आयुर्वेद का इलाज अब बीमा में भी
नई दिल्ली, 22 सितंबर।आयुर्वेद से इलाज कराने वाले आदमी के सामने अब तक सबसे बड़ा सवाल यही रहता था — बिल कौन भरेगा।
उस सवाल का जवाब 10 फरवरी 2026 को मिल गया। उस दिन दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान ने जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के साथ समझौता किया और देश की सभी 32 सामान्य बीमा कंपनियों की सूची में जुड़ गया।
आयुष मंत्रालय की 22 सितंबर की विज्ञप्ति के मुताबिक किसी भी आयुष संस्थान का बिना पैसे दिए इलाज के लिए इतना बड़ा समझौता पहली बार हुआ है। मरीजों की मदद के लिए एक हेल्पलाइन भी चलती है —
1800-11-0008, वह कोड जिसने रास्ता खोला
यह सब एक तकनीकी बात से मुमकिन हुआ, जिसकी चर्चा कम होती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी रोग सूची आईसीडी-11 में आयुर्वेद की शब्दावली शामिल कर ली है। इससे दुनिया में कहीं भी डॉक्टर आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी की बीमारी को एक तय कोड में लिख सकता है।
बीमा कंपनी के लिए इसका मतलब साफ है। जो बीमारी कोड में लिखी जा सकती है, उसका दावा निपटाया जा सकता है। इससे पहले 2024 में ही बीमा नियामक आईआरडीएआई ने हर कंपनी के लिए आयुर्वेद समेत हर पद्धति को कवर करने वाला उत्पाद देना जरूरी कर दिया था।
इलाज कहां-कहां मिल रहा है
19 सितंबर 2026 तक देश में 12 हजार 260 आयुष आयुष्मान आरोग्य मंदिर काम कर रहे थे। राष्ट्रीय आयुष मिशन का लक्ष्य 12 हजार 500 का है, यानी 98 फीसदी काम हो चुका है और 240 केंद्र बाकी हैं।
इसके अलावा 13 हजार 249 सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में आम इलाज के साथ-साथ आयुष की सेवा भी मिलती है। 30 दिसंबर 2025 तक इनमें 6 हजार 302 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 3 हजार 191 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 475 जिला अस्पताल और 3 हजार 281 दूसरे केंद्र शामिल थे।
सरकार 25 हजार 322 आयुष डॉक्टरों और 5 हजार 666 सहायक कर्मियों का वेतन देती है। दिल्ली के सफदरजंग और लेडी हार्डिंग में एकीकृत चिकित्सा विभाग चल रहे हैं, जिनमें पंचकर्म की पूरी इकाई है।
ई-संजीवनी पर मुफ्त ऑनलाइन परामर्श भी मिलता है। इस सेवा का फायदा 50 करोड़ से ज्यादा मरीज उठा चुके हैं, और इसमें आयुष की ओपीडी भी है।
जहां काम बाकी है
पैसा लगा है। वित्त वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच राष्ट्रीय आयुष मिशन से राज्यों को 6 हजार 406.99 करोड़ रुपये से ज्यादा दिए गए। बारह साल में यह औसतन करीब 534 करोड़ रुपये हर साल बैठता है। 2026-27 के बजट में आयुष मंत्रालय को 4 हजार 408 करोड़ रुपये मिले हैं।
पर शोध का हिसाब पतला है, और यह बात सीधे कह देनी चाहिए।
आयुर्ज्ञान योजना के 17.79 करोड़ रुपये में से आयुर्वेद को 9.38 करोड़ मिले — यानी 52.7 फीसदी। इससे 2014-15 से 2025-26 के बीच 33 शोध पत्र छपे।
