ब्लिट्ज ब्यूरो
‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ देख कर लग रहा है कि ‘नशामुक्त भारत’ अब केवल एक सरकारी नारा नहीं, बल्कि देश के युवाओं के अस्तित्व और राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा का अनिवार्य महा-मिशन बनता जा रहा है।
भारत ने नार्को-आतंकवाद और संगठित अपराध के खिलाफ अपनी जंग में एक बेहद निर्णायक और आक्रामक अध्याय की शुरुआत की है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के नेतृत्व में असम, मणिपुर और मिजोरम में चलाया गया ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ केवल एक पुलिसिया छापा नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को खोखला करने वाले अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट के खिलाफ एक ‘सर्जिकल और वित्तीय स्ट्राइक’ है। 23 अक्टूबर 2026 को हुए इस बहु-एजेंसी ऑपरेशन ने यह साबित कर दिया है कि जब केंद्रीय एजेंसियां और राज्य पुलिस बल एक साझा रणनीति और तकनीक-संचालित इंटेलिजेंस के साथ मैदान में उतरते हैं तो भौगोलिक और प्रशासनिक चुनौतियां कोई मायने नहीं रखतीं।
इस ऑपरेशन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू म्यांमार, भारत और बांग्लादेश के बीच फैले ‘डेथ ट्रायंगल कॉरिडोर’ के वित्तीय साम्राज्य को ध्वस्त करना है। दशकों से भारत में ड्रग्स के खिलाफ कार्रवाइयों को केवल ‘ग्राम और किलोग्राम’ की जब्ती से मापा जाता रहा है लेकिन ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ ने अपनी रणनीति बदली है। 100 करोड़ रुपये के हवाला ट्रेल को बेनकाब करना, 1,424 बैंक खातों को फ्रीज करना और 17.82 करोड़ रुपये की संपत्तियों को कुर्क करना यह दर्शाता है कि एजेंसियां अब इस अवैध व्यापार के मुख्य स्रोत- यानी पैसे के प्रवाह पर वार कर रही हैं। जब तक ड्रग्स माफियाओं की आर्थिक रीढ़ नहीं टूटेगी तब तक उनके नेटवर्क को दोबारा जीवित होने से रोकना असंभव है।
पूर्वोत्तर के राज्य- असम, मिजोरम और मणिपुर भौगोलिक रूप से कुख्यात ‘गोल्डन ट्रायंगल’ (म्यांमार, लाओस, थाईलैंड) के मुहाने पर स्थित हैं। हाल के वर्षों में मणिपुर की आंतरिक अस्थिरता और म्यांमार के राजनीतिक संकट का फायदा उठाकर नार्को-तस्करों ने भारत की सीमाओं को असुरक्षित बनाने की भरपूर कोशिश की। मिजोरम का जोखावथर और मणिपुर का चुराचांदपुर इन प्रतिबंधित दवाओं के प्रमुख ट्रांजिट पॉइंट बन चुके थे जहां से यह जहर देश के दिल यानी दिल्ली, त्रिपुरा और विशेष रूप से पंजाब की रगों में घोला जा रहा था। पंजाब में युवाओं को बर्बाद करने वाली सिंथेटिक ड्रग्स का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी पूर्वोत्तर कॉरिडोर से होकर आ रहा था। इस लिहाज से, पूर्वोत्तर में नार्को-हवाला कार्टेल को तोड़ना पंजाब के नशामुक्त भविष्य के लिए भी संजीवनी साबित होगा।
ऑपरेशन के दौरान 500 डेटोनेटरों की बरामदगी ने सुरक्षा तंत्र के कान खड़े कर दिए हैं। यह साफ करता है कि ड्रग्स का यह कारोबार केवल सामाजिक बुराई या लत का मामला नहीं है बल्कि यह सीधे तौर पर देश के खिलाफ नार्को-आतंकवाद का एक हथियार है जिसका इस्तेमाल देश की आंतरिक सुरक्षा और डेमोग्राफी को तबाह करने के लिए किया जा रहा है। नशीले पदार्थों के पैसे का इस्तेमाल देश विरोधी गतिविधियों और हथियारों की खरीद में किया जा रहा था।
सरकार ने 31 दिसंबर 2029 तक देश से नशे के हर एक नेटवर्क को उखाड़ फेंकने का जो ‘हिमालयी संकल्प’ लिया है, ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ उस ताबूत की पहली बड़ी कील है। हालांकि, यह जीत अभी शुरुआत है। ड्रग्स माफिया बेहद लचीले होते हैं; एक रास्ता बंद होने पर वे तकनीक, डार्क वेब और क्रिप्टोकरेंसी के जरिए नए रास्ते तलाश लेते हैं। इसलिए, भारत को अपनी कानूनी व्यवस्था, डिजिटल फॉरेंसिक क्षमताओं और तटीय व स्थलीय सीमाओं पर गश्त को निरंतर और अपग्रेड करना होगा। ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ देख कर लग रहा है कि ‘नशामुक्त भारत’ अब केवल एक सरकारी नारा नहीं, बल्कि देश के युवाओं के अस्तित्व और राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा का अनिवार्य महा-मिशन बनता जा रहा है।














