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लोकतंत्र, विरोध का अधिकार और जंतर-मंतर

by ब्लिट्ज़ इंडिया
October 19, 2026
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जंतर-मंतर पर प्रदर्शन बंद, दिल्ली पुलिस के नए नियम

विपक्षी दलों को यह समझना होगा कि विरोध का मतलब अराजकता नहीं है; और सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि लोकतंत्र में इतना अवसर बना रहे कि लोग मर्यादा में रह कर विरोध प्रदर्शन कर सकें

करीब साढ़े तीन दशक से देश में आंदोलनों, राजनीतिक विरोधों और जन-रोष के प्रदर्शन का केंद्र रहा दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर अब आधिकारिक प्रदर्शन स्थल नहीं रहा है। दिल्ली पुलिस कमिश्नर द्वारा जारी स्थायी आदेश के तहत केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय के पैनल की सिफारिश पर इसे प्रदर्शन स्थलों की सूची से ‘डीनोटिफाई’ कर दिया गया है। इसकी जगह अब तीन नए स्थानों— रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली स्थित सीबीडी ग्राउंड को प्रदर्शन के लिए निर्धारित किया गया है।

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यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और अन्य मुद्दों को लेकर कांग्रेस सहित विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) जैसे संगठनों द्वारा मध्य दिल्ली में लगातार जबरन प्रदर्शन और भारी भीड़ जुटाई जा रही थी। इस कशिश के बीच सवाल यह उठता है कि क्या लोकतंत्र में विरोध के नाम पर आम जनजीवन, यातायात और सुरक्षा को दांव पर लगाने की छूट दी जा सकती है, या फिर यह पाबंदी नागरिकों की आवाज दबाने का एक प्रयास है?

जंतर-मंतर की सबसे बड़ी खूबी संसद और सत्ता के गलियारों से इसकी महज 2 किलोमीटर की नजदीकी थी। यहां किया गया छोटा या बड़ा प्रदर्शन सीधे सत्ता के कानों तक गूंजता था। इसके विपरीत, नए घोषित स्थल—रामलीला मैदान (लगभग 6 किमी), सीबीडी ग्राउंड (लगभग 14 किमी) और बुराड़ी ग्राउंड (लगभग 23 किमी) संसद और सत्ता के केंद्रों से काफी दूर हैं।

आलोचकों और विपक्षी दलों का तर्क है कि विरोध जितनी दूर जाता है, उसकी आवाज उतनी ही धीमी हो जाती है। कांग्रेस और अन्य दलों का यह भी कहना है कि यह कदम विपक्ष की आवाज को कुचलने और लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश लगाने की एक सोची-समझी रणनीति है। दूसरी ओर सरकार और प्रशासन का पक्ष यह है कि मध्य दिल्ली में बार-बार होने वाले आयोजनों से एम्बुलेंस, दफ्तर आने-जाने वाले आम नागरिकों और सुरक्षा व्यवस्था पर जो गंभीर संकट खड़ा होता था, उससे राहत पाना जरूरी था। प्रदर्शनों के कारण देश की सर्वोच्च अदालत भी कई बार यह कह चुकी है कि क्या स्थल को बदलने पर विचार नहीं किया जा सकता। उल्लेखनीय है कि कई वर्ष पूर्व दिल्ली का बोट क्लब और जंतर-मंतर प्रदर्शन के स्थल हुआ करते थे जिसमें से बोट क्लब पर बाद में पाबंदी लगा दी गई।

लोकतंत्र में असहमति और विरोध प्रदर्शन मौलिक अधिकार हैं लेकिन क्या यह अधिकार असीमित हैं? जब सीजेपी या कांग्रेस जैसे राजनीतिक दल शक्ति प्रदर्शन की शैली में सड़कों को जाम करते हैं, मेट्रो स्टेशनों को प्रभावित करते हैं और बार-बार कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाते हैं, तो वह ‘लोकतांत्रिक विरोध’ से आगे बढ़कर ‘अराजकता’ की श्रेणी में आ जाता है।

विरोध का औचित्य उसकी नीयत और तौर-तरीकों पर निर्भर करता है। यदि कोई संगठन लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बनाने के लिए जबरन घेराव, हिंसक झड़पों या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की राह पकड़ता है तो वह आम जनता के अधिकारों का हनन करता है।

यदि नए नियमों और पाबंदियों के बावजूद राजनीतिक दल या प्रदर्शनकारी मध्य दिल्ली या जंतर-मंतर पर जुटने की जिद करते हैं, तो प्रशासन के सामने सख्त कानूनी कार्रवाई के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। पुलिस बैरिकेडिंग, बीएनएस की धारा 163 का कड़ाई से पालन, मेट्रो स्टेशनों को बंद करना और बल प्रयोग जैसी स्थितियां पैदा होंगी। टकराव बढ़ने से राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासन के साथ आमने-सामने की जंग का माहौल बन सकता है जिससे अंततः नुकसान देश की छवि और आम जनता का ही होगा और हजारों करोड़ रुपये के व्यापार का भी नुकसान होगा जिससे लाखों का पेट भी पलता है।

इसमें कोई दोराय नहीं कि अब मध्य दिल्ली में बार-बार लगने वाले भयंकर जाम, मेट्रो रूट बाधित होने और इंटरनेट सेवाओं पर पड़ने वाले असर से आम जनता को बड़ी राहत मिलेगी। प्रदर्शनकारियों को अब बड़े आयोजनों के लिए सुनियोजित और दूरदराज के मैदानों का रुख करना होगा जिससे छोटे व प्रतीकात्मक विरोधों का असर कमजोर हो सकता है। अब यह मामला अदालतों तक भी पहुंच सकता है जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सार्वजनिक व्यवस्था के बीच कानूनी संतुलन की फिर से समीक्षा होगी। लोकतंत्र की खूबी यही है कि सत्ता चलाने वाले जहां विरोध के स्वर का मान रखें वहीं विपक्ष का भी यह कर्तव्य है कि विरोध-प्रदर्शन किसी भी स्तर पर अराजक या राष्ट्र विरोधी न हो जाए; जैसा कि पिछले कुछ प्रदर्शनों के दौरान देखने को मिल रहा है। विपक्ष को यह समझना होगा कि विरोध का मतलब अराजकता नहीं और सरकार को यह देखना होगा कि लोकतंत्र में लोगों के पास मर्यादा में रहते हुए विरोध प्रदर्शन का अवसर भी बना रहे।

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