देश में 593 आयुर्वेद कॉलेज हैं और स्नातक की 45 हजार 245 सीटें। इनके मुकाबले बारह साल में 33 शोध पत्र कम हैं। वजह सीटों में ही दिख जाती है — स्नातकोत्तर की सीटें 5 हजार 673 हैं, यानी स्नातक का सिर्फ 12.5 फीसदी। जो व्यवस्था आठ डॉक्टर बनाने पर एक शोधकर्ता बनाती है, वह इलाज तेजी से बढ़ाएगी और सबूत धीरे।
यह शिकायत नहीं है। इलाज का जाल पहले बना, सबूत का जाल अब बन रहा है।

एक नजर में
•आयुष आरोग्य मंदिर चालू : 12,260, लक्ष्य 12,500 (19 सितंबर 2026 तक)
•आम इलाज के साथ आयुष देने वाले सरकारी केंद्र : 13,249
•सरकार के वेतन पर : 25,322 आयुष डॉक्टर, 5,666 सहायक कर्मी
•राष्ट्रीय आयुष मिशन से राज्यों को : 6,406.99 करोड़ रुपये से ज्यादा
•शिक्षा : 593 आयुर्वेद कॉलेज, स्नातक 45,245 सीटें, स्नातकोत्तर 5,673 सीटें
बजट 2026-27, •आयुष मंत्रालय : 4,408 करोड़ रुपये
तुलना
•चालू केंद्र : 12,260 — लक्ष्य का 98.1%
•राष्ट्रीय आयुष मिशन का लक्ष्य : 12,500 — पूरा आंकड़ा
•बाकी : 240 केंद्र
•स्नातक सीटें 45,245, •स्नातकोत्तर 5,673 — •स्नातक का 12.5%।
हमारा हिसाब
12,260 ÷ 12,500 = 98.1%, बाकी 240। 6,406.99 करोड़ ÷ 12 साल = करीब 534 करोड़ रुपये सालाना। 5,673 ÷ 45,245 = 12.5%। 9.38 ÷ 17.79 = 52.7%। चारों में से एक भी विज्ञप्ति में नहीं है।
भारत को क्या मिला
आयुर्वेद की बीमारी अब विश्व स्वास्थ्य संगठन के कोड में लिखी जाती है — इसी से बीमा का दावा बनता है, और इसी से शोध की
तुलना
।
ब्लिट्ज की सराहना
अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान और जनरल इंश्योरेंस काउंसिल, जिन्होंने किसी आयुष संस्थान का पहला ऐसा समझौता किया जिसमें सभी 32 कंपनियां शामिल हैं।
आंकड़े आयुष मंत्रालय की 22 सितंबर 2026 की विज्ञप्ति (रिलीज आईडी 2313300) से; pib.gov.in पर जांचे।
ब्लिट्ज़ की सलाह
बीमा शुरू होने से दावों का ऐसा आंकड़ा बनेगा जो आयुर्वेद के पास कभी नहीं रहा। हर साल बीमारीवार दावों की संख्या और नतीजे छापे जाएं तो सबूत का जाल 17.79 करोड़ की पूरी शोध राशि से भी तेजी से बनेगा।
झारखंड की खदान से 40 बच्चे आईआईटी तक
रांची, 22 सितंबर। खदान के पास बसे गांव को सबसे पहले जो बात महसूस होती है, वह उत्पादन का आंकड़ा नहीं होता। वह धमाका होता है।
2014 से पहले सेंट्रल कोलफील्ड्स में बिना बारूद वाली खुदाई से एक टन कोयला भी नहीं निकलता था। आज करीब 70 फीसदी कोयला उसी तरीके से निकलता है — सरफेस माइनर और कंटीन्यूअस माइनर से, बारूद से नहीं।
कोयला मंत्रालय की 22 सितंबर 2026 की विज्ञप्ति में यह बात उत्पादन के आंकड़ों के काफी नीचे दर्ज है।
कोयला कितना बढ़ा
कोल इंडिया की इस सहायक कंपनी ने वित्त वर्ष 2013-14 में 5 करोड़ टन कोयला निकाला था। वित्त वर्ष 2024-25 में यह 8 करोड़ 75 लाख टन हो गया। यह कंपनी के इतिहास में सबसे ज्यादा है, और ठीक 75 फीसदी की बढ़त।
इस दौरान चार बड़ी खदानें बनीं। अमरापाली सालाना 3 करोड़ 50 लाख टन की, मगध 5 करोड़ 10 लाख टन। चंद्रगुप्त 1 करोड़ 50 लाख टन और कोट्रे बसंतपुर पचमो 50 लाख टन। कारो, कोनार और उत्तरी उरीमारी की पुरानी खदानें भी बढ़ाई गईं।
