ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।एक कोष इसलिए बना था कि जो प्रयोगशाला कमाए, वह अपनी कमाई अपने शोध पर खर्च करे। 31 मार्च 2025 तक उसमें 3,490.68 करोड़ रुपये पड़े थे। अंकेक्षण की बात यह नहीं कि पैसा इधर-उधर गया। बात यह है कि पैसा वहीं पड़ा रहा।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की रिपोर्ट संख्या 17, वर्ष 2026 — मार्च 2024 को समाप्त वर्ष के लिए, संघ सरकार, वैज्ञानिक एवं पर्यावरण मंत्रालय/विभाग (अनुपालन अंकेक्षण) — 12 अगस्त 2026 को संसद में रखी गई। इस पर CAG की अपनी प्रेस विज्ञप्ति 13 अगस्त 2026 की है।
इसमें आठ वैज्ञानिक और पर्यावरण मंत्रालयों/विभागों तथा उनके अधीन स्वायत्त निकायों और केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों के लेन-देन देखे गए हैं — परमाणु ऊर्जा विभाग, जैव प्रौद्योगिकी विभाग, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान विभाग, अंतरिक्ष विभाग, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, पर्यावरण-वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय। रिपोर्ट में चार पैरा, दो विषय-विशिष्ट अनुपालन अंकेक्षण और दो सूचना प्रौद्योगिकी अंकेक्षण हैं।
जो कोष खर्च होने के लिए बना था
दो विषय-विशिष्ट अंकेक्षणों में से एक प्रयोगशाला एवं मुख्यालय आरक्षित निधि (Laboratory and Headquarter Reserve Fund) पर है। अंकेक्षक के अपने शब्दों में, यह निधि बजट संसाधनों को पूरक बनाने और ज्यादा राजस्व कमाने वाली प्रयोगशालाओं को प्रोत्साहित करने के लिए बनी। जो प्रयोगशाला कमाती है वह एक हिस्सा रखती है और उसे उस काम पर खर्च करती है जहाँ बजट की लाइन नहीं पहुँचती। यह अच्छी बनावट है।
अंकेक्षण में पाया गया कि नमूने में ली गई ज्यादातर प्रयोगशालाओं ने, और स्वयं वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के मुख्यालय ने, पिछले वर्ष अर्जित निधि का निर्धारित हिस्सा तक खर्च नहीं किया, इसलिए शेष राशि साल-दर-साल जमा होती चली गई। 31 मार्च 2025 तक संचित शेष 3,490.68 करोड़ रुपये था। इसमें से 627.71 करोड़ रुपये नवाचार से जुड़ी गतिविधियों के लिए निर्धारित थे और अनुपयोगी रहे। अंकेक्षण ने कुछ प्राप्तियों को निधि में अप्राधिकृत रूप से जमा किए जाने, बाहर से वित्तपोषित परियोजनाओं के निपटान में देरी, और निर्धारित निगरानी व्यवस्था के अभाव को भी दर्ज किया।
ब्लिट्ज़ ने दो अनुपात निकाले जो रिपोर्ट में सीधे नहीं दिए गए। नवाचार के लिए रखी और खर्च न हुई राशि संचित शेष का 17.98 प्रतिशत है। और यह पूरा शेष उन 20,000 करोड़ रुपये का 17.45 प्रतिशत है जो बजट 2025-26 में स्वदेशी छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों के लिए रखे गए। सीधे शब्दों में — देश के सबसे बड़े रिएक्टर कार्यक्रम के छठे हिस्से के बराबर रकम उस निधि में पड़ी थी जो बनी ही प्रयोगशाला के काम के लिए है।
प्रयोगशाला एवं मुख्यालय आरक्षित निधि
| मानदंड / विवरण | जानकारी |
|---|---|
| रिपोर्ट | संख्या 17, 2026; मार्च 2024 को समाप्त वर्ष |
| संसद में प्रस्तुत | 12 अगस्त 2026 |
| CAG प्रेस विज्ञप्ति | 13 अगस्त 2026 |
| कवर किए गए मंत्रालय/विभाग | आठ |
| संचित शेष | 3,490.68 करोड़ रुपये, 31 मार्च 2025 |
| नवाचार के लिए अनुपयोगी | 627.71 करोड़ रुपये |
| शेष में नवाचार अंश का हिस्सा | 17.98 प्रतिशत |
| SMR आवंटन की तुलना में शेष | 20,000 करोड़ का 17.45 प्रतिशत |
रिपोर्ट में और क्या दर्ज है
इसी रिपोर्ट में दर्ज कुछ और बातें, अंकेक्षक के ही शब्दों में और सदन में रखी रिपोर्ट की टिप्पणियों के रूप में। परमाणु ऊर्जा विभाग के पास भूमि और संपदा प्रबंधन के लिए कोई व्यापक नीति ढाँचा नहीं था, और नवंबर 2011 में मंत्रिमंडल सचिवालय के निर्देश के बावजूद भूमि हस्तांतरण और पट्टे की साझा नीति नहीं बनी थी, जिससे उसकी अलग-अलग इकाइयों में अलग-अलग तरीके चलते रहे। अंतरराष्ट्रीय उन्नत चूर्ण धातुकर्म एवं नव पदार्थ अनुसंधान केंद्र (ARCI) ने जरूरी सहायक ढाँचा सुनिश्चित किए बिना लेजर वेल्डिंग मशीन खरीदी और वह पड़ी रही — अंकेक्षण इसे 1.52 करोड़ रुपये का निष्फल व्यय बताता है। निर्माण, सेवा एवं संपदा प्रबंधन निदेशालय ने 1.45 करोड़ रुपये लिफ्ट के उन हिस्सों की मरम्मत और बदली पर खर्च किए जो सात साल से ज्यादा भंडारण में खराब हो गए। भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) ने वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून में एक फोटो गैलरी पर 1.99 करोड़ रुपये खर्च किए जो स्वीकृत योजना का हिस्सा नहीं थी, और प्रौद्योगिकी विकास केंद्रों पर प्रतिपूरक वनरोपण निधि से 1.86 करोड़ रुपये अधिक व्यय किया। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की लद्दाख नवीकरणीय ऊर्जा पहल (लघु जल विद्युत) में 5.07 करोड़ रुपये निष्फल रहे। दो सूचना प्रौद्योगिकी अंकेक्षण टाटा मेमोरियल सेंटर और सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (SECI) की SAP-ERP प्रणाली पर हैं।













