आस्था भट्टाचार्य
नई दिल्ली। नागपुर स्थित ‘सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड’ (एसडीएएल) ने भारतीय सेना को 450 ‘नागास्त्र-1आर’ लोइटरिंग म्यूनिशन सौंप दिए हैं।
यह किसी घरेलू निर्माता द्वारा सशस्त्र बलों को दी गई, इस तरह के मानवरहित सिस्टम की अब तक की सबसे बड़ी एकल खेप है। भारतीय सेना ने जून 2025 में ‘आपातकालीन खरीद’ प्रक्रिया के तहत इन सिस्टम का ऑर्डर दिया था।
अनुबंध मिलने से पहले, मार्च 2025 में महाराष्ट्र के मखलोह स्थित ‘स्पेशल फोर्सेज ट्रेनिंग स्कूल’ में ‘नागास्त्र-1आर’ का कड़ा तकनीकी परीक्षण किया गया था। मूल्यांकन प्रक्रिया में चार अलग-अलग कंपनियों ने हिस्सा लिया था, लेकिन एसडीएएल एकमात्र ऐसी निर्माता कंपनी थी जो सेना के सभी कड़े परिचालन मानकों को पूरा करने में सक्षम रही।
क्षमताएं और विशेषताएं
‘नागास्त्र-1आर’ एक ऐसा ‘कामिकेज’ ड्रोन है जिसे सैनिक आसानी से अपने साथ ले जा सकते हैं। इसे विशेष रूप से कम दूरी के अभियानों में सटीक हमले करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
इसकी खासियतें
यह पूरी तरह से स्वदेशी है; इसके 80% से अधिक पुर्जे स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए हैं। इस वजह से, यह विदेशों से आयात किए जाने वाले महंगे सिस्टम की तुलना में काफी किफायती विकल्प है।
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस सिस्टम का वजन लगभग 9 किलोग्राम है। इसमें शांत इलेक्टि्रक मोटर लगी हैं, जिससे दुश्मन के लिए इसकी आवाज सुनकर इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है।
इसमें 1 से 1.5 किलोग्राम का ‘हाई-एक्सप्लोसिव फ्रैगमेंटेशन वॉरहेड’ लगा होता है, जो दुश्मन के सैनिकों, बिना कवच वाले वाहनों और लॉन्च पैड को निशाना बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
यह ड्रोन एक बार में 60 मिनट तक लगातार उड़ान भर सकता है।
इसे एक ऑपरेटर द्वारा 15 किलोमीटर की दूरी तक मैन्युअल रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा, यह जीपीएस और भारत के ‘नाविक’ (नेवआईसी) सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम का उपयोग करके खुद से (स्वायत्त रूप से) उड़ सकता है और 40 किलोमीटर दूर तक के लक्ष्यों पर हमला कर सकता है।
इसका गाइडेंस सिस्टम बेहद सटीक है, जो दो मीटर के दायरे के भीतर सटीक हमला करने में सक्षम है।
मिशन को बीच में रोकना और रिकवरी
‘नागास्त्र-1आर’ की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि उड़ान के दौरान भी इसके मिशन को बीच में ही रोका जा सकता है। लोइटरिंग म्यूनिशन किसी तय युद्धक्षेत्र के ऊपर चक्क र लगाते रहते हैं। इनमें लगे डे-कैमरे और थर्मल कैमरों की मदद से ऑपरेटर पूरे इलाके पर नज़र रख सकते हैं और फिर हमला करने का फैसला ले सकते हैं। हालांकि, अगर कोई लक्ष्य अपनी जगह से हट जाए या हालात बदल जाएं (जैसे कि अचानक आम नागरिकों का वहां आ जाना), तो ऑपरेटर हमले को बीच में ही रद कर सकता है।
इसके बाद, इसमें लगे पैराशूट सिस्टम की मदद से ड्रोन को सुरक्षित वापस बुलाया जा सकता है और दोबारा हासिल किया जा सकता है, ताकि भविष्य के मिशनों में इसका फिर से इस्तेमाल हो सके।
भविष्य का रक्षा सिस्टम
‘नागास्त्र-1आर’ की सफल डिलीवरी भारत के निजी रक्षा क्षेत्र की बढ़ती क्षमताओं को दर्शाती है।
भविष्य की ओर देखते हुए एसडीएएल के चेयरमैन सत्यनारायण नुवाल ने हाल ही में कंपनी के आने वाले प्रोजेक्ट्स के बारे में जानकारी दी, जिसमें स्वदेशी ‘भार्गवास्त्र’ काउंटर-ड्रोन सिस्टम भी शामिल है।
‘इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम’
इस नई तकनीक में एक ऐसा रडार है जो 10 किलोमीटर दूर तक के हवाई खतरों का पता लगा सकता है। इसके साथ 6 किलोमीटर की रेंज वाला ‘इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम’ भी लगा है—जो सेना की मौजूदा बुनियादी ज़रूरतों से कहीं बेहतर है।
सुदर्शन चक्र
एसडीएएल को उम्मीद है कि इन तकनीकी तरक्कि यों से साल 2030 तक महत्वाकांक्षी ‘सुदर्शन चक्र’ एयर डिफेंस सिस्टम की नींव तैयार हो जाएगी।