इन चार नई खदानों की कुल क्षमता 10 करोड़ 60 लाख टन सालाना है, जबकि पिछले साल कंपनी ने 8 करोड़ 75 लाख टन निकाला। यानी क्षमता उत्पादन से 21 फीसदी आगे बनाई गई है, पीछे नहीं।
कोयला बाहर कैसे जाएगा
निकालने से मुश्किल काम पहुंचाना है। तोरी-शिवपुर रेल गलियारा तीन लेन का है और सालाना करीब 10 करोड़ टन कोयला ढो सकता है।
उत्तरी उरीमारी का कोयला प्रबंधन संयंत्र सालाना 75 लाख टन का चालू हो चुका है। कोनार, केडीएच-पूर्णाडीह, अमरापाली, कारो और मगध के संयंत्र बन रहे हैं, जिनकी कुल क्षमता 9 करोड़ 55 लाख टन सालाना होगी।
भारत का इस्पात उद्योग कोकिंग कोयले के लिए विदेश पर टिका है। कंपनी सालाना 1 करोड़ 45 लाख टन क्षमता की पांच नई कोकिंग कोयला वाशरी बना रही है, ताकि आयात घटे और विदेशी मुद्रा बचे।
गांव तक क्या पहुंचा
कंपनी का मुनाफा वित्त वर्ष 2017-18 में 808 करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2024-25 में यह 4 हजार 35 करोड़ रुपये हो गया — लगभग पांच गुना। नेट वर्थ 3 हजार 816 करोड़ से बढ़कर 16 हजार 464 करोड़ रुपये हुई।
वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने सीएसआर पर करीब 86 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि लक्ष्य करीब 74 करोड़ का था — यानी लक्ष्य का 116 फीसदी।
इसी पैसे से दो काम चलते हैं जो सबसे ज्यादा दिखते हैं। सीसीएल के लाल और सीसीएल की लाडली में हर साल 40 बच्चे चुने जाते हैं — 20 लड़के और 20 लड़कियां। उन्हें मुफ्त आवासीय पढ़ाई और इंजीनियरिंग की तैयारी कराई जाती है। खदान वाले इलाकों और गांवों के ये बच्चे आईआईटी और एनआईटी तक पहुंचे हैं।
रांची के खेलगांव में झारखंड सरकार के साथ मिलकर चलने वाली खेल अकादमी 34वें राष्ट्रीय खेलों के लिए बने ढांचे पर खड़ी है। इसके खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पदक ला रहे हैं, और इस काम को दो बार राष्ट्रीय सीएसआर पुरस्कार मिल चुका है।
सौर ऊर्जा की क्षमता 32 मेगावाट से ऊपर है। गिरिडीह जिले में बैटरी भंडारण के साथ 100 मेगावाट की परियोजना बन रही है — अकेले वह अब तक लगी पूरी क्षमता से तीन गुना से ज्यादा है।
एक नजर में
•उत्पादन : 50.0 मिलियन टन •(2013-14) से 87.5 मिलियन टन (2024-25)
•नई बड़ी खदानें : अमरापाली 35, मगध 51, चंद्रगुप्त 15, कोट्रे बसंतपुर पचमो 5 (मिलियन टन सालाना)
तोरी-शिवपुर रेल गलियारा : तीन लेन, करीब 100 मिलियन टन सालाना
कोकिंग कोयला वाशरी : 5 बन रही हैं, कुल 14.50 मिलियन टन सालाना
•सौर : 32 मेगावाट से ज्यादा लगी; गिरिडीह में 100 मेगावाट बन रही
सीएसआर 2025-26 : करीब 86 करोड़ रुपये, लक्ष्य करीब 74 करोड़
तुलना
•मुनाफा 2017-18 : 808 करोड़ रुपये — •शुरुआत
मुनाफा 2024-25 : 4,035 करोड़ रुपये — •4.99 गुना
•नेट वर्थ : 3,816 करोड़ से 16,464 करोड़ रुपये — 4.31 गुना
•उत्पादन : 1.75 गुना
•मुनाफा उत्पादन से 2.85 गुना तेजी से बढ़ा।
