ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।हरित भारत मिशन की बुनियाद में एक बात लिखी थी- यह काम अकेले कोई विभाग नहीं करेगा। पैसा और मेहनत कैम्पा से, मनरेगा से, राज्यों के वनरोपण कार्यक्रमों से आएगी, और मिशन का अपना बजट उसमें जुड़ेगा। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक ने अब दस साल की उसी व्यवस्था की जांच की है, और रिपोर्ट 12 अगस्त 2026 को संसद में रखी गई।
निष्पादन लेखापरीक्षा रिपोर्ट संख्या 4, वर्ष 2026, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से संबंधित है और उन 16 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में 2015-16 से 2024-25 तक की योजना, क्रियान्वयन और निगरानी की जांच करती है जिनके लक्ष्य मंत्रालय ने मंज़ूर किए थे।
पैसे का हिसाब, लेखापरीक्षक के शब्दों में
आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने बारहवीं योजना से पहले चार वर्षों के लिए 2,000 करोड़ रुपये का परिव्यय मंज़ूर किया था, साथ ही राज्यों के हिस्से के लिए तेरहवें वित्त आयोग के अनुदान से 400 करोड़ रुपये। लेखापरीक्षा बताती है कि क्रियान्वयन के दस वर्षों में बजटीय सहायता से 1,149.14 करोड़ रुपये मिले- 47.88 फ़ीसदी। ब्लिट्ज ने यह प्रतिशत दोनों आंकड़ों से दोबारा जोड़कर देखा है और यह जैसा छपा है वैसा ही है। जिस अभिसरण से बाकी आना था, उसके न होने से 10,600 करोड़ रुपये की सहायता नहीं मिल सकी।
68 में से छह वार्षिक कार्य योजनाएं ही वित्तीय वर्ष शुरू होने से पहले मंत्रालय तक पहुंचीं, और एक भी समय पर मंज़ूर नहीं हुई।
जमीन पर
वन आवरण की गुणवत्ता सुधारने के 14 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुक़ाबले सुधार 11,384 हेक्टेयर पर देखा गया, और वन आवरण बढ़ाने के उतने ही लक्ष्य के मुक़ाबले बढ़त 3,409 हेक्टेयर पर। रिपोर्ट इन कमियों को 91.87 और 97.57 फ़ीसदी बताती है; इस डेस्क की दोबारा की गई गणना उससे मिलती है।
दो राज्य जिन्होंने नाप लिया
इस रिपोर्ट का एक निष्कर्ष अलग से पढ़ने लायक है, क्योंकि किसी भी लेखापरीक्षा की सबसे उपयोगी बात यह होती है कि काम हो सकता है, इसका सबूत मिल जाए। लेखापरीक्षा दर्ज करती है कि 2015 से 2025 के बीच मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को छोड़कर किसी भी राज्य ने कार्बन अवशोषण (कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन) का आकलन नहीं किया। जलवायु के संदर्भ में वनरोपण मिशन का पूरा मक़सद यही है, और यही सबसे कठिन नाप है। रिपोर्ट यह भी दर्ज करती है कि इसी नाप के लिए वहां लगे फ़्लक्स टावर रखरखाव की योजना न बनने के कारण बेकार पड़े रहे, जिस पर 3.50 करोड़ रुपये ख़र्च हुए थे।
प्रक्रिया अभी कहां है
यह ठीक-ठीक लिखना ज़रूरी है कि रिपोर्ट 12 अगस्त 2026 को सदन में रखी गई। इस समय इन अनुच्छेदों पर मंत्रालय के कृत कार्रवाई नोट सार्वजनिक अभिलेख पर नहीं हैं, और संसद की किसी समिति ने अभी इस रिपोर्ट पर विचार नहीं किया है। ऊपर जो लिखा है वह प्रस्तुतीकरण के चरण पर लेखापरीक्षक का निष्कर्ष है, उससे अधिक कुछ नहीं। मंत्रालय का उत्तर और लोक लेखा समिति की राय जब उपलब्ध होंगे, ब्लिट्ज उन्हें छापेगा।
भारत को इससे क्या मिलता है। जो मिशन नापा जाता है, वही सुधारा जा सकता है। वन और वृक्ष, कार्बन पर भारत की प्रतिबद्धता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दर्ज होती है, और उस रिपोर्ट की विश्वसनीयता उसी नाप की श्रंखला पर टिकी है जिसकी यह जांच हुई है। जो लेखापरीक्षक साफ कहता है कि कहां नाप नहीं हुर्इ, वह भारत के दावे को दुनिया में भरोसेमंद बनाता है।
केवल सुधारात्मक सुझाव के तौर पर — जिन दो राज्यों ने कार्बन अवशोषण नापा, उनकी विधि मिशन की मानक पद्धति बनाकर बांटी जा सकती है, और इसमें ख़र्च कुछ नहीं है। जो फ़्लक्स टावर लग चुके हैं उन्हें नई मंज़ूरी नहीं, रखरखाव की एक मद चाहिए। और वार्षिक कार्य योजना का वित्तीय वर्ष शुरू होने से पहले पहुंच जाना वह एक शर्त है जिस पर मिशन की बाकी सारी समय-सीमाएं टिकी हैं।










