ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। देश का अस्सी प्रतिशत से ज्यादा उपलब्ध पानी खेती की सिंचाई में जाता है। बीस साल की कोशिश के बाद सूक्ष्म सिंचाई 115 लाख हेक्टेयर तक पहुँची है। बोए गए क्षेत्र के हिसाब से यह 8.11 प्रतिशत है।
पत्र सूचना कार्यालय की शोध इकाई ने 29 अगस्त 2026 को दोपहर 12.34 बजे “वाटर-स्मार्ट खेती के साथ प्रति बूंद अधिक फसल” शीर्षक से विवरण जारी किया, जिसका क्रमांक 159758 है। इसमें कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, नीति आयोग के 2020-21 के मूल्यांकन, आर्थिक समीक्षा 2020-21 और भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद के 2023 के अध्ययन के आँकड़े हैं। यह आज का ही दस्तावेज़ है, और यह अपनी कवरेज खुद छापता है — यही इसकी खूबी है।
समस्या दो आँकड़ों में
विवरण शुरुआत में ही अड़चन रख देता है। देश के उपलब्ध जल संसाधनों का 80 प्रतिशत से अधिक कृषि सिंचाई में जाता है, जबकि शुद्ध बोए गए क्षेत्र का करीब 50 प्रतिशत ही सिंचाई की सुविधा ले पा रहा है। इसलिए जल उपयोग दक्षता सुधारना राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गई है।
अब उपलब्धि। प्रति बूंद अधिक फसल (पीडीएमसी) ने जुलाई 2026 तक 115 लाख हेक्टेयर भूमि सूक्ष्म सिंचाई के तहत ला दी है — जो दस्तावेज़ के अपने शब्दों में शुद्ध बोए क्षेत्र का 8.11 प्रतिशत है। ब्लिट्ज़ ने इसका दूसरा पहलू निकाला: 8.11 प्रतिशत का मतलब है कि शुद्ध बोया क्षेत्र करीब 14.18 करोड़ हेक्टेयर बैठता है, और यह भी कि 91.89 प्रतिशत बोया क्षेत्र आज भी पुरानी विधियों से सींचा जा रहा है। योजना असफल नहीं हुई है; उसके अपने छपे हुए हिसाब से वह अभी शुरू ही हुई है।
किसान को मिलता क्या है
सहायता पूँजीगत सब्सिडी के रूप में है, प्रति लाभार्थी अधिकतम पाँच हेक्टेयर तक। छोटे और सीमांत किसानों को लागत का 55 प्रतिशत, अन्य किसानों को 45 प्रतिशत। उसी भूमि पर सात वर्ष बाद दोबारा सहायता ली जा सकती है। पिछले तीन वर्षों में केंद्र ने 8,123.24 करोड़ रुपये जारी किए — हिसाब लगाने पर 2,707.75 करोड़ रुपये सालाना। कुछ राज्य अपने बजट से अलग सब्सिडी भी देते हैं।
2025-26 में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के लिए कुल 8,957.72 करोड़ रुपये जारी या स्वीकृत हुए, जिनमें से 3,226.36 करोड़ रुपये सिर्फ पीडीएमसी के लिए थे — यानी मूल योजना के पैसे का 36.02 प्रतिशत, यह हिसाब ब्लिट्ज़ ने लगाया। उस वर्ष योजना से 12.30 लाख किसान लाभान्वित हुए, जिनमें करीब 20 प्रतिशत यानी 2.46 लाख महिलाएँ थीं। दोनों को भाग देने पर प्रति किसान औसत केंद्रीय सहायता करीब 26,231 रुपये बैठती है।
ब्लिट्ज़ डेटा कार्ड · प्रति बूंद अधिक फसल
पहुँच, सहायता और प्रमाण
| मानदंड / विवरण | जानकारी |
|---|---|
| सूक्ष्म सिंचाई के तहत क्षेत्र, जुलाई 2026 | 115 लाख हेक्टेयर |
| शुद्ध बोए क्षेत्र का हिस्सा | 8.11 प्रतिशत |
| अब भी बाहर | 91.89 प्रतिशत |
| इससे निकला शुद्ध बोया क्षेत्र | करीब 14.18 करोड़ हेक्टेयर |
| छोटे और सीमांत किसान को सब्सिडी | लागत का 55 प्रतिशत |
| अन्य किसानों को | लागत का 45 प्रतिशत |
| प्रति लाभार्थी सीमा | पाँच हेक्टेयर |
| दोबारा सहायता | उसी भूमि पर सात वर्ष बाद |
| तीन वर्ष में केंद्रीय सहायता | 8,123.24 करोड़ रुपये — 2,707.75 करोड़ सालाना |
| पीएम-आरकेवीवाई, 2025-26 | 8,957.72 करोड़ रुपये |
| इसमें पीडीएमसी का हिस्सा | 3,226.36 करोड़ रुपये — 36.02 प्रतिशत |