हमारा हिसाब
4,035 ÷ 808 = 4.99। 87.5 ÷ 50.0 = 1.75, यानी 75 फीसदी बढ़त। 4.99 ÷ 1.75 = 2.85। हर टन पर मुनाफा = 4,035 करोड़ ÷ 87.5 मिलियन टन = करीब 461 रुपये। सीएसआर 86 करोड़ = लक्ष्य का 116% और मुनाफे का 2.13%। विज्ञप्ति में कच्चे आंकड़े हैं, ये सब यहां निकाले गए।
भारत को क्या मिला
देश में धुला कोकिंग कोयला आयात के मुकाबले, मांग से पहले बनी 10 करोड़ 60 लाख टन की खदान क्षमता, और खदान वाले जिलों के 40 बच्चे हर साल आईआईटी की राह पर।
ब्लिट्ज की सराहना
सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड और कोयला मंत्रालय, जिन्होंने बिना बारूद वाली खुदाई शून्य से करीब 70 फीसदी तक पहुंचाई — यही बदलाव पास के गांव को महसूस होता है।
आंकड़े कोयला मंत्रालय की 22 सितंबर 2026 की विज्ञप्ति (रिलीज आईडी 2313343) से; pib.gov.in पर जांचे।
ब्लिट्ज़ की सलाह
मुनाफा पांच गुना बढ़ा और उत्पादन पौने दो गुना। इसका मतलब है कि ज्यादा काम कीमत और उत्पाद-मिश्रण ने किया। हर टन की लागत का ब्योरा छापा जाए तो पता चलेगा कि इसमें कितना कुशलता का है और कितना बाजार का। यह जवाब हर दूसरी कोयला कंपनी के काम आएगा।
बारह चिप परियोजनाएं, तीन में उत्पादन शुरू
नई दिल्ली, 22 सितंबर। किसी भी सरकारी योजना की असली परख एक सवाल से होती है — सरकार ने जितना रखा, उद्योग ने उससे ज्यादा लगाया या कम?
सेमीकंडक्टर की योजना इस परख पर खरी उतर रही है। इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय के 22 सितंबर 2026 के ब्योरे के मुताबिक छह राज्यों में बारह सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को मंजूरी मिल चुकी है। इनमें 1 लाख 64 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा लगाने का वादा है।
सेमीकॉन 2.0 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जुलाई 2026 में 1 लाख 27 हजार 500 करोड़ रुपये के साथ मंजूरी दी थी। यानी सरकार के हर एक रुपये पर उद्योग ने एक रुपये उनत्तीस पैसे लगाने की बात कही है।
और सबसे अहम बात — बारह में से तीन संयंत्रों में व्यावसायिक उत्पादन शुरू भी हो चुका है। यह मंजूर परियोजनाओं का एक चौथाई है।
घर तक क्या पहुंचेगा
17 से 19 सितंबर 2026 तक दिल्ली के यशोभूमि में सेमीकॉन इंडिया का पांचवां आयोजन हुआ, जिसमें 600 से ज्यादा कंपनियों ने अपना काम दिखाया।
इनमें एक चीज ऐसी है जो सबसे पहले किसी घर तक पहुंचेगी। अहीसा टेक्नोलॉजी ने देश में बना इंटरनेट का उपकरण दिखाया, जो 1 जीबीपीएस तक की रफ्तार देता है। इससे एक ही ऑप्टिकल लाइन टर्मिनल से करीब 64 घरों को इंटरनेट दिया जा सकता है।
खास बात यह है कि यह उपकरण भारत में बने विहान सॉफ्टवेयर पर चलता है और इसमें सी-डैक का 64-बिट आरआईएससी-वी प्रोसेसर लगा है। यानी चिप भारत की, सॉफ्टवेयर भारत का, उपकरण भारत का — और उसके आगे चौंसठ परिवार।
एक लाख इंजीनियर
चिप बनाने से पहले चिप का नक्शा बनाना पड़ता है, और यह आंकड़ा सबसे कम चर्चा में आता है।
