दूरों के ठिकाने नदी के तल से एक तय ऊँचाई पर ही लगाए जाएँ, और इसे साइट की मंज़ूरी की शर्त बनाया जाए। तीसरा — सड़क निर्माण की साइटों पर भूस्खलन का जोखिम हर बरसात से पहले फिर से आँका जाए, क्योंकि कटाई के बाद ढलान की स्थिति बदल जाती है। दिबांग में जुटे पाँच दस्ते बताते हैं कि भारत की राहत मशीनरी तेज़ है। अगला सुधार तेज़ी में नहीं, चेतावनी के उस एक घंटे में है।