| 2025-26 में लाभान्वित किसान | 12.30 लाख, करीब 20 प्रतिशत महिलाएँ |
| प्रति किसान औसत सहायता | करीब 26,231 रुपये |
| जल उपयोग दक्षता में सुधार, नीति आयोग | 30 से 70 प्रतिशत |
| आय में वृद्धि, नीति आयोग | 10 से 69 प्रतिशत |
स्वतंत्र अध्ययन क्या कहते हैं
तीन मूल्यांकन नाम से दर्ज हैं, और डेस्क उन्हें उनकी पूरी रेंज के साथ रख रहा है, एक आँकड़े में समेटकर नहीं। नीति आयोग के 2020-21 के मूल्यांकन में आय में 10 से 69 प्रतिशत तक लाभ और जल उपयोग दक्षता में 30 से 70 प्रतिशत तक सुधार दर्ज हुआ। आर्थिक समीक्षा 2020-21 ने बूंद-बूंद सिंचाई से 20 से 48 प्रतिशत पानी की बचत, 10 से 17 प्रतिशत ऊर्जा की बचत, श्रम लागत में 30 से 40 प्रतिशत की कमी, 11 से 19 प्रतिशत उर्वरक की बचत और 20 से 38 प्रतिशत तक उपज वृद्धि दर्ज की। आईआईएम अहमदाबाद के छह राज्यों में किए गए 2023 के अध्ययन में पाया गया कि किसान मुख्यतः गिरते भूजल स्तर से निपटने के लिए यह तकनीक अपना रहे हैं।
रेंज चौड़ी है, और चौड़ी होना ही ईमानदारी है। आंध्र प्रदेश के नींबू के बाग पर ड्रिप और सौराष्ट्र की मूँगफली पर स्प्रिंकलर एक ही निवेश नहीं हैं। दस्तावेज़ में एक खेत का ब्योरा है: आंध्र प्रदेश के पलनाडु के किसान एलएएम श्रीनिवास राव ने दो एकड़ के नींबू बाग में बाढ़ सिंचाई की जगह ड्रिप और फर्टिगेशन अपनाया, और उपज 90 से बढ़कर 105 क्विंटल प्रति एकड़ हो गई — हिसाब लगाने पर 16.67 प्रतिशत — जबकि शुद्ध आय 1.5 लाख से 2.85 लाख रुपये हुई, यानी 1.35 लाख रुपये ज्यादा। उसी ब्योरे में खेती की लागत के जो आँकड़े हैं वे दो एकड़ की जोत के हिसाब से मेल नहीं खाते, इसलिए डेस्क ने उन्हें छोड़ दिया है।
सबसे बड़ा बदलाव, जो चूक जाता है
दस्तावेज़ की सबसे महत्वपूर्ण बात प्रशासनिक है और आसानी से नजर से चूक जाती है। संशोधित दिशानिर्देशों में जल संरक्षण और जल भंडारण की परियोजनाओं पर लगी फंडिंग की सीमा हटा दी गई है। पहले सामान्य राज्य और केंद्रशासित प्रदेश ऐसे काम पर कुल आवंटन का अधिकतम 20 प्रतिशत ही खर्च कर सकते थे, और पूर्वोत्तर तथा हिमालयी राज्य एवं जम्मू-कश्मीर और लद्दाख अधिकतम 40 प्रतिशत। अब राज्य अपनी स्थानीय जरूरत के हिसाब से इससे ज्यादा खर्च कर सकते हैं। “अन्य हस्तक्षेप” घटक के तहत डिग्गी — बड़े जल भंडारण टैंक या खेत तालाब — और जल संचयन ढाँचों का निर्माण होता है, व्यक्तिगत या सामुदायिक उपयोग के लिए।
यह मायने रखता है, क्योंकि पानी की पक्की उपलब्धता के बिना ड्रिप सिर्फ एक महँगा पाइप है। जिस साल बारिश देर से आए, उस साल भंडारण ही सूक्ष्म सिंचाई को चलाता है। सीमा हटाकर सरकार ने दोनों को एक ही समस्या माना है — और वे एक ही समस्या हैं।
सुझाव उसी आँकड़े पर है जिस पर यह पूरी रिपोर्ट टिकी है। कवरेज का आँकड़ा राष्ट्रीय स्तर पर छपता है; राज्यवार, और हर राज्य के अपने बोए क्षेत्र के मुकाबले, नहीं छपता। यदि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय हर साल एक ही तालिका छापे — राज्य, शुद्ध बोया क्षेत्र, सूक्ष्म सिंचाई के तहत क्षेत्र, कवरेज प्रतिशत, उस वर्ष जुड़ा क्षेत्र — तो देश देख सकेगा कि वह 91.89 प्रतिशत असल में कहाँ है, और राज्यों की तुलना एक-दूसरे के कुल हेक्टेयर से नहीं, अपनी-अपनी सिंचाई क्षमता से हो सकेगी। यह सारा आँकड़ा योजना की अपनी निगरानी प्रणाली में पहले से मौजूद है। उसे एक तालिका में छाप देना राष्ट्रीय प्रतिशत को काम का नक्शा बना देगा।