500 से ज्यादा संस्थानों के एक लाख से ज्यादा इंजीनियर चिपइन केंद्र से जुड़े हैं। इनमें 400 शैक्षणिक संस्थान हैं और 100 स्टार्टअप, यानी 80 फीसदी हिस्सा कॉलेजों का है।
इन सबने मिलकर 300 से ज्यादा चिप डिजाइन बनाए और डिजाइन के औजारों पर चार करोड़ घंटे से ज्यादा काम किया।
चार करोड़ घंटे को एक लाख इंजीनियरों में बांटिए तो हर इंजीनियर के हिस्से 400 घंटे आते हैं। यानी करीब दस हफ्ते, महंगे पेशेवर सॉफ्टवेयर पर, और इंजीनियर से एक पैसा लिए बिना।
एक नजर में
•मंजूर परियोजनाएं : 12, •छह राज्यों में · उत्पादन शुरू :
•3 में निवेश का वादा : 1.64 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा
•सेमीकॉन 2.0 : 1,27,500 करोड़ रुपये, मंत्रिमंडल की मंजूरी जुलाई 2026
•सेमीकॉन इंडिया 2026 : पांचवां आयोजन, 600 से ज्यादा कंपनियां
•चिपइन : 1 लाख से ज्यादा इंजीनियर, 500 से ज्यादा संस्थान
•नतीजा : 300 से ज्यादा चिप डिजाइन, 4 करोड़ से ज्यादा घंटे
तुलना
उद्योग का वादा : 1.64 लाख करोड़ रुपये — बड़ा हिस्सा
सरकार का परिव्यय : 1,27,500 करोड़ रुपये — उसका 78%
उद्योग का वादा सरकार के परिव्यय से 29% ज्यादा है।
हमारा हिसाब
1.64 लाख करोड़ ÷ 1,27,500 करोड़ = 1.29। 4 करोड़ घंटे ÷ 1 लाख इंजीनियर = 400 घंटे। 3 ÷ 12 = 25% में उत्पादन शुरू। तीनों विज्ञप्ति में नहीं हैं।
भारत को क्या मिला
देश में बनी चिप, देश में लिखा सॉफ्टवेयर, और एक ऐसा उपकरण जो एक साथ 64 घरों तक तेज इंटरनेट पहुंचा सकता है।
ब्लिट्ज की सराहना
सी-डैक, इनकोर सेमीकंडक्टर्स, नेट्रासेमी और अहीसा टेक्नोलॉजी, और चिपइन से जुड़े वे 400 कॉलेज जिनका नाम कहीं नहीं आता।
आंकड़े इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय की 22 सितंबर 2026 की विज्ञप्ति (रिलीज आईडी 2313324) से; pib.gov.in पर जांचे।
ब्लिट्ज़ की सलाह
अभी मंजूरी और वादे का आंकड़ा छपता है। हर साल यह भी छपे कि 300 डिजाइनों में से कितने असल में सिलिकॉन तक पहुंचे, तो देश को पता चलेगा कि यह कतार है या पाइपलाइन।
एशियाई खेलों में एमएमए का पहला पदक
आइची-नागोया, 22 सितंबर 2026 किसी खेल में देश का पहला पदक सिर्फ एक बार आता है। सुचिका तारियाल ने एशियाई खेलों में मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स की महिला ट्रेडिशनल 60 किलो श्रेणी में कांस्य पदक जीता। आकाशवाणी ने यह जीत 21 सितंबर 2026 को दी।
प्रधानमंत्री कार्यालय की 22 सितंबर 2026 की विज्ञप्ति में प्रधानमंत्री ने इसे “भारत के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि” कहा। उन्होंने कहा कि सुचिका तारियाल ने इस खेल में भारत के लिए एशियाई खेलों का पहला पदक जीता है।
युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री मनसुख मांडविया एक दिन पहले यही बात कह चुके थे — कि यह एशियाई खेलों में एमएमए का भारत का पहला पदक है। आकाशवाणी ने 21 सितंबर 2026 को उनका यह संदेश दिया।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 21 सितंबर 2026 को इतिहास रचने पर बधाई दी और कहा कि यह उपलब्धि भारतीय खेल के लिए खास मायने रखती है। यह बात भी आकाशवाणी ने उसी तारीख को दी।
एक कांस्य पदक पर तीन बड़े दफ्तरों का बोलना आम बात नहीं है, और पहले पदक पर यही सही भी है।
एमएमए के पीछे न निशानेबाजी जैसा पुराना ढांचा है, न स्कूल स्तर की कोई व्यवस्था। और अब तक इस स्तर का कोई पदक भी नहीं था जिसकी तरफ इशारा किया जा सके। पहला पदक ही वह चीज है जिसके बाद किसी जिले का कोच पैसा जुटाने की बात कह सकता है।
मांडविया ने पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल टीम स्पर्धा में रजत जीतने पर रुद्रांक्ष बालासाहेब पाटिल, पार्थ राकेश माने और हिमांशु ढिल्लों को भी बधाई दी।
एक नजर में
खिलाड़ी : सुचिका तारियाल
पदक : कांस्य, मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स, महिला ट्रेडिशनल 60 किलो
अहमियत : एशियाई खेलों में एमएमए का भारत का पहला पदक, प्रधानमंत्री और खेल मंत्री, दोनों के कथन के मुताबिक
साथ में बधाई : रुद्रांक्ष बालासाहेब पाटिल, पार्थ राकेश माने, हिमांशु ढिल्लों — रजत, 10 मीटर एयर राइफल टीम
बधाई देने वाले : राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और खेल मंत्री
भारत को क्या मिला
उस खेल में पहला पदक जिसमें इस स्तर पर भारत के पास कभी कुछ नहीं था — और वह दलील जो किसी नए खिलाड़ी के घरवालों को सुननी जरूरी है।
ब्लिट्ज की सराहना
सुचिका तारियाल, और वे प्रशिक्षक जिन्होंने लगभग बिना किसी संस्थागत सहारे के एक खिलाड़ी तैयार की।
आंकड़े प्रधानमंत्री कार्यालय की 22 सितंबर 2026 की विज्ञप्ति (रिलीज आईडी 2313407) और आकाशवाणी की 21 सितंबर 2026 की खबरों से; pib.gov.in और newsonair.gov.in पर जांचे।
अब एक ही पोर्टल से फिल्म की इजाजत
नई दिल्ली, 22 सितंबर। तीन राज्यों में शूटिंग करने वाली फिल्म यूनिट को अब तक तीन जगह से मंजूरी लेनी पड़ती थी और तीन जगह से पुलिस की अनुमति। और पाला ऐसे तीन दफ्तरों से पड़ता था जिनकी आपस में कभी बात ही नहीं होती।
सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने 22 सितंबर को इंडिया सिने हब का ब्योरा रखा, जो इसी मुश्किल का जवाब है।
यह एक डिजिटल सिंगल-विंडो पोर्टल है, जिसे राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम चलाता है। इस पर फिल्म की इजाजत, वीजा और वेंडर तक पहुंच एक ही जगह मिल जाती है। राज्यों की मंजूरी, पुलिस क्लीयरेंस और सह-निर्माण के आवेदन एक ही केंद्रीय व्यवस्था से गुजरते हैं। जिस राज्य में ऑनलाइन व्यवस्था नहीं है, वहां के लिए पोर्टल एक साझा फॉर्म देता है।
कितना बड़ा कारोबार है
फिल्म, टेलीविजन और ऑनलाइन कंटेंट ने वित्त वर्ष 2024 में 13.1 अरब डॉलर कमाए, जो 2019 से 18 फीसदी ज्यादा है। वित्त वर्ष 2029 तक यह 17.5 से 19.7 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।
देश के फिल्म केंद्रों में 1 लाख 60 हजार से ज्यादा लोग काम करते हैं — मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु, तिरुवनंतपुरम और कोच्चि, गुवाहाटी, भुवनेश्वर और दिल्ली में।
अकेले नोएडा फिल्म सिटी में करीब 17 हजार मीडिया पेशेवर काम करते हैं और उससे जुड़े कामों में करीब 1 लाख 50 हजार लोगों को रोजी मिलती है। वहां 16 स्टूडियो हैं और 350 चैनल, जो 162 देशों में प्रसारण करते हैं।
पीछे की बड़ी वजह
यह सब इसलिए मुमकिन हुआ कि देखने वाले बढ़ गए। इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले 2014 में 25.15 करोड़ थे, जो मार्च 2026 के आखिर तक 109.2 करोड़ से ज्यादा हो गए।
और डेटा सस्ता हुआ। 2014 में एक जीबी 308 रुपये का था, 2026 में 7.51 रुपये का — यानी पुरानी कीमत का सिर्फ 2.4 फीसदी। अब हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के 99.9 फीसदी जिलों में 5जी है।
उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, ओडिशा और बिहार निजी कंपनियों के साथ फिल्म सिटी बना रहे हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, केरल और उत्तराखंड 2 करोड़ रुपये तक की सब्सिडी और सरकारी जगहों की फीस में छूट देते हैं। 2030 तक इस क्षेत्र में करीब 2 लाख लोगों को काम मिलने का अनुमान है।
फिल्म से पर्यटन बढ़ता है, यह दर्ज भी है। ब्योरे में दिए ईवाई-फिक्की के अध्ययन के मुताबिक ‘3 इडियट्स’ के बाद लद्दाख जाने वालों की संख्या 2.4 गुना हो गई थी।

एक नजर में
•पोर्टल : इंडिया सिने हब, राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम चलाता है
•क्या-क्या : फिल्म परमिट, वीजा, सह-निर्माण की मंजूरी, •वेंडर सूची
•लाइव इवेंट्स : 9 बड़े स्थल पहले से जुड़े
•क्षेत्र की कमाई : वित्त वर्ष 2024 में 13.1 अरब डॉलर, 2019 से 18% ज्यादा
•अनुमान : वित्त वर्ष 2029 तक 17.5 से 19.7 अरब डॉलर
•फिल्म केंद्रों में काम : 1.6 लाख से ज्यादा लोग
तुलना
•डेटा की कीमत 2014 : 308 रुपये प्रति जीबी — शुरुआत
•डेटा की कीमत 2026 : 7.51 रुपये प्रति जीबी — उसका 2.4%
इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले 2014 : 25.15 करोड़; मार्च 2026 : 109.2 करोड़ से ज्यादा
डेटा 97.6% सस्ता हुआ और इस्तेमाल करने वाले 4.3 गुना बढ़े।
हमारा हिसाब
7.51 ÷ 308 = 2.4%, यानी 97.6% की गिरावट। 109.2 ÷ 25.15 = 4.34 गुना। दोनों ब्योरे में नहीं हैं।
भारत को क्या मिला
विदेशी फिल्म यूनिट अब नौ जगह नहीं, एक जगह अर्जी देगी — और 2030 तक करीब 2 लाख लोगों के काम का अनुमान।
ब्लिट्ज की सराहना
राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम, जिसने भारतीय सिनेमा का सबसे बेरौनक काम उठाया — कागजी कार्रवाई।
आंकड़े सूचना और प्रसारण मंत्रालय के 22 सितंबर 2026 के ब्योरे (रिलीज आईडी 2313376) से; pib.gov.in पर जांचे।
ब्लिट्ज़ की सलाह
पोर्टल का अपना डैशबोर्ड आवेदन और मंजूरी पहले से गिनता है। अगर राज्यवार यह छापा जाए कि मंजूरी में औसतन कितने दिन लगे, तो किसी भी प्रचार से ज्यादा फायदा होगा — और धीमे राज्यों को अपनी जगह खुद दिख जाएगी।













